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।। ॐ ।। युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः। सु #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 खेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।। पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह 'ब्रह्मसंस्पर्श' अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है।
यथार्थ गीता - I3 Il युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः |   ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।  सुखेन  पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ  परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति सुखपूर्वक " के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह ' ब्रह्मसंस्पर्श अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है। I3 Il युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः |   ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।  सुखेन  पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ  परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति सुखपूर्वक " के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह ' ब्रह्मसंस्पर्श अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है। - ShareChat