अंतर्राष्ट्रीय नाविक दिवस 25 जून को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य विश्व भर में नाविकों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार, वैश्विक अर्थव्यवस्था और समग्र रूप से समाज में किए गए असाधारण योगदान को स्वीकार करना और उसकी सराहना करना है।
समुद्री यात्री वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, वे अर्थव्यवस्था के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करते हैं और उन वस्तुओं और ईंधनों की आपूर्ति करते हैं जिन पर हम निर्भर हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुद्री यात्री दिवस सार्वजनिक कल्याण में उनके अद्वितीय योगदान को पहचानने और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर प्रदान करता है। 2024 के लिए, अभियान समुद्री क्षेत्र को एक सुरक्षित कार्यस्थल बनाने में समुद्री यात्रियों के योगदान पर केंद्रित होगा। नाविक दिवस की स्थापना 2010 में मनीला में आयोजित राजनयिक सम्मेलन में पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से की गई थी, जिसमें नाविकों के प्रशिक्षण, प्रमाणन और निगरानी मानकों पर संशोधित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (एसटीसीडब्ल्यू) को अपनाया गया था। इसका घोषित उद्देश्य विश्वभर के नाविकों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार, विश्व अर्थव्यवस्था और समग्र रूप से नागरिक समाज में किए गए अद्वितीय योगदान को मान्यता देना है।
प्रस्ताव में सरकारों, जहाजरानी संगठनों, कंपनियों, जहाज मालिकों और अन्य सभी संबंधित पक्षों को नाविक दिवस को विधिवत और उचित रूप से बढ़ावा देने और इसे सार्थक रूप से मनाने के लिए कार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। नाविक दिवस को संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक उत्सव दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह दिन तटरक्षक बल, नौसेना, मछुआरे, समुद्री जीवविज्ञानी और क्रूज जहाज के कप्तान सहित सभी प्रकार के नाविकों के लिए है। यदि आपका काम बड़ी मात्रा में खारे पानी से जुड़ा है, तो यह दिन आपको समर्पित है। पहली दस्तावेजित समुद्री यात्रा लगभग 3200 ईसा पूर्व में हुई थी, जिसका खर्च मिस्र के फ़राओ स्नेफ्रू ने उठाया था (उन्होंने अपने शासनकाल में कम से कम तीन पिरामिड भी बनवाए थे)। आज, वैश्विक व्यापार का 90% से अधिक हिस्सा समुद्र के रास्ते होता है, क्योंकि यह अभी भी माल परिवहन का सबसे किफायती तरीका है। हर देश के समुद्री जीवविज्ञानी और समुद्र विज्ञानी अपना जीवन समुद्र की गहराइयों के बारे में अधिक जानने के लिए समर्पित कर चुके हैं, और जीवन के हर क्षेत्र से जुड़े लोग पृथ्वी का अन्वेषण करने के लिए समुद्र में जाते रहते हैं।
#जागरूकता दिवस
गायत्री जयंती
गायत्री जयंती की तिथि को लेकर भिन्न-भिन्न मत सामने आते हैं। कुछ स्थानों पर गंगा दशहरा और गायत्री जयंती की तिथि एक समान बताई जाती है तो कुछ इसे गंगा दशहरा से अगले दिन यानि ज्येष्ठ मास की एकादशी को मनाते हैं। वहीं श्रावण पूर्णिमा को भी गायत्री जयंती के उत्सव को मनाया जाता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन गायत्री जयंती को अधिकतर स्थानों पर स्वीकार किया जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी-एकादशी को भी मान्यतानुसार गायत्री जयंती मनाई जाती है।
माना जाता है कि सृष्टि के आदि में ब्रह्मा जी पर गायत्री मंत्र प्रकट हुआ। मां गायत्री की कृपा से ब्रह्मा जी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने चारों मुखों से चार वेदों के रुप में की। आरंभ में गायत्री सिर्फ देवताओं तक सीमित थी लेकिन जिस प्रकार भगीरथ कड़े तप से गंगा मैया को स्वर्ग से धरती पर उतार लाए उसी तरह विश्वामित्र ने भी कठोर साधना कर मां गायत्री की महिमा अर्थात गायत्री मंत्र को सर्वसाधारण तक पंहुचाया। चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियां सभी गायत्री से ही पैदा हुए माने जाते हैं। वेदों की उत्पति के कारण इन्हें वेदमाता कहा जाता है, ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं की आराध्य भी इन्हें ही माना जाता है इसलिये इन्हें देवमाता भी कहा जाता है। समस्त ज्ञान की देवी भी गायत्री हैं इस कारण गायत्री को ज्ञान-गंगा भी कहा जाता है। इन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी भी माना जाता है। मां पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी की अवतार भी गायत्री को कहा जाता है। गायत्री मां से ही चारों वेदों की उत्पति मानी जाती हैं। इसलिये वेदों का सार भी गायत्री मंत्र को माना जाता है। मान्यता है कि चारों वेदों का ज्ञान लेने के बाद जिस पुण्य की प्राप्ति होती है अकेले गायत्री मंत्र को समझने मात्र से चारों वेदों का ज्ञान मिलता जाता है। गायत्री मां को हिंदू भारतीय संस्कृति की जन्मदात्री मानते हैं। #शुभ कामनाएँ 🙏
निर्जला एकादशी
प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत कठिन होता है। व्रत आरंभ होने के बाद अगले दिन पारण तक पानी पीना वर्जित माना जाता है। वैसे तो वर्ष की सभी एकादशी तिथि अपना अलग महत्व रखती हैं लेकिन निर्जला एकादशी का विशिष्ट महत्व माना गया है। इस व्रत को करने के सभी एकादशियों के फल की प्राप्त हो जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार निर्जला एकादशी का व्रत नियम और निष्ठा के साथ रखने से मनुष्य को जीवन में सुख और यश की प्राप्ति होती है एवं इस जन्म के बाद मोक्ष प्राप्त होता है। इस एकादशी को भीमसेन या पांडव एकदाशी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत का महातम्य स्वयं ऋषि वेदव्यास नें बताया है।
पौराणिक कथा के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प करा रहे थे तब महाबली भीम ने निवेदन किया- महर्षि आपने तो प्रति पक्ष एक दिन के उपवास की बात कही है। मैं तो एक दिन क्या एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता, मेरे पेट में ‘वृक’ नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है। तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्यव्रत से वंचित रह जाऊंगा। तब महर्षि वेदव्यास ने भीम की समस्या का निदान करते हुए और उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा कि नहीं, कुंतीनंदन, धर्म की यही तो विशेषता है कि वह न केवल सबको धारण करता है बल्कि सभी के योग्य साधन व्रत-नियमों को भी बड़ी सहज और लचीली व्यवस्था में उपलब्ध करवाता है। अतः आप ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो। इससे तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों के फल की प्राप्ति होगी। निःसंदेह तुम इस लोक में सुख, यश और प्राप्त कर मोक्ष लाभ प्राप्त करोगे। इस एकादशी को भीमसेन एकादशी व पांडव एकादशी भी कहा जाता है। #शुभ कामनाएँ 🙏













