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#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣7️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 317) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येऽनुमान्य च । प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते ।। १४ ।। 'कितने ही मनुष्य नियत धन लेकर कन्यादान करते हैं (यह आसुर विवाह है)। कुछ लोग बलसे कन्याका हरण करते हैं (यह राक्षस विवाह है)। दूसरे लोग वर और कन्याकी परस्पर अनुमति होनेपर विवाह करते हैं (यह गान्धर्व विवाह है)। कुछ लोग अचेत अवस्थामें पड़ी हुई कन्याको उठा ले जाते हैं (यह पैशाच विवाह है)। कुछ लोग वर और कन्याको एकत्र करके स्वयं ही उनसे प्रतिज्ञा कराते हैं कि हम दोनों गार्हस्थ्य धर्मका पालन करेंगे; फिर कन्यापिता दोनोंकी पूजा करके अलंकारयुक्त कन्याका वरके लिये दान करता है; इस प्रकार विवाहित होनेवाले (प्राजापत्य विवाहकी रीतिसे) पत्नीकी उपलब्धि करते हैं ।। १४ ।। आर्षं विधिं पुरस्कृत्य दारान् विन्दन्ति चापरे । अष्टमं तमथो वित्त विवाहं कविभिर्वृतम् ।। १५ ।। 'कुछ लोग आर्ष विधि (यज्ञ) करके ऋत्विजको कन्या देते हैं। इस प्रकार विवाहित होनेवाले (दैव विवाहकी रीतिसे) पत्नी प्राप्त करते हैं। इस तरह विद्वानोंने यह विवाहका आठवाँ प्रकार माना है। इन सबको तुमलोग समझो ।। १५ ।। स्वयंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपयान्ति च। प्रमथ्य तु हृतामाहुर्ज्यायसीं धर्मवादिनः ।। १६ ।। 'क्षत्रिय स्वयंवरकी प्रशंसा करते और उसमें जाते हैं; परंतु उसमें भी समस्त राजाओंको परास्त करके जिस कन्याका अपहरण किया जाता है, धर्मवादी विद्वान् क्षत्रियके लिये उसे सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ।। १६ ।। ता इमाः पृथिवीपाला जिहीर्षामि बलादितः । ते यतध्वं परं शक्त्या विजयायेतराय वा ।। १७ ।। 'अतः भूमिपालो ! मैं इन कन्याओंको यहाँसे बलपूर्वक हर ले जाना चाहता हूँ। तुमलोग अपनी सारी शक्ति लगाकर विजय अथवा पराजयके लिये मुझे रोकनेका प्रयत्न करो ।। १७ ।। स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय कृतनिश्चयः । एवमुक्त्वा महीपालान् काशिराजं च वीर्यवान् ।। १८ ।। सर्वाः कन्याः स कौरव्यो रथमारोप्य च स्वकम् । आमन्त्र्य च स तान् प्रायाच्छीघ्रं कन्याः प्रगृह्य ताः ।। १९ ।। 'राजाओ! मैं युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके यहाँ डटा हुआ हूँ।' परम पराक्रमी कुरुकुलश्रेष्ठ भीष्मजी उन महीपालों तथा काशिराजसे उपर्युक्त बातें कहकर उन समस्त कन्याओंको, जिन्हें वे उठाकर अपने रथपर बिठा चुके थे, साथ लेकर सबको ललकारते हुए वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल दिये ।। १८-१९ ।। ततस्ते पार्थिवाः सर्वे समुत्पेतुरमर्षिताः । संस्पृशन्तः स्वकान् बाहून् दशन्तो दशनच्छदान् ।। २० ।। फिर तो समस्त राजा इस अपमानको न सह सके; वे अपनी भुजाओंका स्पर्श करते (ताल ठोकते) और दाँतोंसे ओठ चबाते हुए अपनी जगहसे उछल पड़े ।। २० ।। तेषामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् । आमुञ्चतां च वर्माणि सम्भ्रमः सुमहानभूत् ।। २१ ।। सब लोग जल्दी-जल्दी अपने आभूषण उतारकर कवच पहनने लगे। उस समय बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।। २१ ।। ताराणामिव सम्पातो बभूव जनमेजय । भूषणानां च सर्वेषां कवचानां च सर्वशः ।। २२ ।। सवर्मभिर्भूणैश्च प्रकीर्यद्भिरितस्ततः । सक्रोधामर्षजिह्म भूकषायीकृतलोचनाः ।। २३ ।। सूतोपक्लृप्तान् रुचिरान् सदश्वरुपकल्पितान् । रथानास्थाय ते वीराः सर्वप्रहरणान्विताः ।। २४ ।। प्रयान्तमथ कौरव्यमनुससुरुदायुधाः । ततः समभवद् युद्धं तेषां तस्य च भारत । एकस्य च बहूनां च तुमुलं लोमहर्षणम् ।। २५ ।। जनमेजय ! जल्दबाजीके कारण उन सबके आभूषण और कवच इधर-उधर गिर पड़ते थे। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर गिर रहे हों। कितने ही योद्धाओंके कवच और गहने इधर-उधर बिखर गये। क्रोध और अमर्षके कारण उनकी भौंहें टेढ़ी और आँखें लाल हो गयी थीं। सारथियोंने सुन्दर रथ सजाकर उनमें सुन्दर अश्व जोत दिये थे। उन रथोंपर बैठकर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो हथियार उठाये हुए उन वीरोंने जाते हुए कुरुनन्दन भीष्मजीका पीछा किया। जनमेजय ! तदनन्तर उन राजाओं और भीष्मजीका घोर संग्राम हुआ। भीष्मजी अकेले थे और राजालोग बहुत । उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर संग्राम छिड़ गया ।। २२-२५ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
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