###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१५२
🙏🥀🚩 वाल्मीकि रामायण 🚩🥀🙏
🚩 अयोध्या कांड 🚩
🚩 इकहत्तरवाँ सर्ग 🚩
(रथ और सेनासहित भरतकी यात्रा, विभिन्न स्थानों को पार करके उनका उज्जिहाना नगरीके उद्यान में पहुँचना और सेनाको धीरे -धीरे आनेकी आज्ञा दे स्वयं रथद्वारा तीव्रवेगसे आगे बढ़ते हुए सालवनको पार करके अयोध्या के निकट जाना,वहाँसे अयोध्याकी दुरवस्था देखते हुए आगे बढ़ना और सारथि से अपना दुःख पूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवन में प्रवेश करना)
राजगृहसे निकलकर पराक्रमी भरत पूर्वदिशाकी ओर
चले। उन तेजस्वी राजकुमारने मार्गमें सुदामा नदीका दर्शन करके उसे पार किया। तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनन्दन श्रीमान् भरतने, जिसका पाट दूरतक फैला हुआ था, उस ह्रादिनी नदीको लाँघकर पश्चिमाभिमुख बहनेवाली शतद्रु नदी (सतलज) को पार किया ॥ १-२॥
वहाँसे ऐलधान नामक गाँवमें जाकर वहाँ बहनेवाली नदीको पार किया। तत्पश्चात् वे अपरपर्वत नामक जनपदमें गये। वहाँ शिला नामकी नदी बहती थी, जो अपने भीतर पड़ी हुई वस्तुको शिलास्वरूप बना देती थी। उसे पार करके
भरत वहाँसे आग्नेय कोणमें स्थित शल्यकर्षण नामक देशमें गये, जहाँ शरीरसे काँटेको निकालनेमें सहायता करनेवाली ओषधि उपलब्ध होती थी ॥ ३ ॥
तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ भरतने पवित्र होकर शिलावहा नामक नदीका दर्शन किया (जो अपनी प्रखर धारासे शिलाखण्डों— बड़ी-बड़ी चट्टानोंको भी बहा ले जानेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध थी) । उस नदीका दर्शन करके वे आगे बढ़ गये और बड़े-बड़े पर्वतोंको लाँघते चैत्ररथ हुए नामक वनमें जा पहुँचे ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा गङ्गाकी धारा-
विशेषके सङ्गमसे होते हुए उन्होंने वीरमत्स्य देशके उत्तरवर्ती देशोंमें पदार्पण किया और वहाँसे आगे बढ़कर वे
भारुण्डवनके भीतर गये ॥ ५ ॥
फिर अत्यन्त वेगसे बहनेवाली तथा पर्वतोंसे घिरी होनेके
कारण अपने प्रखर प्रवाहके द्वारा कलकल नाद करनेवाली
कुलिङ्गा नदीको पार करके यमुनाके तटपर पहुँचकर उन्होंने सेनाको विश्राम कराया ॥ ६ ॥
थके हुए घोड़ोंको नहलाकर उनके अङ्गोंको शीतलता
प्रदान करके उन्हें छायामें घास आदि देकर आराम करनेका
अवसर दे राजकुमार भरत स्वयं भी स्नान और जलपान
करके रास्तेके लिये जल साथ ले आगे बढ़े। मङ्गलाचारसे
युक्त हो माङ्गलिक रथके द्वारा उन्होंने, जिसमें मनुष्योंका
बहुधा आना-जाना या रहना नहीं होता था, उस विशाल
वनको उसी प्रकार वेगपूर्वक पार किया, जैसे वायु
आकाशको लाँघ जाती है ॥ ७-८॥
तत्पश्चात् अंशुधान नामक ग्रामके पास महानदी भागीरथी
गङ्गाको दुस्तर जानकर रघुनन्दन भरत तुरंत ही प्राग्वट नामसे विख्यात नगरमें आ गये ॥ ९ ॥
प्राग्वट नगरमें गङ्गाको पार करके वे कुटिकोष्टिका
नामवाली नदीके तटपर आये और सेनासहित उसको भी पार करके धर्मवर्धन नामक ग्राममें जा पहुँचे ॥ १० ॥
वहाँसे तोरण ग्रामके दक्षिणार्ध भागमें होते हुए
जम्बूप्रस्थमें गये। तदनन्तर दशरथकुमार भरत एक रमणीय
ग्राममें गये, जो वरूथके नामसे विख्यात था ॥ ११ ॥
वहाँ एक रमणीय वनमें निवास करके वे प्रातःकाल पूर्व
दिशाकी ओर गये । जाते-जाते उज्जिहाना नगरीके उद्यानमें
पहुँच गये, जहाँ कदम्ब नामवाले वृक्षोंकी बहुतायत थी ।
उन कदम्बोंके उद्यानमें पहुँचकर अपने रथमें शीघ्रगामी
घोड़ोंको जोतकर सेनाको धीरे-धीरे आनेकी आज्ञा दे भरत
