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#जय श्री राम ‼️महाराज दशरथ और महाराज जनक की वंशावली ‼️ -------------------------------------------------------------- भगवान श्री सीताराम के विवाह से पूर्व महाराज जनक इक्षुमति नदी के किनारे सांकाश्य नगरी के राजा और अपने अनुज कुशध्वज को मंत्रियों को भेज कर जनकपुर बुलवाते हैं। फिर मंत्रियों सहित राजा जनक महाराज दशरथ के खेमे में आते हैं। जहां मुनि वशिष्ठ भी हैं। महाराज दशरथ के संकेत पर मुनि वशिष्ठ उनके कुल परंपरा का परिचय देते हुए कहते हैं कि ब्रह्मा जी से मरीचि की उत्पत्ति हुई। मरीचि के पुत्र कश्यप हैं। कश्यप से विवश्वान और विवश्वान से वैवश्वत मनु का जन्म हुआ। मनु पहले प्रजापति हुए। मनु से इक्ष्वाकु नामक पुत्र अयोध्या के प्रथम राजा हुए। इक्ष्वाकु के पुत्र का नाम कुक्षि व कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्मे। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुंधुमार से युवनाश्व जन्मे युवनाश्व के पुत्र मांधाता हुए। मांधाता से सुसंधि का जन्म हुआ। सुसंधि के दो पुत्र ध्रुवसंधि व प्रसेनजित हुए। ध्रुवसंधि से भरत और भरत से असित का जन्म हुआ। राजा असित के साथ हैहय, तालजंग और शशबिंदु इन तीन राजवंशों की शत्रुता के कारण राजा असित अपनी दो रानियों के साथ हिमालय जाकर रहने लगे और वहीं मृत्यु को प्राप्त हो गए। उस समय उनकी दोनों रानियां गर्भवती थीं। उनमें से एक रानी ने अपनी सौत का गर्भ नष्ट करने के लिए उसे विष युक्त भोजन दे दिया। उस समय उसी पर्वत पर भृगु कुल में उत्पन्न च्यवन ऋषि तपस्या में लीन थे। जिसे जहर दिया गया था, कालिंदी नामक रानी ने च्यवन ऋषि से पुत्र की रक्षा की प्रार्थना की। ऋषि च्यवन के प्रताप से रानी कालिंदी के पुत्र सगर हुए। सगर के असमंज और असमंज के पुत्र अंशुमान हुए। अंशुमान के पुत्र दिलीप और दिलीप के भगीरथ हुए। भगीरथ से ककुत्स्थ और ककुत्स्थ से और रघु का जन्म हुआ। रघु के पुत्र प्रवृद्ध जो शाप से राक्षस हुए। उनका नाम कल्माषपाद पड़ गया। उनसे शंखण नामक पुत्र हुए। शंखण के पुत्र सुदर्शन और सुदर्शन के अग्निवर्ण हुए। अग्निवर्ण के शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरू हुए। मरू से प्रश्रुशुक व प्रश्रुशुक से अंबरीष उत्पन्न हुए। अंबरीष के पुत्र राजा नहुष और नहुष के पुत्र का नाम ययाति हुआ। ययाति के नाभाग हुए। नाभाग के अज व अज से दशरथ का जन्म हुआ। राजा दशरथ की कुल वंश का परिचय प्राप्त करने के बाद राजा जनक ने अपने कुल परंपरा का परिचय देते हुए कहा कि हमारे यहां पूर्वकाल में निमि नामक एक राजा हुए। जिनके मिथि नामक पुत्र हुआ। और मिथि के पुत्र का नाम जनक था। यह हमारे कुल के पहले जनक हैं। इन्हीं के नाम पर हमारे वंश का प्रत्येक राजा जनक कहलाता है। जनक से उदावसु। उदावसु से नंदिवर्धन। नंदिवर्धन से सुकेतु हुए। सुकेतु से देवरात और देवरात से बृहद्रथ नामक पुत्र हुए। बृहद्रथ से महावीर था और महावीर से सुधृति हुए। सुधृति से धृष्टकेतु और धृष्टकेतु से राजा हर्यश्व हुए। हर्यश्व के पुत्र मरू, मरु के पुत्र प्रतींधक, प्रतींधक के पुत्र कीर्तिरथ और कीर्तिरथ के पुत्र देवमीढ हुए। देवमीढ के विबुध और विबुध के महीध्रक हुए। महिध्रक के कीर्तिरात और कीर्तिरात के पुत्र महारोमा हुए। महारोमा से स्वर्णरोमा और स्वर्ण रोमा से ह्रस्वरोमा का जन्म हुआ। जिनके दो पुत्रों में मैं और मेरा छोटा भाई कुश ध्वज हैं। जनक जी ने महाराज दशरथ से कहा कि मैं सीता को श्रीराम के लिए, उर्मिला को लक्ष्मण के लिए समर्पित करता हूं। हमारे छोटे भाई कुशध्वज की दोनों पुत्रियों को आपके सुयोग्य पुत्र भरत और शत्रुघ्न के लिए उनकी धर्मपत्नी बनाने के उद्देश्य से वरण करता हूं। तो बोलिए जय सियाराम
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