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हमारे विचार ही नये समाज के निर्माण की नीव होते है #durgeshjaiswalchaman #kavichaman #kavi
durgeshjaiswalchaman - नैतिकता और हम R थोड़ा गहनता के साथ काव्य का अध्ययन करने पर और विश्व जगत के दार्शनिकों और विचारकों को पढ़ने पर ज्ञात होता है कि इमोशनल इंटेलिजेंस से लेकर एप्टीट्यूड सत्यनिष्ठा निष्पक्षता, सामानभूति सहिष्णुता जैसे नैतिक जीवन में होता चला जाता है। फिर ऐसा लगता है का विकास हमारे मूल्यों मानो इस दुनिया की व्यर्थ बातों में क्या ही रखा है ; विश्व दार्शनिकों को पढ़ाता हूं॰ सुकरात प्लेटो अरस्तु ,कांट व जॉनराल्स जैसे दार्शनिकों को ,तो खो जाता हूं फिर आता हूं अपने भारतीय दर्शन में तो महात्मा बुद्ध के चार आर्यसत्य व अष्टांगिक मार्ग मैं निर्लप्त हो जाता हूं॰ फिर  आता है मुझको महात्मा जैन याद का वह त्रिरत्न, फिर देखता हूं शंकर के अद्वैतवादी सिद्धांत को और नब्यवेदांत जैसे दार्शनिक विचार को ।फिर देखता हूं विवेकानंद की उस  दरिद्रनारायण की अवधारणा, पढ़ता हूं गांधी और अंबेडकर के उस डिबेट को जिसमें दोनों के बीच था वह मतभेद लेकिन चाहते थे दोनों परिवर्तन ऊंच- में सुधार  नीच छुआछूत  समन्वय व सामाजिक स्थिति का। फिर देखता हूं राजा राममोहन राय और ज्योतिबा फुले जैसे सामाजिक सुधारकों को। फिर आता है मेरा मन आज के उन नेताओं और और प्रसाशकों पर जो नहीं समझते हैं अपना दायित्व अपने नैतिक मूल्य जो भ्रष्टाचार के चलते  अपनी सभी हदें पार कर जाते हैं | उनको नहीं होता तनिक भी संदेह अपनी उस करनी पर। व नई जनरेशन को जिनके जीवन में रह गया के युवा " फिर देखता हूं आज है वह 'रील' का क्षणिक सुख। फिर देखता हूं अच्छे विचार रखने वाले उन महानभावों को जिनकी नहीं होती वह कद्र फिर सोचता हूं और मुस्कुरा देता हूँ -दुर्गेश जायसवाल ' चमन नैतिकता और हम R थोड़ा गहनता के साथ काव्य का अध्ययन करने पर और विश्व जगत के दार्शनिकों और विचारकों को पढ़ने पर ज्ञात होता है कि इमोशनल इंटेलिजेंस से लेकर एप्टीट्यूड सत्यनिष्ठा निष्पक्षता, सामानभूति सहिष्णुता जैसे नैतिक जीवन में होता चला जाता है। फिर ऐसा लगता है का विकास हमारे मूल्यों मानो इस दुनिया की व्यर्थ बातों में क्या ही रखा है ; विश्व दार्शनिकों को पढ़ाता हूं॰ सुकरात प्लेटो अरस्तु ,कांट व जॉनराल्स जैसे दार्शनिकों को ,तो खो जाता हूं फिर आता हूं अपने भारतीय दर्शन में तो महात्मा बुद्ध के चार आर्यसत्य व अष्टांगिक मार्ग मैं निर्लप्त हो जाता हूं॰ फिर  आता है मुझको महात्मा जैन याद का वह त्रिरत्न, फिर देखता हूं शंकर के अद्वैतवादी सिद्धांत को और नब्यवेदांत जैसे दार्शनिक विचार को ।फिर देखता हूं विवेकानंद की उस  दरिद्रनारायण की अवधारणा, पढ़ता हूं गांधी और अंबेडकर के उस डिबेट को जिसमें दोनों के बीच था वह मतभेद लेकिन चाहते थे दोनों परिवर्तन ऊंच- में सुधार  नीच छुआछूत  समन्वय व सामाजिक स्थिति का। फिर देखता हूं राजा राममोहन राय और ज्योतिबा फुले जैसे सामाजिक सुधारकों को। फिर आता है मेरा मन आज के उन नेताओं और और प्रसाशकों पर जो नहीं समझते हैं अपना दायित्व अपने नैतिक मूल्य जो भ्रष्टाचार के चलते  अपनी सभी हदें पार कर जाते हैं | उनको नहीं होता तनिक भी संदेह अपनी उस करनी पर। व नई जनरेशन को जिनके जीवन में रह गया के युवा " फिर देखता हूं आज है वह 'रील' का क्षणिक सुख। फिर देखता हूं अच्छे विचार रखने वाले उन महानभावों को जिनकी नहीं होती वह कद्र फिर सोचता हूं और मुस्कुरा देता हूँ -दुर्गेश जायसवाल ' चमन - ShareChat