#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः
व्यासजी के द्वारा विचित्रवीर्य के क्षेत्र से धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर की उत्पत्ति...(दिन 326)
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वैशम्पायन उवाच
ततः सत्यवती काले वधूं स्नातामृतौ तदा । संवेशयन्ती शयने शनैर्वचनमब्रवीत् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर सत्यवती ठीक समयपर अपनी ऋतुस्नाता पुत्रवधूको शय्यापर बैठाती हुई धीरेसे बोली- ।। १ ।।
कौसल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वानुप्रवेक्ष्यति । अप्रमत्ता प्रतीक्षेनं निशीथे ह्यागमिष्यति ।। २ ।।
'कौसल्पे ! तुम्हारे एक देवर हैं, वे ही आज तुम्हारे पास गर्भाधानके लिये आयेंगे। तुम सावधान होकर उनकी प्रतीक्षा करो। वे ठीक आधी रातके समय यहाँ पधारेंगे' ।। २ ।।
श्वश्र्वास्तद् वचनं श्रुत्वा शयाना शयने शुभे । साचिन्तयत् तदा भीष्ममन्यांश्च कुरुपुङ्गवान् ।। ३ ।।
सासकी यह बात सुनकर कौसल्या पवित्र शय्यापर शयन करके उस समय मन-ही-मन भीष्म तथा अन्य श्रेष्ठ कुरुवंशियोंका चिन्तन करने लगी ।। ३ ।।
ततोऽम्बिकायां प्रथमं नियुक्तः सत्यवागृषिः । दीप्यमानेषु दीपेषु शरणं प्रविवेश ह ।। ४ ।।
उस समय नियोगविधिके अनुसार सत्यवादी महर्षि व्यासने अम्बिकाके महलमें (शरीरपर घी चुपड़े हुए, संयतचित्त, कुत्सित रूपमें) प्रवेश किया। उस समय बहुत-से दीपक वहाँ प्रकाशित हो रहे थे ।। ४ ।।
तस्य कृष्णस्य कपिलां जटां दीप्ते च लोचने । बभ्रूणि चैव श्मश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत् ।। ५ ।।
व्यासजीके शरीरका रंग काला था, उनकी जटाएँ पिंगलवर्णकी और आँखें चमक रही थीं तथा दाढ़ी-मूँछ भूरे रंगकी दिखायी देती थी। उन्हें देखकर देवी कौसल्याने (भयके मारे) अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये ।। ५ ।।
सम्बभूव तया सार्धं मातुः प्रियचिकीर्षया । भयात् काशिसुता तं तु नाशक्नोदभिवीक्षितुम् ।। ६ ।।
माताका प्रिय करनेकी इच्छासे व्यासजीने उसके साथ समागम किया; परंतु काशिराजकी कन्या भयके मारे उनकी ओर अच्छी तरह देख न सकी ।। ६ ।।
ततो निष्क्रान्तमागम्य माता पुत्रमुवाच ह।
अप्यस्या गुणवान् पुत्र राजपुत्रो भविष्यति ।। ७ ।।
जब व्यासजी उसके महलसे बाहर निकले, तब माता सत्यवतीने आकर उनसे पूछा -'बेटा! क्या अम्बिकाके गर्भसे कोई गुणवान् राजकुमार उत्पन्न होगा?' ।। ७ ।।
निशम्य तद् वचो मातुर्व्यासः सत्यवतीसुतः । नागायुतसमप्राणो विद्वान् राजर्षिसत्तमः ।। ८ ।।
महाभागो महावीर्यो महाबुद्धिर्भविष्यति । तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महात्मनः ।। ९ ।।
माताका यह वचन सुनकर सत्यवतीनन्दन व्यासजी बोले- 'माँ! वह दस हजार हाथियोंके समान बलवान्, विद्वान्, राजर्षियोंमें श्रेष्ठ, परम सौभाग्यशाली, महापराक्रमी तथा अत्यन्त बुद्धिमान् होगा। उस महामनाके भी सौ पुत्र होंगे ।। ८-९ ।।
किं तु मातुः स वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति । तस्य तद् वचनं श्रुत्वा माता पुत्रमथाब्रवीत् ।। १० ।।
नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन ।
ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितॄणां वंशवर्धनम् ।। ११ ।।
द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि ।
'किंतु माताके दोषसे वह बालक अन्धा ही होगा।' व्यासजीकी यह बात सुनकर माताने कहा- 'तपोधन! कुरुवंशका राजा अन्धा हो यह उचित नहीं है। अतः कुरुवंशके लिये दूसरा राजा दो, जो जातिभाइयों तथा समस्त कुलका संरक्षक और पिताका वंश बढ़ानेवाला हो' ।। १०-११३ ।।
स तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महायशाः ।। १२ ।।
महायशस्वी व्यासजी 'तथास्तु' कहकर वहाँसे निकल गये ।। १२ ।।
सापि कालेन कौसल्या सुषुवेऽन्धं तमात्मजम् । पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः ।। १३ ।।
ऋषिमावाहयत् सत्या यथा पूर्वमरिंदम । ततस्तेनैव विधिना महर्षिस्तामपद्यत ।। १४ ।।
अम्बालिकामथाभ्यागादृषिं दृष्ट्वा च सापि तम् ।
विवर्णा पाण्डुसंकाशा समपद्यत भारत ।। १५ ।।
प्रसवका समय आनेपर कौसल्याने उसी अन्धे पुत्रको जन्म दिया। जनमेजय ! तत्पश्चात् देवी सत्यवतीने अपनी दूसरी पुत्रवधूको समझा-बुझाकर गर्भाधानके लिये तैयार किया और इसके लिये पूर्ववत् महर्षि व्यासका आवाहन किया। फिर महर्षिने उसी (नियोगकी संयमपूर्ण) विधिसे देवी अम्बालिकाके साथ समागम किया। भारत! महर्षि व्यासको देखकर वह भी कान्तिहीन तथा पाण्डुवर्णकी-सी हो गयी ।। १३-१५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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