#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुरधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म की सम्मति से सत्यवती द्वारा व्यास का आवाहन और व्यासजी का माता की आज्ञा से कुरुवंश-की वृद्धि के लिये विचित्रवीर्य की पत्नियों के गर्भ से संतानोत्पादन करने की स्वीकृति देना...(दिन 322)
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भीष्म उवाच
पुनर्भरतवंशस्य हेतुं संतानवृद्धये ।
वक्ष्यामि नियतं मातस्तन्मे निगदतः शृणु ।। १ ।।
ब्राह्मणो गुणवान् कश्चिद् धनेनोपनिमन्त्र्यताम् ।
विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत् प्रजाः ।। २ ।।
भीष्मजी कहते हैं- मातः ! भरतवंशकी संतानपरम्पराको बढ़ाने और सुरक्षित रखनेके लिये जो नियत उपाय है, उसे मैं बता रहा हूँ; सुनो। किसी गुणवान् ब्राह्मणको धन देकर बुलाओ, जो विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंके गर्भसे संतान उत्पन्न कर सके ।। १-२ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततः सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया । विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमब्रवीत् ।। ३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तब सत्यवती कुछ हँसती और साथ ही लजाती हुई भीष्मजीसे इस प्रकार बोली। बोलते समय उसकी वाणी संकोचसे कुछ अस्पष्ट-सी हो जाती थी ।। ३ ।।
सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
विश्वासात् ते प्रवक्ष्यामि संतानाय कुलस्य नः ।। ४ ।।
उसने कहा- 'महाबाहु भीष्म ! तुम जैसा कहते हो वही ठीक है। तुमपर विश्वास होनेसे अपने कुलकी संततिकी रक्षाके लिये तुम्हें मैं एक बात बतलाती हूँ ।। ४ ।।
न ते शक्यमनाख्यातुमापद्धर्म तथाविधम् ।
त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परा गतिः ।। ५ ।।
'ऐसे आपद्धर्मको देखकर वह बात तुम्हें बताये बिना मैं नहीं रह सकती। तुम्हीं हमारे कुलमें मूर्तिमान् धर्म हो, तुम्हीं सत्य हो और तुम्हीं परम गति हो ।। ५ ।।
तस्मान्निशम्य सत्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम् । (यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतस्ते भरतर्षभ । तस्य शुक्रादहं मत्स्याद् धृता कुक्षौ पुरा किल ।।
मातरं मे जलाद्धृत्वा दाशः परमधर्मवित् । मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वे ह्यकल्पयत् ।।) धर्मयुक्तस्य धर्मार्थ पितुरासीत् तरी मम ।। ६ ।।
'अतः मेरी सच्ची बात सुनकर उसके बाद जो कर्तव्य हो, उसे करो। 'भरतश्रेष्ठ ! तुमने महाराज वसुका नाम सुना होगा। पूर्वकालमें मैं उन्हींके वीर्यसे उत्पन्न हुई थी। मुझे एक मछलीने अपने पेटमें धारण किया था। एक परम धर्मज्ञ मल्लाहने जलमेंसे मेरी माताको पकड़ा, उसके पेटसे मुझे निकाला और अपने घर लाकर अपनी पुत्री बनाकर रखा। मेरे उन धर्मपरायण पिताके पास एक नौका थी, जो (धनके लिये नहीं) धर्मार्थ चलायी जाती थी ।। ६ ।।
सा कदाचिदहं तत्र गता प्रथमयौवनम् । अथ धर्मविदां श्रेष्ठः परमर्षिः पराशरः ।। ७ ।। आजगाम तरीं धीमांस्तरिष्यन् यमुनां नदीम् । स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत् तदा ।। ८ ।।
सान्त्वपूर्व मुनिश्रेष्ठः कामार्तों मधुरं वचः ।
उक्तं जन्म कुलं मह्यमस्मि दाशसुतेत्यहम् ।। ९ ।।