तीव्रगतिसे चल दिये ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् सर्वतीर्थ नामक ग्राममें एक रात रहकर
उत्तानिका नदी तथा अन्य नदियोंको भी नाना प्रकारके
पर्वतीय घोड़ोंद्वारा जुते हुए रथसे पार करके नरश्रेष्ठ भरतजी हस्तिपृष्ठक नामक ग्राममें जा पहुँचे। वहाँसे आगे जानेपर उन्होंने कुटिका नदी पार की। फिर लोहित्य नामक ग्राममें पहुँचकर कपीवती नामक नदीको पार किया ॥ १४-१५ ॥
🙏🚩🥀 फिर एकसाल नगरके पास स्थाणुमती और विनत-ग्रामके
निकट गोमती नदीको पार करके वे तुरंत ही कलिङ्गनगरके
पास सालवनमें जा पहुँचे ।। १६ ।
वहाँ जाते-जाते भरतके घोड़े थक गये। तब उन्हें विश्राम
देकर वे रातों-रात शीघ्र ही सालवनको लाँघ गये और
अरुणोदयकालमें राजा मनुकी बसायी हुई अयोध्यापुरीका
उन्होंने दर्शन किया। पुरुषसिंह भरत मार्गमें सात रातें व्यतीत करके आठवें दिन अयोध्यापुरीका दर्शन कर सके थे ॥
सामने अयोध्यापुरीको देखकर वे अपने सारथिसे इस
प्रकार बोले– 'सूत ! पवित्र उद्यानोंसे सुशोभित यह
यशस्विनी नगरी आज मुझे अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देती
यह वही नगरी है, जहाँ निरन्तर यज्ञ-याग करनेवाले
गुणवान् और वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मण निवास करते हैं, जहाँ बहुत-से धनियोंकी भी बस्ती है तथा राजर्षियों में श्रेष्ठ महाराज दशरथ जिसका पालन करते हैं, वही अयोध्या इस समय दूरसे सफेद मिट्टीके ढूहकी भाँति दीख रही है ।
'पहले अयोध्यामें चारों ओर नर-नारियोंका महान्
तुमुलनाद सुनायी पड़ता था; परंतु आज मैं उसे नहीं
सुन रहा हूँ ॥१७-१८-१९-२०- २१ ॥
'सायंकालके समय लोग उद्यानोंमें प्रवेश करके वहाँ
क्रीड़ा करते और उस क्रीड़ासे निवृत्त होकर सब ओरसे अपने घरोंकी ओर दौड़ते थे, अतः उस समय इन उद्यानोंकी अपूर्व शोभा होती थी, परंतु आज ये मुझे कुछ और ही प्रकारके दिखायी देते हैं। वे ही उद्यान आज कामीजनोंसे परित्यक्त होकर रोते हुए-से प्रतीत होते हैं ॥ २२-२३ ।।
'सारथे ! यह पुरी मुझे जंगल-सी जान पड़ती है। अब
यहाँ पहलेकी भाँति घोड़ों, हाथियों तथा दूसरी- दूसरी
सवारियोंसे आते-जाते हुए श्रेष्ठ मनुष्य नहीं दिखायी दे
रहे हैं ॥ २४ ॥
'जो उद्यान पहले मदमत्त एवं आनन्दमग्न भ्रमरों,
कोकिलों और नर-नारियोंसे भरे प्रतीत होते थे तथा लोगोंके प्रेम-मिलनके लिये अत्यन्त गुणकारी (अनुकूल
सुविधाओंसे सम्पन्न) थे, उन्हींको आज मैं सर्वथा
आनन्दशून्य देख रहा हूँ। वहाँ मार्गपर वृक्षोंके जो पत्ते गिर
रहे हैं, उनके द्वारा मानो वे वृक्ष करुण क्रन्दन कर रहे हैं
(और उनसे उपलक्षित होनेके कारण वे उद्यान आनन्दहीन
प्रतीत होते हैं) ॥ २५-२६ ॥
'रागयुक्त मधुर कलरव करनेवाले मतवाले मृगों और
पक्षियोंका तुमुल शब्द अभीतक सुनायी नहीं पड़ रहा है।
'चन्दन और अगुरुकी सुगन्धसे मिश्रित तथा धूपकी
मनोहर गन्धसे व्याप्त निर्मल मनोरम समीर आज पहलेकी
भाँति क्यों नहीं प्रवाहित हो रहा है ? ॥ २८ ॥
'वादनदण्डद्वारा बजायी जानेवाली भेरी, मृदङ्ग और
वीणाका जो आघातजनित शब्द होता है, वह पहले
अयोध्यामें सदा होता रहता था, कभी उसकी गति अवरुद्ध
नहीं होती थी; परंतु आज वह शब्द न जाने क्यों बंद हो
गया है ? ।। २९ ।।
'मुझे अनेक प्रकारके अनिष्टकारी, क्रूर और अशुभ-
सूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं, जिससे मेरा मन खिन्न
हो रहा है ।। ३० ।।
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'सारथे ! इससे प्रतीत होता है कि इस समय मेरे बान्धवोंको कुशल-मङ्गल सर्वथा दुर्लभ है, तभी तो मोहका कोई कारण न होनेपर भी मेरा हृदय बैठा जा रहा है' ॥ ३१ ॥
