लुप्तप्राय प्रजाति दिवस : यह हर साल मई के तीसरे शुक्रवार को मनाया जाता है। यह दिन लुप्तप्राय प्रजातियों और उनके आवासों की रक्षा के महत्व और उनकी रक्षा के लिए आवश्यक कार्रवाई करने के बारे में जागरूकता फैलाता है। इसलिए, लुप्तप्राय प्रजाति दिवस हमारे देश की लुप्तप्राय प्रजातियों और उनके आवासों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय संरक्षण प्रयासों को मान्यता देता है। यह दिन डेविड रॉबिन्सन और लुप्तप्राय प्रजाति गठबंधन द्वारा 2006 में बनाया और स्थापित किया गया था और तब से इसे मनाया जाना जारी है। यह प्रतिवर्ष मई के तीसरे शुक्रवार को मनाया जाता है। इस दिन, वन्यजीव शरणस्थलों, चिड़ियाघरों, एक्वैरियम, उद्यानों, स्कूलों, पुस्तकालयों, संग्रहालयों, सामुदायिक समूहों, गैर-लाभकारी संस्थाओं और व्यक्तियों के लिए विशेष कार्यक्रम या कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सभी उम्र के लोग। दुनिया भर से लोग इन या अन्य गतिविधियों में भाग लेते हैं। जब से पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत हुई, पर्यावरण की बदलती भौतिक और जैविक स्थितियों के कारण कई जीव आए और चले गए या विलुप्त हो गए। जैसा कि हम जानते हैं कि यह प्रकृति का नियम है कि विलुप्ति स्वाभाविक रूप से होती रहेगी और होती रहेगी। लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि प्रजातियों के विलुप्त होने की वर्तमान दर अतीत की पृष्ठभूमि दर की तुलना में बहुत अधिक है। यही हमें सोचना है या चिंता का विषय है. यही है ना
इसलिए, हम कह सकते हैं कि लुप्तप्राय प्रजातियाँ वे प्रजातियाँ हैं जिनकी आबादी में अचानक तेजी से कमी या उनके महत्वपूर्ण निवास स्थान के नुकसान के कारण विलुप्त होने का खतरा है। पौधे या जानवर जैसी प्रजातियाँ जो विलुप्त होने के कगार पर थीं, उन्हें लुप्तप्राय प्रजातियाँ कहा जा सकता है। 1960 और 1970 के दशक में पर्यावरण और संरक्षण के साथ जानवरों की भलाई पर चिंता सामने आई। सभी लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए वन्यजीव संरक्षण और बहाली के प्रयासों के महत्व को बढ़ाने के लिए 28 दिसंबर को लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम 1973 पर कानून में हस्ताक्षर किए गए थे। इसमें कहा गया कि लुप्तप्राय प्रजाति दिवस पहली बार 2006 में अमेरिकी सीनेट द्वारा बनाया गया था।
#जागरूकता दिवस
अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस
संयुक्त राष्ट्र जनरल एसेंबली ने 9 दिसंबर, 1989 के 44/82 के प्रस्ताव में हर साल परिवार दिवस मनाए जाने की घोषणा की थी। इसके बाद साल 1993 में महासभा ने एक संकल्प (ए / आरईएस / 47/237) में हर साल 15 मई को मनाने का फैसला किया गया। संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य दुनिया भर में परिवारों के बेहतर जीवन स्तर और सामाजिक प्रगति के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना है। यह दिन आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं को संशोधित करने पर केंद्रित है जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पारिवारिक इकाइयों की स्थिरता और संरचना को प्रभावित करते हैं। इंसान कितनी भी तरक्की कर ले, जितनी भी सफलता हासिल कर ले, लेकिन परिवार के बिना वह अधूरा है। पहले लोग सामूहिक परिवार में ही है। फिर धीरे-धीरे काम की तलाश में, तो कोई नौकरी के लिए अपनों से दूर होते गए। लेकिन परिवार के बिना इंसान आज बिल्कुल अधूरा है। फिलहाल पूरी दुनिया जिस दौर से गुजर रही है ऐसे में परिवार की अहमियत और भी बढ़ जाती है। अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस के मौके पर आज आपको परिवार का महत्व, नए संकल्प और इसके प्रति जागरुकता के बारे में बताने जा रहे है। हर व्यक्तित के जीवन में उसके परिवार का काफी महत्व होता है। वो एक परिवार ही तो है जो हमेशा हमारे दुख-सुख में हमारे साथ खड़ा रहता है। #शुभ कामनाएँ 🙏
