#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣2️⃣
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र आदि के जन्म तथा भीष्मजी के धर्मपूर्ण शासन से कुरुदेश की सर्वांगीण उन्नति का दिग्दर्शन...(दिन 332)
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स देशः परराष्ट्राणि विमृज्याभिप्रवर्धितः ।
भीष्मेण विहितं राष्ट्र धर्मचक्रमवर्तत ।। १४ ।।
वह देश दूसरे राष्ट्रोंका भी शोधन करके निरन्तर उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहा था। राष्ट्रमें सब ओर भीष्मजीके द्वारा चलाया हुआ धर्मका शासन चल रहा था ।। १४ ।।
क्रियमाणेषु कृत्येषु कुमाराणां महात्मनाम् । पौरजानपदाः सर्वे बभूवुः सततोत्सवाः ।। १५ ।।
उन महात्मा कुमारोंके यज्ञोपवीतादि संस्कार किये जानेके समय नगर और देशके सभी लोग निरन्तर उत्सव मनाते थे ।। १५ ।।
गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप । दीयतां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ।। १६ ।।
जनमेजय! कुरुकुलके प्रधान-प्रधान पुरुषों तथा अन्य नगरनिवासियोंके घरोंमें सदा सब ओर यही बात सुनायी देती थी कि 'दान दो और अतिथियोंको भोजन कराओ' ।। १६ ।।
धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विदुरश्च महामतिः । जन्मप्रभृति भीष्मेण पुत्रवत् परिपालिताः ।। १७ ।।
धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा परम बुद्धिमान् विदुर- इन तीनों भाइयोंका भीष्मजीने जन्मसे ही पुत्रकी भाँति पालन किया ।। १७ ।।
संस्कारैः संस्कृतास्ते तु व्रताध्ययनसंयुताः । श्रमव्यायामकुशलाः समपद्यन्त यौवनम् ।। १८ ।।
उन्होंने ही उनके सब संस्कार कराये। फिर वे ब्रह्मचर्यव्रतके पालन और वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर हो गये। परिश्रम और व्यायाममें भी उन्होंने बड़ी कुशलता प्राप्त की। फिर धीरे-धीरे वे युवावस्थाको प्राप्त हुए ।। १८ ।।
धनुर्वेदेऽश्वपृष्ठे च गदायुद्धेऽसिचर्मणि । तथैव गजशिक्षायां नीतिशास्त्रेषु पारगाः ।। १९ ।।
धनुर्वेद, घोड़ेकी सवारी, गदायुद्ध, ढाल-तलवारके प्रयोग, गजशिक्षा तथा नीतिशास्त्रमें वे तीनों भाई पारंगत हो गये ।। १९ ।।
इतिहासपुराणेषु नानाशिक्षासु बोधिताः ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः सर्वत्र कृतनिश्चयाः ।। २० ।।
उन्हें इतिहास, पुराण तथा नाना प्रकारके शिष्टाचारोंका भी ज्ञान कराया गया। वे वेद-वेदांगोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वत्र एक निश्चित सिद्धान्तके माननेवाले थे ।। २० ।।
पाण्डुर्थनुषि विक्रान्तो नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् । अन्येभ्यो बलवानासीद् धृतराष्ट्रो महीपतिः ।। २१ ।।
पाण्डु धनुर्विद्या में उस समय के मनुष्यों में सबसे बढ़-चढ़कर पराक्रमी थे। इसी प्रकार राजा धृतराष्ट्र दूसरे लोगोंकी अपेक्षा शारीरिक बलमें बहुत बढ़कर थे ।। २१ ।।
त्रिषु लोकेषु न त्वासीत् कश्चिद् विदुरसम्मितः । धर्मनित्यस्तथा राजन् धर्मे च परमं गतः ।। २२ ।।
राजन्! तीनों लोकोंमें विदुरजीके समान दूसरा कोई भी मनुष्य धर्मपरायण तथा धर्म में ऊँची अवस्था को प्राप्त (आत्मद्रष्टा) नहीं था ।। २२ ।।
प्रणष्टं शन्तनोर्वशं समीक्ष्य पुनरुद्धृतम् ।
ततो निर्वचनं लोके सर्वराष्ट्रेष्ववर्तत ।। २३ ।।
नष्ट हुए शान्तनुके वंशका पुनः उद्धार हुआ देखकर समस्त राष्ट्रके लोग परस्पर कहने लगे ।। २३ ।।
वीरसूनां काशिसुते देशानां कुरुजाङ्गलम् । सर्वधर्मविदां भीष्मः पुराणां गजसाह्वयम् ।। २४ ।।
धृतराष्ट्रस्त्वचक्षुष्ट्वाद् राज्यं न प्रत्यपद्यत । पारसवत्वाद् विदुरो राजा पाण्डुर्बभूव ह ।। २५ ।।
'वीर पुत्रोंको जन्म देनेवाली स्त्रियोंमें काशिराजकी दोनों पुत्रियाँ सबसे श्रेष्ठ हैं, देशोंमें कुरुजांगल देश सबसे उत्तम है, सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें भीष्मजीका स्थान सबसे ऊँचा है तथा नगरोंमें हस्तिनापुर सर्वोत्तम है।' धृतराष्ट्र अंधे होनेके कारण और विदुरजी पारशव (शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणद्वारा उत्पन्न) होनेसे राज्य न पा सके; अतः सबसे छोटे पाण्डु ही राजा हुए ।। २४-२५ ।।
कदाचिदथ गाङ्गेयः सर्वनीतिमतां वरः । विदुरं धर्मतत्त्वज्ञं वाक्यमाह यथोचितम् ।। २६ ।।
एक समयकी बात है, सम्पूर्ण नीतिज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मजी धर्मके तत्त्वको जाननेवाले विदुरजीसे इस प्रकार न्यायोचित वचन बोले है।।। २६ ।।
इति श्र आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुराज्याभिषेकेऽष्टाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुराज्याभिषेकविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०८ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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