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भूमिहार (अयाचक ब्राह्मणों का इतिहास) पूरा पढ़े।🙏 लिंग पुराण में गंगा और यमुना नदियों के क्षेत्र में शस्त्रधारी ब्राह्मणों का वर्णन मिलता है, विशेषकर उन संदर्भों में जहाँ ब्राह्मणों ने अपने पारंपरिक पुजारी कर्तव्यों को त्यागकर भूमि पर नियंत्रण कर लिया और योद्धा की भूमिका निभाई। इन ब्राह्मणों को भूमिहार ब्राह्मण कहा जाता है। लिंग पुराण में शास्त्राधारी ब्राह्मणों का विशेष उल्लेख शिव पूजा और शैव धर्म के संदर्भ में मिलता है, जहाँ वे शास्त्रों के ज्ञाता, शिव के उपासक और शैव दर्शन के प्रचारक के रूप में वर्णित हैं, जो शिव की निंदा करने वालों का विरोध करने और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग के रूप में लिंगोपासना का समर्थन करते हैं। शास्त्राधारी ब्राह्मणों का वर्णन किसी एक अध्याय में केंद्रित नहीं है, बल्कि उनके कर्तव्य और धर्म-परायणता के प्रसंग पुराण के विभिन्न हिस्सों में आते है। जैसे शिव की निंदा करने वालों के प्रति धर्म की रक्षा के लिए तत्परता का प्रसंग (अध्याय 1.107)। शिव पुराण में शास्त्राधारी ब्राह्मणों को समाज का मार्गदर्शक, शिव के भक्त और शास्त्रों के ज्ञानी के रूप में चित्रित किया गया है, जो स्वयं के साथ-साथ दूसरों का कल्याण भी करते हैं। वारेंद्र या राढ़ीय श्रेणी के ब्राह्मण ,दुर्गादास लहेरी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और राहुल संकृत्यायन जैसे विद्वानों ने भी,मगध के बाभनों (भूमिहारों) को शस्त्र और शास्त्र से जुड़े ब्राह्मणों के रूप में वर्णित किया है, जो पारंपरिक वैदिक कर्मकांड से अलग एक सामाजिक संरचना रखते थे। शस्त्र और शास्त्र का संगम: ये ब्राह्मण केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थे, बल्कि युद्ध और प्रशासन में भी सक्रिय थे। जैसा कि पुष्यमित्र शुंग (शुंग वंश का संस्थापक) और चाणक्य (कौटिल्य) के उदाहरणों से स्पष्ट होता है, जो ब्राह्मण थे और मगध के शासक/सलाहकार बने। मेगस्थनी (जचंद्रगुप्त मौर्य मौर्य के समय) और चीनी यात्री ह्वेन-त्सांग (हर्षवर्धन के समय) जैसे विदेशी यात्रियों ने भारतीय समाज में शस्त्रधारी ब्राह्मणों के अस्तित्व का उल्लेख किया है, जो दर्शाता है कि ब्राह्मण सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि रक्षक (शस्त्र उठाने वाले) भूमिका भी निभाते थे, खासकर क्षत्रिय वर्ण की अनुपस्थिति या कमजोर होने पर ब्राह्मणों की बहुआयामी भूमिका का वर्णन किया है! ह्वेन-त्सांग (हर्षवर्धन के समय): ह्वेन-त्सांग ने भारत में ब्राह्मणों को उच्च स्थान और सम्मान प्राप्त देखा! उन्होंने ब्राह्मणों के धार्मिक और विद्वत्तापूर्ण कार्यों के साथ-साथ, कुछ ब्राह्मणों के शस्त्र धारण करने और युद्ध या सैन्य अभियानों में भाग लेने का भी वर्णन किया है! जैसा कि आर्यभट, बाणभट्ट, मयूरभट्ट, और जामभट्ट। चीनी ,अरबी,अंग्रेज लेखकों यहाँ तक कि राजा राम मोहन राय ने भी गंगा के मैदानी क्षेत्र के ब्राह्मणों का ज़िक्र किया है एक प्रकार से भूमिहार ब्राह्मण विवाह से लेकर श्राद्ध करने वाले पुरोहित थे तो कृषि से लेकर युद्ध तक कोई निश्चित भूमिका नहीं थी समय और परिस्थिति के अनुसार भूमिका बदलती रहती थी आज भी एक कहावत प्रसिद्ध है- "जहाँ जईसन तहां तईसन, अईसन नहीं त भूमिहार कईसन ". भूमिहार ब्राह्मणों को कई अलग-अलग नामों और उपनामों से जाना जाता है, जिनमें बाभन, ब्रह्मर्षि, त्यागी , मोहियाल, पुष्करणा ,मेनारिया,चित्पावन ब्राह्मण, जिझौतिया' ब्राह्मण वीरेंद्र और हलवा....ब्राह्मण अयाचक ब्राह्मण......किनवार ब्राह्मण।🙏 ** नम्बूदरी को दक्षिणाहा ब्राह्मण (अयाचक ब्राह्मण) कहा जाता है.. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड में बाभन एवं भूमिहार और भू ब्राह्मण से संबोधित किया जाता है। 🙏जय परशुराम 🙏 जय भू समाज 🙏 पोस्ट ज्ञान वर्धक लगा हो तो कमेंट और शेयर के साथ पेज की Follow जरूर करें।🙏 Bhumihar भूमिहार #भूमिहार #bhumihar #bhumiharbrand Bhumihar(भूमिहार) #इतिहास #इतिहास स्मृति #धार्मिक इतिहास
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