#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वयधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 320)
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एवं धर्मेण धर्मज्ञः कृत्वा कर्मातिमानुषम् । भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य विवाहायोपचक्रमे ।। ५९ ।।
सत्यवत्या सह मिथः कृत्वा निश्चयमात्मवान् । विवाहं कारयिष्यन्तं भीष्मं काशिपतेः सुता । ज्येष्ठा तासामिदं वाक्यमब्रवीद्धसती तदा ।। ६० ।।
धर्मज्ञ एवं जितात्मा भीष्मजी इस प्रकार धर्मपूर्वक अलौकिक पराक्रम करके माता सत्यवतीसे सलाह ले एक निश्चयपर पहुँचकर भाई विचित्रवीर्यके विवाहकी तैयारी करने लगे। काशिराजकी उन कन्याओंमें जो सबसे बड़ी थी, वह बड़ी सती-साध्वी थी। उसने जब सुना कि भीष्मजी मेरा विवाह अपने छोटे भाईके साथ करेंगे, तब वह उनसे हँसती हुई इस प्रकार बोली- ।। ५९-६० ।।
मया सौभपतिः पूर्वं मनसा हि वृतः पतिः । तेन चास्मि वृता पूर्वमेष कामश्च मे पितुः ।। ६१ ।।
'धर्मात्मन् ! मैंने पहलेसे ही मन-ही-मन सौभ नामक विमानके अधिपति राजा शाल्वको पतिरूपमें वरण कर लिया था। उन्होंने भी पूर्वकालमें मेरा वरण किया था। मेरे पिताजीकी भी यही इच्छा थी कि मेरा विवाह शाल्वके साथ हो ।। ६१ ।।
मया वरयितव्योऽभूच्छाल्वस्तस्मिन् स्वयंवरे ।
एतद् विज्ञाय धर्मज्ञ धर्मतत्त्वं समाचर ।। ६२ ।।
'उस स्वयंवरमें मुझे राजा शाल्वका ही वरण करना था। धर्मज्ञ ! इन सब बातोंको सोच-समझकर जो धर्मका सार प्रतीत हो, वही कार्य कीजिये' ।। ६२ ।।
एवमुक्तस्तया भीष्मः कन्यया विप्रसंसदि ।
चिन्तामभ्यगमद् वीरो युक्तां तस्यैव कर्मणः ।। ६३ ।।
जब उस कन्या ने ब्राह्मणमण्डली के बीच वीरवर भीष्मजी से इस प्रकार कहा, तब वे उस वैवाहिक कर्मके विषयमें युक्तियुक्त विचार करने लगे ।। ६३ ।।
विनिश्चित्य स धर्मज्ञो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
अनुजने तदा ज्येष्ठामम्बां काशिपतेः सुताम् ।। ६४ ।।
वे स्वयं भी धर्मके ज्ञाता थे, फिर भी वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ भलीभाँति विचार करके उन्होंने काशिराजकी ज्येष्ठ पुत्री अम्बाको उस समय शाल्वके यहाँ जानेकी अनुमति दे दी ।। ६४ ।।
अम्बिकाम्बालिके भार्ये प्रादाद् भ्रात्रे यवीयसे । भीष्मो विचित्रवीर्याय विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ६५ ।।
शेष दो कन्याओंका नाम अम्बिका और अम्बालिका था। उन्हें भीष्मजीने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार छोटे भाई विचित्रवीर्यको पत्नीरूपमें प्रदान किया ।। ६५ ।।
तयोः पाणी गृहीत्वा तु रूपयौवनदर्पितः ।
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ।। ६६ ।।
उन दोनों का पाणिग्रहण करके रूप और यौवनके अभिमानसे भरे हुए धर्मात्मा विचित्रवीर्य कामात्मा बन गये ।। ६६ ।।
ते चापि बृहती श्यामे नीलकुञ्चितमूर्धजे।
रक्ततुङ्गनखोपेते पीनश्रोणिपयोधरे ।। ६७ ।।
उनकी वे दोनों पत्नियाँ सयानी थीं। उनकी अवस्था सोलह वर्षकी हो चुकी थी। उनके केश नीले और घुँघराले थे; हाथ-पैरोंके नख लाल और ऊँचे थे; नितम्ब और उरोज स्थूल और उभरे हुए थे ।। ६७ ।।
आत्मनः प्रतिरूपोऽसौ लब्धः पतिरिति स्थिते ।
विचित्रवीर्य कल्याण्यौ पूजयामासतुः शुभे ।। ६८ ।।
वे यह जानकर संतुष्ट थीं कि हम दोनोंको अपने अनुरूप पति मिले हैं; अतः वे दोनों कल्याणमयी देवियाँ विचित्रवीर्यकी बड़ी सेवा-पूजा करने लगीं ।। ६८ ।।
स चाश्विरूपसदृशो देवतुल्यपराक्रमः ।
सर्वासामेव नारीणां चित्तप्रमथनो रहः ।। ६९ ।।
विचित्रवीर्यका रूप अश्विनीकुमारोंके समान था। वे देवताओंके समान पराक्रमी थे। एकान्तमें वे सभी नारियोंके मनको मोह लेनेकी शक्ति रखते थे ।। ६९ ।।
ताभ्यां सह समाः सप्त विहरन् पृथिवीपतिः । विचित्रवीर्यस्तरुणो यक्ष्मणा समगृह्यत ।। ७० ।।
राजा विचित्रवीर्यने उन दोनों पत्नियोंके साथ सात वर्षोंतक निरन्तर विहार किया; अतः उस असंयमके परिणामस्वरूप वे युवावस्थामें ही राजयक्ष्माके शिकार हो गये ।। ७० ।।
सुहृदां यतमानानामाप्तैः सह चिकित्सकैः ।
जगामास्तमिवादित्यः कौरव्यो यमसादनम् ।। ७१ ।।
उनके हितैषी सगे-सम्बन्धियोंने नामी और विश्वसनीय चिकित्सकोंके साथ उनके रोग-निवारणकी पूरी चेष्टा की, तो भी जैसे सूर्य अस्ताचलको चले जाते हैं, उसी प्रकार वे कौरवनरेश यमलोकको चले गये ।। ७१ ।।
धर्मात्मा स तु गाङ्गेयश्चिन्ताशोकपरायणः।
प्रेतकार्याणि सर्वाणि तस्य सम्यगकारयत् ।। ७२ ।।
राज्ञो विचित्रवीर्यस्य सत्यवत्या मते स्थितः ।
ऋत्विग्भिः सहितो भीष्मः सर्वैश्च कुरुपुङ्गवैः ।। ७३ ।।
धर्मात्मा गंगानन्दन भीष्मजी भाईकी मृत्युसे चिन्ता और शोकमें डूब गये। फिर माता सत्यवतीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले उन भीष्मजीने ऋत्विजों तथा कुरुकुलके समस्त श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ राजा विचित्रवीर्यके सभी प्रेतकार्य अच्छी तरह कराये ।। ७२-७३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि विचित्रवीर्योपरमे द्वयधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें विचित्रवीर्यका निधनविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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