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।। ॐ ।। अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।। हे मधुसूदन! यह योग जो आप पहले बता आये हैं, जिससे समत्व भावदृष्टि मिलती है, मन के चञ्चल होने से बहुत समय तक इसमें ठहरनेवाली स्थिति में मैं अपने को नहीं देखता। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - ।श्रीमढ्भगवढ्गीता। | 200 ।।यथार्थ गीता।। ५२०० ப3 11 ५२०० अर्जुन उवाच ५२०० योड्यं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन 8 मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि हे मघुस्ूवलत्वयहत ययगिं किथिराम पहले आये हैं, जिससे समत्व भावदृष्टि बता ५२००  मिलती है, मन के चञ्चल होने से बहुत समय तक इसमें ठहरनेवाली स्थिति में ५२००  मैं अपने को नहीं देखता। aాశ గౌౌ अन्तराल के बाढ श्रीमद्भगवढ्गीता की शाश्वत व्याख्या ।यथार्थजीता धर्मशास नद ।श्रीमढ्भगवढ्गीता। | 200 ।।यथार्थ गीता।। ५२०० ப3 11 ५२०० अर्जुन उवाच ५२०० योड्यं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन 8 मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि हे मघुस्ूवलत्वयहत ययगिं किथिराम पहले आये हैं, जिससे समत्व भावदृष्टि बता ५२००  मिलती है, मन के चञ्चल होने से बहुत समय तक इसमें ठहरनेवाली स्थिति में ५२००  मैं अपने को नहीं देखता। aాశ గౌౌ अन्तराल के बाढ श्रीमद्भगवढ्गीता की शाश्वत व्याख्या ।यथार्थजीता धर्मशास नद - ShareChat