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#शब्द संवाद #📚कविता-कहानी संग्रह #✍️ साहित्य एवं शायरी #📓 हिंदी साहित्य
शब्द संवाद - सुंदर भाँवों को लाइए पी एस यादव 'अजनबी ' सफर बेशक ह्ये जंग लड़ते जाइए। उलझनों " HI मुश्किलों में भी सत्य जिंदा बस दृष्टि तो दौड़ाइए।  बिछाए हर जगह बहेलिए खड़े हुए अपना जाल टूटेंगे झूठ के भी द्वारे मुश्किलों से नहीं घबराइए।  जिँदगी का हर कदम समझिए है एक इंतकाम। में बढ़ना 7 उलझी घडियों ही समझिए एक संग्राम |  संघर्ष ही लेकर आता अंधेरों का समाधान हमारे दुःखों का अंधेरा भी छटेगा , ज्योति तो जलाइए।  वक्त के साथ चलने वाले को ही मिलता सवेरा। जहां हो जाए अंधेरा चही पर समझिए है बसेरा।  प्रति क्षण में हो लगन समझो चो उन्नति के पास॰ सपनों की दुनिया से निकलो खुद को जगाइए। धरती पर हरियाली तभी जीवन रूपी है जह्यन। जो प्रकृति के ज्यादा करीब, समझो वहीं महान।  जोश में गर हयोश है तो समझो जिँदगी के करीब, तोड़ो बहम की दीवारें मन में सत्य को समाइए।  स्वर्ग नर्क मानव की सोच के ही सृजित आधार| सच और झूठ हमारी वृतियों का समझो आकार। जीवन मधुवन पहले मिठास तो लाओ हर वक्त दृष्टि कहीं भी जा सकती है दृष्टिकोण बचाइए। कुंठा की जहां आवृत्ति वही विद्रोह की उत्पत्ति। उदगम वहां कहां मन में संतृप्ति। संशय का जहां अंदर ही सृजित साकारात्मक सोच के মমাখান; पहले भटकते हुए मन में सुंदर भावों को लाइए। सुंदर भाँवों को लाइए पी एस यादव 'अजनबी ' सफर बेशक ह्ये जंग लड़ते जाइए। उलझनों " HI मुश्किलों में भी सत्य जिंदा बस दृष्टि तो दौड़ाइए।  बिछाए हर जगह बहेलिए खड़े हुए अपना जाल टूटेंगे झूठ के भी द्वारे मुश्किलों से नहीं घबराइए।  जिँदगी का हर कदम समझिए है एक इंतकाम। में बढ़ना 7 उलझी घडियों ही समझिए एक संग्राम |  संघर्ष ही लेकर आता अंधेरों का समाधान हमारे दुःखों का अंधेरा भी छटेगा , ज्योति तो जलाइए।  वक्त के साथ चलने वाले को ही मिलता सवेरा। जहां हो जाए अंधेरा चही पर समझिए है बसेरा।  प्रति क्षण में हो लगन समझो चो उन्नति के पास॰ सपनों की दुनिया से निकलो खुद को जगाइए। धरती पर हरियाली तभी जीवन रूपी है जह्यन। जो प्रकृति के ज्यादा करीब, समझो वहीं महान।  जोश में गर हयोश है तो समझो जिँदगी के करीब, तोड़ो बहम की दीवारें मन में सत्य को समाइए।  स्वर्ग नर्क मानव की सोच के ही सृजित आधार| सच और झूठ हमारी वृतियों का समझो आकार। जीवन मधुवन पहले मिठास तो लाओ हर वक्त दृष्टि कहीं भी जा सकती है दृष्टिकोण बचाइए। कुंठा की जहां आवृत्ति वही विद्रोह की उत्पत्ति। उदगम वहां कहां मन में संतृप्ति। संशय का जहां अंदर ही सृजित साकारात्मक सोच के মমাখান; पहले भटकते हुए मन में सुंदर भावों को लाइए। - ShareChat