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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१८४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड एक सौ तीनवाँ सर्ग श्रीराम आदिका विलाप, पिताके लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन भरतकी कही हुई पिताकी मृत्युसे सम्बन्ध रखनेवाली करुणाजनक बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी दुःखके कारण अचेत हो गये॥१॥ भरतके मुखसे निकला हुआ वह वचन वज्र-सा लगा, मानो दानवशत्रु इन्द्रने युद्धस्थलमें वज्रका प्रहार-सा कर दिया हो। मनको प्रिय न लगनेवाले उस वाग्-वज्रको सुनकर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर जिसकी डालियाँ खिली हुई हों, वनमें कुल्हाड़ीसे कटे हुए, उस वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े (भरतके दर्शनसे श्रीरामको हर्ष हुआ या पिताकी मृत्युके संवादसे दुःख, अतः उन्हें खिले और कटे हुए पेड़की उपमा दी गयी है)॥२-३॥ पृथ्वीपति श्रीराम इस प्रकार पृथ्वीपर गिरकर नदीके तटको दाँतोंसे विदीर्ण करनेके परिश्रमसे थककर सोये हुए हाथीके समान प्रतीत होते थे। शोकके कारण दुर्बल हुए उन महाधनुर्धर श्रीरामको सब ओरसे घेरकर सीतासहित रोते हुए वे तीनों भाई आँसुओंके जलसे भिगोने लगे॥४-५॥ थोड़ी देर बाद पुनः होशमें आनेपर नेत्रोंसे अश्रुवर्षा करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने अत्यन्त दीन वाणीमें विलाप आरम्भ किया॥६॥ पृथ्वीपति महाराज दशरथको स्वर्गगामी हुआ सुनकर धर्मात्मा श्रीरामने भरतसे यह धर्मयुक्त बात कही—॥७॥ 'भैया! जब पिताजी परलोकवासी हो गये, तब अयोध्यामें चलकर अब मैं क्या करूँगा? उन राजशिरोमणि पितासे हीन हुई उस अयोध्याका अब कौन पालन करेगा?॥८॥ 'हाय! जो पिताजी मेरे ही शोकसे मृत्युको प्राप्त हुए, उन्हींका मैं दाह-संस्कारतक न कर सका। मुझ-जैसे व्यर्थ जन्म लेनेवाले पुत्रसे उन महात्मा पिताका कौन-सा कार्य सिद्ध हुआ?॥९॥ 'निष्पाप भरत! तुम्हीं कृतार्थ हो, तुम्हारा अहोभाग्य है, जिससे तुमने और शत्रुघ्नने सभी प्रेतकार्यों (पारलौकिक कृत्यों) में संस्कार-कर्मके द्वारा महाराजका पूजन किया है॥१०॥ 'महाराज दशरथसे हीन हुई अयोध्या अब प्रधान शासकसे रहित हो अस्वस्थ एवं आकुल हो उठी है; अतः वनवाससे लौटनेपर भी मेरे मनमें अयोध्या जानेका उत्साह नहीं रह गया है॥११॥ 'परंतप भरत! वनवासकी अवधि समाप्त करके यदि मैं अयोध्या जाऊँ तो फिर कौन मुझे कर्तव्यका उपदेश देगा; क्योंकि पिताजी तो परलोकवासी हो गये॥१२॥ 'पहले जब मैं उनकी किसी आज्ञाका पालन करता था, तब वे मेरे सद्व्यवहारको देखकर मेरा उत्साह बढ़ानेके लिये जो जो बातें कहा करते थे, कानोंको सुख पहुँचानेवाली उन बातोंको अब मैं किसके मुखसे सुनूँगा'॥१३॥ भरतसे ऐसा कहकर शोकसंतप्त श्रीरामचन्द्रजी पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली अपनी पत्नीके पास आकर बोले—॥