वृषभ संक्रांति
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य देव एक मिथुन संक्रांति
मिथुन संक्रांति को शास्त्रों में बहुत ही उत्तम माना जाता है। मिथुन संक्रांति के दिन सूरज देव की पूजा विधि विधान से की जाती है। हिंदू धर्म में इस त्योहार का बहुत महत्व माना जाता है। मिथुन संक्रांति के दिन पुण्य फल प्राप्त करने के लिए दान धर्म के कार्य किए जाते हैं। यह त्योहार प्रकृति में बदलाव का संकेत माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि इस दिन से वर्षा की ऋतु शुरू हो जाती है। जब सूरज देव वृषभ राशि से निकलकरमिथुन राशि में प्रवेश करते हैं, तो सभी नक्षत्रों में राशियों की दिशा बदल जाती है। सूरज जब कृतिका नक्षत्र से रोहिणी नक्षत्र में आते हैं, तो बारिश की संभावना बन जाती है। इसके साथ ही अच्छी खेती के लिए लोग भगवान से बारिश की मनोकामना करते हैं। मिथुन संक्रांति को रज पर्व भी कहा जाता है। रज पर्व के दिन भगवान सूरज देव को प्रसन्न करने के लिए व्रत किया जाता है।सूर्य जब मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं तो इस स्थिति को ज्योतिष में मिथुन संक्रांति कहते हैं. इसे रज संक्रांति भी कहा जाता हैं। हिंदू धर्म की मान्यता है कि प्रकृति ने ही महिलाओं को मासिक धर्म का वरदान दिया था. इसके कारण ही महिलाओं को मातृत्व का सुख प्राप्त होता है. मिथुन संक्रांति की कथा के अनुसार, जिस तरह से महिलाओं को मासिक धर्म होता है उसी प्रकार भूदेवी अर्थात धरती माता को भी शुरू के तीन दिन मासिक धर्म हुआ था. उसके बाद से ही धरती के विकास होने की मान्यता है. चौथे दिन भूदेवी जिसे सिल बट्टा कहाजाता है, को स्नान कराया जाता है. उसके बाद ही घर में सिल बट्टे का उपयोग किये जाने का प्रचलन है. हिंदू धर्म में सिल बट्टे को धरती का रूप माना जाता है. चौथे दिन सिल बट्टे को जल और दूध से स्नान कराने की परंपरा है. इसके बाद सिंदूर चंदन, फूल आदि से इसकी पूजा की जाती है।
में एक राशि से दूसरी राशि में संचरण करते हैं। जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में गोचर करते हैं तो इसे संक्रांति कहते हैं। वहीं जब सूर्य देव अपनी उच्च राशि राशि मेष से निकलकर वृष राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे वृषभ संक्रांति कहते हैं। सूर्य के इस राशि परिवर्तन से मौसम में भी परिवर्तन देखने को मिलते हैं। शास्त्रों के अनुसार, वृषभ संक्रांति के दिन पूजा, जप, तप और दान करने से अमोघ फल की प्राप्ति होती है। इस महीने में प्यासे को पानी पिलाने अथवा घर के बाहर प्याऊ लगाने से व्यक्ति को यज्ञ कराने के समतुल्य पुण्यफल मिलता है। इस दिन "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का एक मनके जाप जरूर करना चाहिए। वृषभ संक्रांति के दौरान सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में आते हैं और इस नक्षत्र में 15 दिनों तक रहते हैं इसमें शुरूआती नौ दिनों तक प्रचंड गर्मी पड़ती है। इन नौ दिनों को 'नवतपा' कहा जाता है। यदि इन नौ दिनों में किसी