#गुरु
🌊 गुरुभक्ति का महाकाव्य: शंखासुर वध और गुरु-दक्षिणा!
उज्जयिनी में महर्षि सांदीपनि का आश्रम। वह पवित्र स्थान जहाँ स्वयं जगत के पालनहार श्रीकृष्ण और बलराम एक साधारण शिष्य की भांति विद्या ग्रहण कर रहे थे।
मात्र 64 दिनों में समस्त वेदों, शास्त्रों और शस्त्र-विद्या में पारंगत होने के बाद, विदाई की बेला आ गई। दोनों भाई अपने गुरु के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
श्रीकृष्ण ने अत्यंत विनम्रता से कहा—
"गुरुदेव! आपकी कृपा से हमने समस्त विद्याएं प्राप्त कर ली हैं। अब हमें आदेश दें, हम आपकी सेवा में क्या गुरु-दक्षिणा अर्पित करें?"
गुरु की वेदना और असंभव मांग:
महर्षि सांदीपनि जानते थे कि ये बालक साधारण नहीं हैं। उनका हृदय भर आया। गुरुमाता की सूनी गोद उन्हें स्मरण हो आई।
उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा—
"पुत्र! प्रभास क्षेत्र के समुद्र में मेरा युवा पुत्र डूब गया था। वर्षों बीत गए, पर उसकी माँ के आंसू नहीं सूखे। यदि तुम सामर्थ्यवान हो, तो मेरे मृत पुत्र को वापस ले आओ। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"
मृत्यु के मुख से किसी को वापस लाना? यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध था। किन्तु गुरु का आदेश था!
श्रीकृष्ण और बलराम ने तत्क्षण "तथास्तु" कहा और रथ को वायुवेग से समुद्र तट की ओर बढ़ा दिया।
👹 शंखासुर का आतंक और समुद्र तट:
समुद्र के किनारे पहुँचकर श्रीकृष्ण ने सागर देव का आह्वान किया। लहरें शांत हो गईं। तभी उन्होंने देखा कि एक विशालकाय दैत्य—शंखासुर (पंचजन), जिसका शरीर शंख के समान कठोर कवच से ढका था, एक बालक को पकड़कर समुद्र की गहराइयों में भाग रहा है।
वही बालक गुरु सांदीपनि का पुत्र था!
शंखासुर समुद्र का वह क्रूर राक्षस था जिसने ऋषियों और देवताओं को त्रस्त कर रखा था। वह शंख रूपी कवच में छिपकर रहता था, जिससे उस पर किसी शस्त्र का प्रभाव नहीं होता था।
⚔️ महायुद्ध: देव और दानव का संघर्ष:
श्रीकृष्ण ने शंखासुर को ललकारा। अपनी शक्ति के मद में चूर शंखासुर ने सोचा कि ये दो कोमल बालक उसका क्या बिगाड़ लेंगे?
परन्तु उसे ज्ञात नहीं था कि उसका सामना साक्षात काल से है।
* प्रहार: शंखासुर ने अपनी मायावी शक्तियों से समुद्र में भयंकर तूफ़ान खड़ा कर दिया।
* प्रतिकार: बलराम जी ने अपने हल से लहरों को चीर दिया और श्रीकृष्ण ने समुद्र में छलांग लगा दी।
जल के भीतर एक भयानक द्वंद्व हुआ। श्रीकृष्ण ने शंखासुर को दबोच लिया। उस दैत्य ने बहुत संघर्ष किया, किन्तु भगवान की पकड़ से कौन छूट सकता है?
अंततः श्रीकृष्ण ने शंखासुर को पछाड़ दिया और उसका वध कर दिया।
🐚 पाञ्चजन्य का प्राकट्य:
शंखासुर के मरने के बाद, उसके शरीर का वह शंख-रूपी कवच शेष रह गया। श्रीकृष्ण ने उसे धारण कर लिया। यह वही शंख था जो आगे चलकर 'पाञ्चजन्य' कहलाया, जिसकी ध्वनि से महाभारत के युद्ध में कौरवों के हृदय कांप उठते थे।
श्रीकृष्ण ने शंखासुर की कैद से गुरु-पुत्र को मुक्त कराया।
बालक को लेकर दोनों भाई पुनः सांदीपनि मुनि के आश्रम पहुँचे।
कल्पना कीजिए उस दृश्य की—
एक पिता, जिसने आशा त्याग दी थी, आज अपने खोए हुए पुत्र को जीवित देख रहा था। गुरु सांदीपनि और गुरुमाता दौड़कर आए और अपने पुत्र को गले लगा लिया। पूरा आश्रम हर्षातिरेक से गूंज उठा।
महर्षि सांदीपनि गद्गद कंठ से बोले—
"हे कृष्ण! हे राम! आज आपने केवल गुरु-दक्षिणा नहीं दी, आपने मुझे मेरा जीवन लौटा दिया है। यह संसार सदैव याद रखेगा कि गुरु की प्रसन्नता के लिए ईश्वर यमलोक तक भी जा सकता है।"
यह कथा हमें जीवन के तीन अमूल्य सूत्र देती है:
* सर्वोपरि गुरुभक्ति: त्रिलोकीनाथ होकर भी श्रीकृष्ण ने गुरु की आज्ञा को सिर-माथे रखा। यह सिद्ध करता है कि गुरु का स्थान गोविंद से भी पहले आता है।
* सामर्थ्य का सदुपयोग: शक्ति का अर्थ केवल संहार नहीं, बल्कि अपनों के आंसू पोंछना और असंभव को संभव करना है।
* पाप का अंत: शंखासुर जैसा शक्तिशाली पापी भी जब धर्म से टकराता है, तो उसका अंत निश्चित है; और उसका शेष (शंख) भी भगवान का वाद्य बन जाता है।
🙏 राधे-राधे 🙏


