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##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #🤗जया किशोरी जी🕉️
#भगवद गीता🙏🕉️ - तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं  ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः I। जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही जिनकी निरन्तर एकीभावसे स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्तिको  अर्थात् परमगतिको प्राप्त होते हैँ Il १७ ।l विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। ঈন श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः I।  शुनि वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डालमें भी समदर्शी * ही होते हैं Il १८ II इसका विस्तार गीता अध्याय ६ श्लोक ३२ को टिप्पणीमें देखना चाहिये। इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः | निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः I।  जिनका मन समभावमें स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्थामें ही संसार जीत लिया गया মম্পুত है, क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही स्थित हैँ II१९ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 5 गीता प्रेस , गोरखपुर से साभार तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं  ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः I। जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही जिनकी निरन्तर एकीभावसे स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्तिको  अर्थात् परमगतिको प्राप्त होते हैँ Il १७ ।l विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। ঈন श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः I।  शुनि वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डालमें भी समदर्शी * ही होते हैं Il १८ II इसका विस्तार गीता अध्याय ६ श्लोक ३२ को टिप्पणीमें देखना चाहिये। इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः | निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः I।  जिनका मन समभावमें स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्थामें ही संसार जीत लिया गया মম্পুত है, क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही स्थित हैँ II१९ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 5 गीता प्रेस , गोरखपुर से साभार - ShareChat