भी प्रकार से वर्षा न हो और न ही ठंठी हवा चले तो यह माना जाता है कि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश हो सकती है। पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है कि बहुत समय पहले धरमदास नाम का एक वैश्य रहता था। वह बहुत ही दानी स्वभाव का था। एक दिन उसे अक्षय तृतीय के महत्व के बारे में पता चलता है कि शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर देवताओं और ब्राह्मण की पूजा करने से और दान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। तब से वह अक्षय तृतीय का व्रत विधि विधान से करने लग जाता है। व्रत के दिन सत्तू, चना, गुड, दही आदि सामग्रियों कादान करने लग जाता है। इसी बीच उसकी पत्नी ने उसे दान पुण्य करने से मना किया। परंतु वह नहीं माना और श्रद्धा भाव से उसने अक्षय तृतीया का व्रत पूरा किया। कुछ समय बाद धरमदास की मृत्यु हो जाती है। कहा जाता है कि कुछ दिन बाद उसका पुनर्जन्म राजा के रूप में द्वारका के कुछ माटी नगर में हुआ था। मान्यता है कि अक्षय तृतीया का व्रत करने से उसे फल स्वरूप राजयोग मिला था। तब से वृषभ संक्रांति के दिन व्रत की बहुत मान्यता है। #शुभ कामनाएँ 🙏
मासिक शिवरात्रि भगवान शिव और शक्ति के संगम का एक खास पर्व है. हिंदू पंचाग के अनुसार हर महीने के कृष्ण पक्ष के 14वें दिन को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है. इस व्रत से व्यक्ति को न सिर्फ अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, बल्कि उसे क्रोध, ईर्ष्या, अभिमान जैसी भावनाओं को रोकने में भी यह व्रत मदद करता है. शास्त्रों के अनुसार, मासिक शिवरात्रि औक सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है.हिंदू धर्म में मासिक शिवरात्रि का खास महत्व है. जहां शिव के भक्त साल में एक बार बड़ी ही धूमधाम से महाशिवरात्रि मनाते हैं, वहीं भोलेनाथ की आराधना में प्रत्येक महीने में एक बार मासिक शिवरात्रि मनाने की भी परंपरा है. यह दिन शिवजी के लिए बेहद खास है. इस दिन भगवान शिव के परिवार की भी पूजा की जाती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन आधी रात को भगवान शिव शिवलिंग के रूप में उत्पन्न हुए थे. मासिक शिवरात्रि के दिन आपको इस व्रत कथा को जरूर पढ़ना चाहिए. हिंदू धर्म में मासिक शिवरात्रि का खास महत्व है. जहां शिव के भक्त साल में एक बार बड़ी ही धूमधाम से महाशिवरात्रि मनाते हैं, वहीं भोलेनाथ की आराधना में प्रत्येक महीने में एक बार मासिक शिवरात्रि मनाने की भी परंपरा है. यह दिन शिवजी के लिए बेहद खास है. इस दिन भगवान शिव के परिवार की भी पूजा की जाती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन आधी रात को भगवान शिव शिवलिंग के रूप में उत्पन्न हुए थे. मासिक शिवरात्रि के दिन आपको इस व्रत कथा को जरूर पढ़ना चाहिए. जो भी भक्त मासिक शिवरात्रि करने की इच्छा रखते हैं, उन्हें मासिक शिवरात्रि व्रत महाशिवरात्रि के दिन से शुरू करना चाहिए. इस व्रत को महिला और पुरुष दोनों कर सकते हैं. मासिक शिवरात्रि की रात को जागकर शिव जी की पूजा करनी चाहिए यह व्रत कथा भगवान शिव की अनुग्रह दृष्टि से जुड़ी हुई है. पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय में एक ब्राह्मण नाम का श्रद्धालु अपने गांव में रहता था. उसकी पत्नी बहुत धार्मिक थी और वब हर मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि व्रत करती थीं. अपनी पत्नी की आदतों को देखकर ब्राह्मण ने यह व्रत करने लगा.
