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#रामायण #🙏रामायण🕉 🙇जयंत और माता सीता का प्रसंग (चित्रकूट वन) (आधार: रामायण)🙇 चित्रकूट के शांत, हरे-भरे वन में श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता अपना वनवास बिता रहे थे। सुबह का समय था—पक्षियों की मधुर ध्वनि, मंद हवा और कुटिया के बाहर फैली शांति। इसी समय एक अद्भुत घटना घटी, जिसने तीनों लोकों को हिला दिया। जयंत की परीक्षा का विचार देवताओं के राजा इंद्र के पुत्र जयंत के मन में अचानक एक विचार आया— "राम को अवतार कहा जाता है, किंतु मैं उनकी वास्तविक शक्ति परखकर देखूँ!" उत्सुकता और अहंकार के मिश्रण में, उसने एक कौवे का रूप धारण कर लिया। कौवे का प्रहार कुटिया में उस समय माता सीता और श्री राम शांति से बैठे थे। तभी वह कौवा उड़ता हुआ आया और माता सीता के चरणों पर हल्का सा प्रहार कर दिया। सीता चौंक उठीं—उनके चरण से रक्त की एक बूँद निकली। राम ने देखा कि कोई पक्षी सीता को चोट पहुँचा गया है। उनके शांत स्वरूप में पहली बार कठोरता का तेज झलक पड़ा। राम का क्रोध और तिनके का ब्रह्मास्त्र राम ने धरती से एक सामान्य-सा तिनका उठाया। गंभीर मंत्रों से वह तिनका प्रकाशमान हो उठा— एक साधारण तिनका अब ब्रह्मास्त्र बन चुका था। उस ब्रह्मास्त्र को राम ने कौवे की ओर छोड़ दिया। तिनका कौवे के पीछे ऐसा लगा कि कहीं भी जाए, उसका पीछा नहीं छूटे। जयंत की तीनों लोकों में दौड़ अब जयंत अपने असली रूप में लौट आया, किंतु ब्रह्मास्त्र से बचना असंभव था। वह स्वर्ग गया—देवताओं ने कहा, “राम के अस्त्र से कोई रक्षा नहीं।” वह पृथ्वी और पाताल गया—किसी ने शरण नहीं दी। अंत में निराश होकर उसने नारदजी की बात मानी और शीघ्र ही चित्रकूट पहुँचकर राम के चरणों में गिर पड़ा। शरणागति और क्षमा जयंत ने स्वीकार किया— "मेरी भूल थी, प्रभु! मुझे क्षमा दें।" राम को किसी शरणागत से क्रोध न था। उन्होंने उसे जीवनदान दिया। परंतु ब्रह्मास्त्र खाली नहीं जा सकता था। इसलिए दंड स्वरूप उसकी एक आँख का तेज नष्ट हो गया, और वह सदा के लिए आधा दृष्टिहीन हो गया। इस प्रसंग का संदेश यह कथा स्पष्ट बताती है कि— ईश्वर के भक्तों को कष्ट देना गंभीर अपराध है। शरणागति सबसे बड़ी शक्ति है—जो भगवान की शरण आए, उसे जीवनदान मिलता है। शक्ति का दुरुपयोग अंततः विनाश लाता है।
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