भरत मन-ही-मन बहुत खिन्न थे। उनका हृदय शिथिल
हो रहा था। वे डरे हुए थे और उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध
हो उठी थीं, इसी अवस्थामें उन्होंने शीघ्रतापूर्वक इक्ष्वाकुवंशी राजाओंद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३२ ॥
पुरीके द्वारपर सदा वैजयन्ती पताका फहरानेके कारण उस
द्वारका नाम वैजयन्त रखा गया था।
(यह पुरीके पश्चिम भागमें था।) उस वैजयन्तद्वारसे भरत पुरीके भीतर प्रविष्ट हुए। उस समय उनके रथके घोड़े बहुत थके हुए थे। द्वारपालोंने उठकर कहा – 'महाराजकी जय हो !' फिर वे उनके साथ आगे बढ़े ।। ३३ ।।
भरतका हृदय एकाग्र नहीं था–वे घबराये हुए थे।
अतः उन रघुकुलनन्दन भरतने साथ आये हुए द्वारपालोंको
सत्कारपूर्वक लौटा दिया और केकयराज अश्वपतिके थके-
माँदे सारथिसे वहाँ इस प्रकार कहा – ।। ३४ ।।
'निष्पाप सूत ! मैं बिना कारण ही इतनी उतावलीके साथ
क्यों बुलाया गया ? इस बातका विचार करके मेरे हृदयमें
अशुभकी आशङ्का होती है। मेरा दीनतारहित स्वभाव भी
अपनी स्थितिसे भ्रष्ट-सा हो रहा है ॥ ३५ ॥
'सारथे ! अबसे पहले मैंने राजाओंके विनाशके जैसे-जैसे लक्षण सुन रखे हैं, उन सभी लक्षणोंको आज मैं
यहाँ देख रहा हूँ ॥ ३६॥
'मैं देखता हूँ — गृहस्थोंके घरोंमें झाड़ू नहीं लगी
है। वे रूखे और श्रीहीन दिखायी देते हैं। इनकी किवाड़ें
खुली हैं। इन घरोंमें बलिवैश्वदेवकर्म नहीं हो रहे हैं। ये
धूपकी सुगन्धसे वञ्चित हैं। इनमें रहनेवाले कुटुम्बीजनोंको
जन नहीं प्राप्त हुआ है तथा ये सारे गृह प्रभाहीन (उदास)
खायी देते हैं। जान पड़ता है— इनमें लक्ष्मीका निवास
हीं है ।। ३७-३८ ।।
'देवमन्दिर फूलोंसे सजे हुए नहीं दिखायी देते। इनके
नाँगन झाड़े-बुहारे नहीं गये हैं। ये मनुष्योंसे सूने हो रहे हैं,
तएव इनकी पहले-जैसी शोभा नहीं हो रही है ॥ ३९ ॥
'देवप्रतिमाओंकी पूजा बंद हो गयी है। यज्ञशालाओंमें
यज्ञ नहीं हो रहे हैं। फूलों और मालाओंके बाजारमें आज
बकनेकी कोई वस्तुएँ नहीं शोभित हो रही हैं। यहाँ पहलेके
मान बनिये भी आज नहीं दिखायी देते हैं। चिन्तासे उनका
हृदय उद्विग्न जान पड़ता है और अपना व्यापार नष्ट हो जानेके कारण वे संकुचित हो रहे हैं ।। ४०-४१ ।।
'देवालयों तथा चैत्य (देव) वृक्षोंपर जिनका निवास है,
वे पशु-पक्षी दीन दिखायी दे रहे हैं। मैं देखता हूँ, नगरके सभी स्त्री-पुरुषोंका मुख मलिन है, उनकी आँखोंमें आँसू भरे हैं और वे सब-के-सब दीन, चिन्तित, दुर्बल तथा उत्कण्ठित हैं' ॥ ४२-४३।।
सारथिसे ऐसा कहकर अयोध्यामें होनेवाले उन अनिष्ट-
सूचक चिह्नोंको देखते हुए भरत मन-ही-मन दुःखी हो
राजमहलमें गये ॥ ४४ ॥
जो अयोध्यापुरी कभी देवराज इन्द्रकी नगरीके समान
शोभा पाती थी; उसीके चौराहे, घर और सड़कें आज सूनी
दिखायी देती थीं तथा दरवाजोंकी किवाड़ें धूलि-धूसर
हो रही थीं, उसकी ऐसी दुर्दशा देख भरत पूर्णतः दुःखमें
निमग्न हो गये ॥ ४५ ॥
उस नगरमें जो पहले कभी नहीं हुई थीं, ऐसी अप्रिय
बातोंको देखकर महात्मा भरतने अपना मस्तक नीचेको झुका लिया, उनका हर्ष छिन गया और उन्होंने दीन-हृदयसे पिताके भवनमें प्रवेश किया ॥ ४६ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके
के अयोध्याकाण्डमें इकहत्तरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ।। ७१ ॥
🙏🚩🥀 जय सियाराम 🥀🚩🙏
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