१४॥ सीते! तुम्हारे श्वशुर चल बसे। लक्ष्मण' तुम पितृहीन हो गये। भरत पृथ्वीपति महाराज दशरथके स्वर्गवासका दुःखदायी समाचार सुना रहे हैं'॥१५॥ श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उन सभी यशस्वी कुमारोंके नेत्रोंमें बहुत अधिक आँसू उमड़ आये॥१६॥ तदनन्तर सभी भाइयोंने दुःखी हुए श्रीरामचन्द्रजीको सान्त्वना देते हुए कहा—'भैया! अब पृथ्वीपति पिताजीके लिये जलाञ्जलि दान कीजिये'॥१७॥ अपने श्वशुर महाराज दशरथके स्वर्गवासका समाचार सुनकर सीताके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे अपने प्रियतम श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख न सकीं॥१८॥ तदनन्तर रोती हुई जनककुमारीको सान्त्वना देकर दुःखमग्न श्रीरामने अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मणसे कहा—॥१९॥ 'भाई! तुम इङ्गुदीका पिसा हुआ फल और चीर एवं उत्तरीय ले आओ। मैं महात्मा पिताको जलदान देनेके लिये चलूँगा॥२०॥ 'सीता आगे-आगे चलें। इनके पीछे तुम चलो और तुम्हारे पीछे मैं चलूँगा। शोकके समयकी यही परिपाटी है, जो अत्यन्त दारुण होती है'॥२१॥ तत्पश्चात् उनके कुलके परम्परागत सेवक, आत्मज्ञानी, परम बुद्धिमान्, कोमल स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, तेजस्वी और श्रीरामके सुदृढ़ भक्त सुमन्त्र समस्त राजकुमारोंके साथ श्रीरामको धैर्य बँधाकर उन्हें हाथका सहारा दे कल्याणमयी मन्दाकिनीके तटपर ले गये॥२२-२३॥ वे यशस्वी राजकुमार सदा पुष्पित काननसे सुशोभित, शीघ्र गतिसे प्रवाहित होनेवाली और उत्तम घाटवाली रमणीय नदी मन्दाकिनीके तटपर कठिनाईसे पहुँचे तथा उसके पङ्करहित, कल्याणप्रद, तीर्थभूत जलको लेकर उन्होंने राजाके लिये जल दिया। उस समय वे बोले—पिताजी! यह जल आपकी सेवामें उपस्थित हो'॥२४-२५॥ पृथ्वीपालक श्रीरामने जलसे भरी हुई अञ्जलि से दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके रोते हुए इस प्रकार कहा—'मेरे पूज्य पिता राजशिरोमणि महाराज दशरथ! आज मेरा दिया हुआ यह निर्मल जल पितृलोकमें गये हुए आपको अक्षयरूपसे प्राप्त हो॥२६-२७॥ इसके बाद मन्दाकिनीके जलसे निकलकर किनारेपर आकर तेजस्वी श्रीरघुनाथजीने अपने भाइयोंके साथ मिलकर पिताके लिये पिण्डदान किया॥२८॥ उन्होंने इङ्गुदीके गूदेमें बेर मिलाकर उसका पिण्ड तैयार किया और बिछे हुए कुशोंपर उसे रखकर अत्यन्त दुःखसे आर्त हो रोते हुए यह बात कही—॥२९॥ 'महाराज! प्रसन्नतापूर्वक यह भोजन स्वीकार कीजिये; क्योंकि आजकल यही हमलोगोंका आहार है। मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, वही उसके देवता भी ग्रहण करते हैं'॥३०॥ इसके बाद उसी मार्गसे मन्दाकिनीतटके ऊपर आकर पृथ्वीपालक पुरुषसिंह श्रीराम सुन्दर शिखरवाले चित्रकूट पर्वतपर चढ़े और पर्णकुटीके द्वारपर आकर भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़‌कर रोने लगे॥३१-३२॥ सीतासहित रोते हुए उन चारों भाइयोंके रुदन-शब्दसे उस पर्वतपर गरजते हुए सिंहोंके दहाड़नेके समान प्रतिध्वनि होने लगी॥३३॥ पिताको जलाञ्जलि देकर रोते हुए उन महाबली भाइ‌योंके रोदनका तुमुल नाद सुनकर भरतके सैनिक किसी भयकी आशङ्कासे डर गये। फिर उसे पहचानकर वे एक-दूसरेसे बोले—'निश्चय ही भरत श्रीरामचन्द्रजीसे मिले हैं। अपने परलोकवासी पिताके लिये शोक करनेवाले उन चारों भाइयोंके रोनेका ही यह महान् शब्द है'॥३४-३५॥ यों कहकर उन सबने अपनी सवारियोंको तो वहीं छोड़ दिया और जिस स्थानसे वह आवाज आ रही थी, उसी ओर मुँह किये एकचित्त होकर वे दौड़ पड़े॥३६॥ उनसे भिन्न जो सुकुमार मनुष्य थे, उनमेंसे कुछ लोग घोड़ोंसे, कुछ हाथियोंसे और कुछ सजे-सजाये रथोंसे ही आगे बढ़े। कितने ही मनुष्य पैदल ही चल दिये॥३७॥ यद्यपि श्रीरामचन्द्रजीको परदेशमें आये अभी थोड़े ही दिन हुए थे, तथापि लोगोंको ऐसा जान पड़ता था कि मानो वे दीर्घकालसे परदेशमें रह रहे है; अतः सब लोग उनके दर्शनकी इच्छासे सहसा आश्रमकी ओर चल दिये॥३८॥ वे लोग चारों भाइयोंका मिलन देखनेकी इच्छासे खुरों एवं पहियोंसे युक्त नाना प्रकारकी सवारियोंद्वारा बड़ी उतावलीके साथ चले॥३९॥ अनेक प्रकारकी सवारियों तथा रथकी पहियोंसे आक्रान्त हुई वह भूमि भयंकर शब्द करने लगी; ठीक उसी तरह जैसे मेघोंकी घटा घिर आनेपर आकाशमें गड़गड़ाहट होने लगती है॥४०॥ उस तुमुल नादसे भयभीत हुए हाथी हथिनियोंसे घिरकर मदकी गन्धसे उस स्थानको सुवासित करते हुए वहाँसे दूसरे वनमें भाग गये॥४१॥ वराह, भेड़िये, सिंह, भैंसे, सृमर (मृगविशेष), व्याघ्र, गोकर्ण (मृगविशेष) और गवय (नीलगाय), चितकबरे हरिणोंसहित संत्रस्त हो उठे॥४२॥ चक्रवाक, हंस, जलकुक्कुट, वक, कारण्डव, नरकोकिल और क्रौञ्च पक्षी होश-हवाश खोकर विभिन्न दिशाओंमें उड़ गये॥४३॥ उस शब्दसे डरे हुए पक्षी आकाशमें छा गये और नीचेकी भूमि मनुष्योंसे भर गयी। इस प्रकार उन दोनोंकी समानरूपसे शोभा होने लगी॥४४॥ लोगोंने सहसा पहुँचकर देखा—यशस्वी, पापरहित, पुरुषसिंह श्रीराम वेदीपर बैठे हैं॥४५॥ श्रीरामके पास जानेपर सबके मुख आँसुओंसे भीग गये और सब लोग मन्थरासहित कैकेयीकी निन्दा करने लगे॥४६॥ उन सब लोगोंके नेत्र आँसुओंसे भरे हुए थे और वे सब-के-सब अत्यन्त दुःखी हो रहे थे। धर्मज्ञ श्रीरामने उन्हें देखकर पिता-माताकी भाँति हृदयसे लगाया॥४७॥ श्रीरामने कुछ मनुष्योंको वहाँ छातीसे लगाया तथा कुछ लोगोंने पहुँचकर वहाँ उनके चरणोंमें प्रणाम किया। राजकुमार श्रीरामने उस समय वहाँ आये हुए सभी मित्रों और बन्धु-बान्धवोंका यथायोग्य सम्मान किया॥४८॥ उस समय वहाँ रोते हुए उन महात्माओंका वह रोदन-शब्द पृथ्वी, आकाश, पर्वतोंकी गुफा और सम्पूर्ण दिशाओंको निरन्तर प्रतिध्वनित करता हुआ मृदङ्गकी ध्वनिके समान सुनायी पड़ता था॥४९॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१०३॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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