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रुबाई जलालुद्दीन #सूफी काव्य
सूफी काव्य - 7 5 कि तुरा ब-बीनम आदीना ए-मा-अस्त हर रोज़़ ब-्दौलतत ब अज़़ देने एनमा-अस्त गर चर्ख़ ओ ्हज़ार चर्ख़ दर कीना ए॰मा-अस्त ग़म नीस्त चू मेहर ए॰्यार दर सीना ए-्मास्त भावार्थः जिस रोज़ से आसमान ने मुझे तुझसे जुदा किया, किसी ने मुझे कभी हँसते हुए नहीं देखा, तेरी जुदाई में दिल इतना ग़मगीन है कि इस का अंदाज़ा मुझे है या बस ख़ुदा को है। 64 App Want Motivationat Videos 7 5 कि तुरा ब-बीनम आदीना ए-मा-अस्त हर रोज़़ ब-्दौलतत ब अज़़ देने एनमा-अस्त गर चर्ख़ ओ ्हज़ार चर्ख़ दर कीना ए॰मा-अस्त ग़म नीस्त चू मेहर ए॰्यार दर सीना ए-्मास्त भावार्थः जिस रोज़ से आसमान ने मुझे तुझसे जुदा किया, किसी ने मुझे कभी हँसते हुए नहीं देखा, तेरी जुदाई में दिल इतना ग़मगीन है कि इस का अंदाज़ा मुझे है या बस ख़ुदा को है। 64 App Want Motivationat Videos - ShareChat