'एक दिन मैं उसी नावपर गयी हुई थी। उन दिनों मेरे यौवनका प्रारम्भ था। उसी समय धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् महर्षि पराशर यमुना नदी पार करनेके लिये मेरी नावपर आये। मैं उन्हें पार ले जा रही थी, तबतक वे मुनिश्रेष्ठ काम-पीड़ित हो मेरे पास आ मुझे समझाते हुए मधुर वाणीमें बोले और उन्होंने मुझसे अपने जन्म और कुलका परिचय दिया। इसपर मैंने कहा- 'भगवन्! मैं तो निषाद की पुत्री हूँ' ।। ७-९ ।।
तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत ।
वरैरसुलभैरुक्ता न प्रत्याख्यातुमुत्सहे ।। १० ।।
'भारत! एक ओर में पिताजीसे डरती थी और दूसरी ओर मुझे मुनिके शापका भी डर था। उस समय महर्षिने मुझे दुर्लभ वर देकर उत्साहित किया, जिससे मैं उनके अनुरोधको टाल न सकी ।। १० ।।
अभिभूय स मां बालां तेजसा वशमानयत् । तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत ।। ११ ।।
मत्स्यगन्धो महानासीत् पुरा मम जुगुप्सितः ।
तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात् स मे मुनिः ।। १२ ।।
'यद्यपि मैं चाहती नहीं थी, तो भी उन्होंने मुझ अबलाको अपने तेजसे तिरस्कृत करके नौकापर ही मुझे अपने वशमें कर लिया। उस समय उन्होंने कुहरा उत्पन्न करके सम्पूर्ण लोकको अन्धकारसे आवृत कर दिया था। भारत ! पहले मेरे शरीरसे अत्यन्त घृणित मछलीकी-सी बड़ी तीव्र दुर्गन्ध आती थी। उसको मिटाकर मुनिने मुझे यह उत्तम गन्ध प्रदान की थी ।। ११-१२ ।।
ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् ।
द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि ।। १३ ।।
'तदनन्तर मुनिने मुझसे कहा- 'तुम इस यमुनाके ही द्वीपमें मेरे द्वारा स्थापित इस गर्भको त्यागकर फिर कन्या ही हो जाओगी' ।। १३ ।।
पाराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषिः । कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः ।। १४ ।।
'उस गर्भसे पराशरजीके पुत्र महान् योगी महर्षि व्यास प्रकट हुए। वे ही द्वैपायन नामसे विख्यात हैं। वे मेरे कन्यावस्थाके पुत्र हैं ।। १४ ।।
यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः ।
लोके व्यासत्वमापेदे कार्य्यात् कृष्णत्वमेव च ।। १५ ।।
'वे भगवान् द्वैपायन मुनि अपने तपोबलसे चारों वेदोंका पृथक् पृथक् विस्तार करके लोकमें 'व्यास' पदवीको प्राप्त हुए हैं। शरीरका रंग साँवला होनेसे उन्हें लोग 'कृष्ण' भी कहते हैं ।। १५ ।।
सत्यवादी शमपरस्तपस्वी दग्धकिल्बिषः।
समुत्पन्नः स तु महान् सह पित्रा ततो गतः ।। १६ ।।
'वे सत्यवादी, शान्त, तपस्वी और पापशून्य हैं। वे उत्पन्न होते ही बड़े होकर उस द्वीपसे अपने पिताके साथ चले गये थे ।। १६ ।।
स नियुक्तो मया व्यक्तं त्वया चाप्रतिमद्युतिः ।
भ्रातुः क्षेत्रेषु कल्याणमपत्यं जनयिष्यति ।। १७ ।।
'मेरे और तुम्हारे आग्रह करने पर वे अनुपम तेजस्वी व्यास अवश्य ही अपने
भाई के क्षेत्र में कल्याणकारी संतान उत्पन्न करेंगे ।। १७ ।।
स हि मामुक्तवांस्तत्र स्मरेः कृच्छ्रेषु मामिति ।
तं स्मरिष्ये महाबाहो यदि भीष्म त्वमिच्छसि ।। १८ ।।
'उन्होंने जाते समय मुझसे कहा था कि संकटके समय मुझे याद करना। महाबाहु भीष्म ! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो मैं उन्हींका स्मरण करूँ ।। १८ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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