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#❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - परिश्रान्तौ बाहू स्खलति करतोउरित्रयुगलम् जडीभूतौ पादौ पदमपि न यातुं प्रभवतः। इयं मध्येधारं मम समुपयाता लघुतरी  तरेद्वा मज्जेद्वा त्वयि निहितभाराः खलु वयम्।।३।I  भाषार्थः चूर- चूर हो गयी हैं और हाथ से पतवार " प्रभो! मेरी दोनों भुजाएँ थककर  खिसक रही हैं, पाँव ऐसे जकड़ गये हैं कि पग-भर भी आगे नहीं बढ् सकते। यह मेरी छोटी-सी नैया मझधार में आ पड़ी है, अब यह किनारे लगे या डूब जाय; मैंने तो सब भार तुझ पर छोड दिया है।।३II  परिश्रान्तौ बाहू स्खलति करतोउरित्रयुगलम् जडीभूतौ पादौ पदमपि न यातुं प्रभवतः। इयं मध्येधारं मम समुपयाता लघुतरी  तरेद्वा मज्जेद्वा त्वयि निहितभाराः खलु वयम्।।३।I  भाषार्थः चूर- चूर हो गयी हैं और हाथ से पतवार " प्रभो! मेरी दोनों भुजाएँ थककर  खिसक रही हैं, पाँव ऐसे जकड़ गये हैं कि पग-भर भी आगे नहीं बढ् सकते। यह मेरी छोटी-सी नैया मझधार में आ पड़ी है, अब यह किनारे लगे या डूब जाय; मैंने तो सब भार तुझ पर छोड दिया है।।३II - ShareChat