एक बार मासिक शिवरात्रि के दिन ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने भगवान शिव की पूजा संगीत सहित की और उनके चरणों में अपनी भक्ति प्रकट की. उन दोनों ने पूरे श्रद्धा भाव से व्रत किया और भगवान शिव से आशीर्वाद मांगा कि वे सदैव उनपर अपनी कृपा बनाए रखें. व्रत रखने के बाद ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने गांव के पथिकों को बुलाया और उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा दी. इसी दिन को भिक्षाटनी भी कहते हैं, जिसमें भक्त अपने अच्छूत और पवित्र भाग्य को दूसरे लोगों के साथ साझा करता है.
उसी समय, गांव में एक बहुत गरीब ब्राह्मण आया जो बहुत ही दीन और दुखी था. ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने उसे भोजन करने के लिए बुलाया और उसे भगवान शिव की कृपा से पूर्ण हुआ भोजन खाने को दिया. इस प्रकार मासिक शिवरात्रि व्रत करने से ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने न सिर्फ अपना अच्छूत साझा किया, बल्कि दुखी लोगों को भी अपने साथ भोजन कराने का सौभाग्य प्रदान किया. इसके बाद उन्हें भगवान शिव की कृपा प्राप्त हुई और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो गईं.
#शुभ कामनाएँ 🙏











![शुभ कामनाएँ 🙏 - ज्येष्ठ माह २०२६ मासिक शिवरात्रि १५ मई २०२६ शुक्रवार मासिक शिवरात्रि के व्रत में निशिता काल में पूजा का सर्वाधिक महत्व है | वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह சதன की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का ಗ8 त्योहार मनाया जाता है | तिथि आरंभ :- चतुर्दशी 15 H$ 2026, 03.01 am] पर নি্থি মমাদ :- चतुर्दशी 16 4$ 2026, 11:41 pm पर निशिता काल मुहूर्त : १२:२० am. से OL:O६ am. ज्येष्ठ माह २०२६ मासिक शिवरात्रि १५ मई २०२६ शुक्रवार मासिक शिवरात्रि के व्रत में निशिता काल में पूजा का सर्वाधिक महत्व है | वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह சதன की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का ಗ8 त्योहार मनाया जाता है | तिथि आरंभ :- चतुर्दशी 15 H$ 2026, 03.01 am] पर নি্থি মমাদ :- चतुर्दशी 16 4$ 2026, 11:41 pm पर निशिता काल मुहूर्त : १२:२० am. से OL:O६ am. - ShareChat शुभ कामनाएँ 🙏 - ज्येष्ठ माह २०२६ मासिक शिवरात्रि १५ मई २०२६ शुक्रवार मासिक शिवरात्रि के व्रत में निशिता काल में पूजा का सर्वाधिक महत्व है | वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह சதன की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का ಗ8 त्योहार मनाया जाता है | तिथि आरंभ :- चतुर्दशी 15 H$ 2026, 03.01 am] पर নি্থি মমাদ :- चतुर्दशी 16 4$ 2026, 11:41 pm पर निशिता काल मुहूर्त : १२:२० am. से OL:O६ am. ज्येष्ठ माह २०२६ मासिक शिवरात्रि १५ मई २०२६ शुक्रवार मासिक शिवरात्रि के व्रत में निशिता काल में पूजा का सर्वाधिक महत्व है | वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह சதன की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का ಗ8 त्योहार मनाया जाता है | तिथि आरंभ :- चतुर्दशी 15 H$ 2026, 03.01 am] पर নি্থি মমাদ :- चतुर्दशी 16 4$ 2026, 11:41 pm पर निशिता काल मुहूर्त : १२:२० am. से OL:O६ am. - ShareChat](https://cdn4.sharechat.com/bd5223f_s1w/compressed_gm_40_img_430683_2fd761bb_1778812426072_sc.jpg?tenant=sc&referrer=user-profile-service%2FrequestType50&f=072_sc.jpg)

