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#✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔
✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 - भौमभावफल के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्तृतीय भाव र्में मंगल* बाडुलक्ष्मी स्तृतीये न चेन्मंगलो कुतो बाहुवीर्य ` கள் সাননানাম सहोत्व्यथा भण्यते केन तेषां तपश्चर्यया चोपहास्य कथं स्यात्।।" भाव में मंगल न होने से व्यक्ति को भुजाओं का अर्थः எளிபு  भुजाओं से संचित किया द्रव्य नर्हीं पराक्रम और अपनी मिलता। वह के साथ विवाद ्में हारता है और उसकी বুলযী: तपस्या का उपहास होता है। *चतुर्थ भाव र्में मंगल* भूसुतः संभवेत्तर्यभावे तदा किं ग्रहाः सानुकूला "यदा जनानाम्। सुहृद्वर्गसौख्यं न किंचिदिचिन्त्यं कृपाव स्वभूमीर्लभेद्भूमिपालात्। १" होने से व्यक्ति को सुहृद्वर्ग का भाव में मंगल अर्थः चतुर्थ की कृपा 7 सुख स्वल्प ही होता है, लेकिन राजा होने के कारण उसको राजा से वस्त्र और भूमि का लाभ होता है। *पंचम भाव में मंगल* "कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया  न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेषन्तः सदैव। ।" अर्थः पंचम भाव ्में मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। भौमभावफल के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्तृतीय भाव र्में मंगल* बाडुलक्ष्मी स्तृतीये न चेन्मंगलो कुतो बाहुवीर्य ` கள் সাননানাম सहोत्व्यथा भण्यते केन तेषां तपश्चर्यया चोपहास्य कथं स्यात्।।" भाव में मंगल न होने से व्यक्ति को भुजाओं का अर्थः எளிபு  भुजाओं से संचित किया द्रव्य नर्हीं पराक्रम और अपनी मिलता। वह के साथ विवाद ्में हारता है और उसकी বুলযী: तपस्या का उपहास होता है। *चतुर्थ भाव र्में मंगल* भूसुतः संभवेत्तर्यभावे तदा किं ग्रहाः सानुकूला "यदा जनानाम्। सुहृद्वर्गसौख्यं न किंचिदिचिन्त्यं कृपाव स्वभूमीर्लभेद्भूमिपालात्। १" होने से व्यक्ति को सुहृद्वर्ग का भाव में मंगल अर्थः चतुर्थ की कृपा 7 सुख स्वल्प ही होता है, लेकिन राजा होने के कारण उसको राजा से वस्त्र और भूमि का लाभ होता है। *पंचम भाव में मंगल* "कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया  न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेषन्तः सदैव। ।" अर्थः पंचम भाव ्में मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। - ShareChat