#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣3️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
अष्टनवतितमोऽध्यायः
शान्तनु और गंगा का कुछ शर्तों के साथ सम्बन्ध, वसुओं का जन्म और शाप से उद्धार तथा भीष्म की उत्पत्ति...(दिन 303)
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रममाणस्तया सार्धं यथाकामं नरेश्वरः ।
अष्टावजनयत् पुत्रांस्तस्याममरसंनिभान् ।। १२ ।।
उसके साथ इच्छानुसार रमण करते हुए महाराज शान्तनुने उसके गर्भसे देवताओंके समान तेजस्वी आठ पुत्र उत्पन्न किये ।। १२ ।।
जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्भसि भारत । प्रीणाम्यहं त्वामित्युक्त्वा गङ्गा स्रोतस्यमज्जयत् ।। १३ ।।
भारत ! जो-जो पुत्र उत्पन्न होता, उसे वह गंगाजीके जलमें फेंक देती और कहती - ' (वत्स! इस प्रकार शापसे मुक्त करके) मैं तुम्हें प्रसन्न कर रही हूँ।' ऐसा कहकर गंगा प्रत्येक बालकको धारामें डुबो देती थी ।। १३ ।।
तस्य तन्न प्रियं राज्ञः शान्तनोरभवत् तदा । न च तां किंचनोवाच त्यागाद् भीतो महीपतिः ।। १४ ।।
पत्नीका यह व्यवहार राजा शान्तनुको अच्छा नहीं लगता था, तो भी वे उस समय उससे कुछ नहीं कहते थे। राजाको यह डर बना हुआ था कि कहीं यह मुझे छोड़कर चली न जाय ।। १४ ।।
अथैनामष्टमे पुत्रे जाते प्रहसतीमिव । उवाच राजा दुःखार्तः परीप्सन् पुत्रमात्मनः ।। १५ ।।
तदनन्तर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, तब हँसती हुई-सी अपनी स्त्रीसे राजाने अपने पुत्रका प्राण बचानेकी इच्छासे दुःखातुर होकर कहा- ।। १५ ।।
मा वधीः कस्य कासीति किं हिनत्सि सुतानिति । पुत्रघ्नि सुमहत् पापं सम्प्राप्तं ते सुगर्हितम् ।। १६ ।।
'अरी! इस बालकका वध न कर, तू किसकी कन्या है? कौन है? क्यों अपने ही बेटोंको मारे डालती है। पुत्रघातिनि ! तुझे पुत्रहत्याका यह अत्यन्त निन्दित और भारी पाप लगा है' ।। १६ ।।
रूयुवाच
पुत्रकाम न ते हन्मि पुत्रं पुत्रवतां वर ।
जीर्णस्तु मम वासोऽयं यथा स समयः कृतः ।। १७ ।।
स्त्री बोली-पुत्रकी इच्छा रखनेवाले नरेश ! तुम पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हारे इस पुत्रको नहीं मारूँगी; परंतु यहाँ मेरे रहनेका समय अब समाप्त हो गया; जैसी कि पहले ही शर्त हो चुकी है ।। १७ ।।
अहं गङ्गा जनुसुता महर्षिगणसेविता ।
देवकार्यार्थसिद्धयर्थमुषिताहं त्वया सह ।। १८ ।।
मैं जह्वकी पुत्री और महर्षियोंद्वारा सेवित गंगा हूँ। देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम्हारे साथ रह रही थी ।। १८ ।।
इमेऽष्टौ वसवो देवा महाभागा महौजसः ।
वसिष्ठशापदोषेण मानुषत्वमुपागताः ।। १९ ।।
ये तुम्हारे आठ पुत्र महातेजस्वी महाभाग वसु देवता हैं। वसिष्ठजीके शाप-दोषसे ये मनुष्य-योनिमें आये थे ।। १९ ।।
तेषां जनयिता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते ।
मद्विधा मानुषी धात्री लोके नास्तीह काचन ।। २० ।।
तुम्हारे सिवा दूसरा कोई राजा इस पृथ्वीपर ऐसा नहीं था, जो उन वसुओंका जनक हो सके। इसी प्रकार इस जगत्में मेरी जैसी दूसरी कोई मानवी नहीं है, जो उन्हें गर्भमें धारण कर सके ।। २० ।।
तस्मात् तज्जननीहेतोर्मानुषत्वमुपागता ।
जनयित्वा वसूनष्टौ जिता लोकास्त्वयाक्षयाः ।। २१ ।।
अतः इन वसुओंकी जननी होनेके लिये मैं मानवशरीर धारण करके आयी थी। राजन् ! तुमने आठ वसुओंको जन्म देकर अक्षय लोक जीत लिये हैं ।। २१ ।।
देवानां समयस्त्वेष वसूनां संश्रुतो मया ।
जातं जातं मोक्षयिष्ये जन्मतो मानुषादिति ।। २२ ।।
वसु देवताओंकी यह शर्त थी और मैंने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी कि जो-जो वसु जन्म लेगा, उसे मैं जन्मते ही मनुष्य-योनिसे छुटकारा दिला दूँगी ।। २२ ।।
तत् ते शापाद् विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाव्रतम् ।। २३ ।।
इसलिये अब वे वसु महात्मा आपव (वसिष्ठ) के शापसे मुक्त हो चुके हैं। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाऊँगी। तुम इस महान् व्रतधारी पुत्रका पालन करो ।। २३ ।।
(अयं तव सुतस्तेषां वीर्येण कुलनन्दनः ।
सम्भूतोऽति जनानन्यान् भविष्यति न संशयः ।।)
यह तुम्हारा पुत्र सब वसुओंके पराक्रमसे सम्पन्न होकर अपने कुलका आनन्द बढ़ानेके लिये प्रकट हुआ है। इसमें संदेह नहीं कि यह बालक बल और पराक्रममें दूसरे सब लोगोंसे बढ़कर होगा।
एष पर्यायवासो मे वसूनां संनिधौ कृतः ।
मत्प्रसूतिं विजानीहि गङ्गादत्तमिमं सुतम् ।। २४ ।।
यह बालक वसुओंमेंसे प्रत्येकके एक-एक अंशका आश्रय है- सम्पूर्ण वसुओंके अंशसे इसकी उत्पत्ति हुई है। मैंने तुम्हारे लिये वसुओंके समीप प्रार्थना की थी कि 'राजाका एक पुत्र जीवित रहे'। इसे मेरा बालक समझना और इसका नाम 'गंगादत्त' रखना ।। २४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मोत्पत्तावष्टनवतितमोऽध्यायः ।।९८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्मोत्पत्तिविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९८ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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