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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु का अनुताप, संन्यास लेने का निश्चय तथा पत्नियों के अनुरोध से वानप्रस्थ-आश्रम में प्रवेश...(दिन 351) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ निशम्य वचनं भर्तुर्वनवासे धृतात्मनः । तत्समं वचनं कुन्ती माद्री च समभाषताम् ।। २६ ।। वनवास के लिये दृढ़ निश्चय करने वाले पतिदेव का यह वचन सुनकर कुन्ती और माद्री ने उनके योग्य बात कही- ।। २६ ।। अन्येऽपि ह्याश्रमाः सन्ति ये शक्या भरतर्षभ । आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत् ।। २७ ।। 'भरतश्रेष्ठ ! संन्यासके सिवा और भी तो आश्रम हैं, जिनमें आप हम धर्मपत्नियोंके साथ रहकर भारी तपस्या कर सकते हैं ।। २७ ।। शरीरस्यापि मोक्षाय स्वर्यं प्राप्य महाफलम् । त्वमेव भविता भर्ता स्वर्गस्यापि न संशयः ।। २८ ।। 'आपकी वह तपस्या स्वर्गदायक महान् फलकी प्राप्ति कराकर इस शरीरसे भी मुक्ति दिलानेमें समर्थ हो सकती है। इसमें संदेह नहीं कि उस तपके प्रभावसे आप ही स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी हो सकते हैं ।। २८ ।। प्रणिधायेन्द्रियग्रामं भर्तृलोकपरायणे । त्यक्तकामसुखे ह्यावां तप्स्यावो विपुलं तपः ।। २९ ।। 'हम दोनों कामसुखका परित्याग करके पतिलोककी प्राप्तिका ही परम लक्ष्य लेकर अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई भारी तपस्या करेंगी ।। २९ ।। यदि चावां महाप्राज्ञ त्यक्ष्यसि त्वं विशाम्पते । अद्यद्यैवावां प्रहास्यावो जीवितं नात्र संशयः ।। ३० ।। 'महाप्राज्ञ नरेश्वर! यदि आप हम दोनों को त्याग देंगे तो आज ही हम अपने प्राणों का परित्याग कर देंगी, इसमें संशय नहीं है' ।। ३० ।। पाण्डुरुवाच यदि व्यवसितं ह्येतद् युवयोर्धर्मसंहितम् । स्ववृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ।। ३१ ।। पाण्डु ने कहा- देवियो! यदि तुम दोनों का यही धर्मयुक्त निश्चय है तो (ठीक है, मैं संन्यास न लेकर वानप्रस्थाश्रम में ही रहूँगा तथा) आज से अपने पिता वेदव्यासजी की अक्षय फल वाली जीवनचर्या का अनुसरण करूँगा ।। ३१ ।। त्यक्त्वा ग्राम्यसुखाहारं तप्यमानो महत् तपः । वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने ।। ३२ ।। भोगियोंके सुख और आहारका परित्याग करके भारी तपस्यामें लग जाऊँगा। वल्कल पहनकर फल-मूलका भोजन करते हुए महान् वनमें विचरूँगा ।। ३२ ।। अग्नौ जुह्वन्नुभौ कालावुभौ कालावुपस्पृशन् । कृशः परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधरः ।। ३३ ।। दोनों समय स्नान-संध्या और अग्निहोत्र करूँगा। चिथड़े, मृगचर्म और जटा धारण करूँगा। बहुत थोड़ा आहार ग्रहण करके शरीर से दुर्बल हो जाऊँगा ।। ३३ ।। शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासानवेक्षकः । तपसा दुश्चरेणेदं शरीरमुपशोषयन् ।। ३४ ।। एकान्तशीली विमृशन् पक्वापक्वेन वर्तयन् । पितृत् देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ।। ३५ ।। सर्दी, गरमी और आँधीका वेग सहूँगा। भूख-प्यासकी परवा नहीं करूँगा तथा दुष्कर तपस्या करके इस शरीरको सुखा डालूँगा। एकान्तमें रहकर आत्म-चिन्तन करूँगा। कच्चे (कन्द-मूल आदि) और पके (फल आदि) से जीवन-निर्वाह करूँगा। देवताओं और पितरोंको जंगली फल-मूल, जल तथा मन्त्रपाठ द्वारा तृप्त करूँगा ।। ३४-३५ ।। वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनर्यामवासिनाम् ।। ३६ ।। मैं वानप्रस्थ आश्रममें रहनेवालोंका तथा कुटुम्बी-जनोंका भी दर्शन और अप्रिय नहीं करूंगा; फिर ग्रामवासियोंकी तो बात ही क्या है? ।। ३६ ।। एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् । काङ्क्षमाणोऽहमास्थास्ये देहस्यास्या समापनात् ।। ३७ ।। इस प्रकार मैं वानप्रस्थ आश्रमसम्बन्धी शास्त्रोंकी कठोर-से-कठोर विधियोंके पालनकी आकांक्षा करता हुआ तबतक वानप्रस्थ आश्रममें स्थित रहूँगा जबतक कि शरीरका अन्त न हो जाय ।। ३७ ।। वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्त्वा भार्ये ते राजा कौरवनन्दनः । ततश्रूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च ।। ३८ ।। वासांसि च महार्हाणि स्त्रीणामाभरणानि च । प्रदाय सर्वं विप्रेभ्यः पाण्डुः पुनरभाषत ।। ३९ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले राजा पाण्डुने अपनी दोनों पत्नियोंसे यों कहकर अपने सिरपेंच, निष्क (वक्षःस्थलके आभूषण), बाजूबंद, कुण्डल और बहुमूल्य वस्त्र तथा माद्री और कुन्तीके भी शरीरके गहने उतारकर सब ब्राह्मणोंको दे दिये। फिर सेवकोंसे इस प्रकार कहा- ।। ३८-३९ ।। गत्वा नागपुरं वाच्यं पाण्डुः प्रव्रजितो वनम् । अर्थ कामं सुखं चैव रतिं च परमात्मिकाम् ।। ४० ।। प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुनन्दनः । 'तुमलोग हस्तिनापुर में जाकर कह देना कि कुरुनन्दन राजा पाण्डु अर्थ, काम, विषयसुख और स्त्रीविषयक रति आदि सब कुछ छोड़कर अपनी पत्नियोंके साथ वानप्रस्थ हो गये हैं' ।। ४० ।। ततस्तस्यानुयातारस्ते चैव परिचारकाः ।। ४१ ।। श्रुत्वा भरतसिंहस्य विविधाः करुणा गिरः । भीममार्तस्वरं कृत्वा हाहेति परिचुक्रुशुः ।। ४२ ।। भरतसिंह पाण्डुकी यह करुणायुक्त चित्र-विचित्र वाणी सुनकर उनके अनुचर और सेवक सभी हाय-हाय करके भयंकर आर्तनाद करने लगे ।। ४१-४२ ।। उष्णमश्रु विमुञ्चन्तस्तं विहाय महीपतिम् । ययुर्नागपुरं तूर्णं सर्वमादाय तद् धनम् ।। ४३ ।। उस समय नेत्रोंसे गरम-गरम आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे सेवक राजा पाण्डुको छोड़कर और बचा हुआ सारा धन लेकर तुरंत हस्तिनापुरको चले गये ।। ४३ ।। ते गत्वा नगरं राज्ञो यथावृत्तं महात्मनः । कथयाञ्चक्रिरे राज्ञस्तद् धनं विविधं ददुः ।। ४४ ।। उन्होंने हस्तिनापुरमें जाकर महात्मा राजा पाण्डुका सारा समाचार राजा धृतराष्ट्रसे ज्यों-का-त्यों कह सुनाया और वह नाना प्रकारका धन धृतराष्ट्रको ही सौंप दिया ।। ४४ ।। श्रुत्वा तेभ्यस्ततः सर्वं यथावृत्तं महावने । धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठः पाण्डुमेवान्वशोचत ।। ४५ ।। फिर उन सेवकोंसे उस महान् वनमें पाण्डुके साथ घटित हुई सारी घटनाओंको यथावत् सुनकर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र सदा पाण्डुकी ही चिन्तामें दुःखी रहने लगे ।। ४५ ।। न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् । भ्रातृशोकसमाविष्टस्तमेवार्थं विचिन्तयन् ।। ४६ ।। शय्या, आसन और नाना प्रकारके भोगोंमें कभी उनकी रुचि नहीं होती थी। वे भाईके शोकमें मग्न हो सदा उन्हींकी बात सोचते रहते थे ।। ४६ ।। राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशनः । जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम् ।। ४७ ।। जनमेजय! राजकुमार पाण्डु फल-मूलका आहार करते हुए अपनी दोनों पत्नियोंके साथ वहाँसे नागशत नामक पर्वतपर चले गये ।। ४७ ।। स चैत्ररथमासाद्य कालकूटमतीत्य च । हिमवन्तमतिक्रम्य प्रययौ गन्धमादनम् ।। ४८ ।। तत्पश्चात् चैत्ररथ नामक वन में जाकर कालकूट और हिमालय पर्वत को लाँघते हुए वे गन्धमादन पर चले गये ।। ४८ ।। रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धेश्च परमर्षिभिः । उवास स महाराज समेषु विषमेषु च ।। ४९ ।। इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य हंसकूटमतीत्य च । शतशृङ्गे महाराज तापसः समतप्यत ।। ५० ।। महाराज! उस समय महाभूत, सिद्ध और महर्षिगण उनकी रक्षा करते थे। वे ऊँची-नीची जमीनपर सो लेते थे। इन्द्रद्युम्न सरोवरपर पहुँचकर तथा उसके बाद हंसकूटको लाँघते हुए वे शतशृंग पर्वतपर जा पहुँचे। जनमेजय ! वहाँ वे तपस्वी जीवन बिताते हुए भारी तपस्यामें संलग्न हो गये ।। ४९-५० ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुचरितेऽष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुचरितविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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