#महाभारत
महाभारत की कथा में जब कर्ण ने श्रीकृष्ण से भावुक होकर पूछा—
“मेरा क्या दोष था?”
तो श्रीकृष्ण ने जो उत्तर दिया, उसका सार बहुत गहरा और कर्म-प्रधान है।
श्रीकृष्ण का उत्तर (भावार्थ)
“कर्ण, तुम्हारा जन्म नहीं, तुम्हारे कर्म तुम्हारे बंधन बने।
तुमने सत्य को पहचाना, फिर भी अधर्म का साथ चुना।
सामर्थ्य होते हुए भी अन्याय के विरुद्ध खड़े नहीं हुए—
यही तुम्हारा दोष है।”
श्रीकृष्ण ने कर्ण को क्या समझाया?
जन्म नहीं, कर्म निर्णायक होते हैं — सूतपुत्र कहलाना दोष नहीं था।
दुर्योधन का साथ — मित्रता के नाम पर अधर्म का समर्थन किया।
द्रौपदी का अपमान — सभा में मौन (और समर्थन) सबसे बड़ा पाप बना।
शक्ति होते हुए भी विवेक का त्याग — सत्य जानते हुए गलत का साथ।
“धर्म का ज्ञान होते हुए भी अधर्म चुनना—
यही मनुष्य का वास्तविक पतन है।”
यह संवाद हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ नहीं, हमारे चुनाव हमारा भाग्य तय करते हैं।


