#श्री हरि
श्री हरि की शिक्षाओं और वैष्णव भक्ति मार्ग के अनुसार, प्रभु की कृपा प्राप्त करने के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है। अहंकार से बचने के लिए मनुष्य को निम्नलिखित भावों को अपने जीवन में उतारना चाहिए:
मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह इस संसार में केवल एक निमित्त मात्र है और सब कुछ करने वाले श्री हरि स्वयं हैं। जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों, धन या ज्ञान का श्रेय स्वयं को न देकर भगवान को अर्पित करता है, तो 'मैं' का भाव समाप्त हो जाता है और अहंकार जन्म नहीं ले पाता।
अहंकार से बचने का सबसे प्रभावी मार्ग विनम्रता है। चैतन्य महाप्रभु के अनुसार, व्यक्ति को स्वयं को घास के तिनके से भी छोटा समझना चाहिए और वृक्ष की भांति सहनशील होना चाहिए। जब हृदय में दीनता और नम्रता का वास होता है, तभी प्रभु की कृपा का प्रवेश संभव है क्योंकि श्री हरि सदैव अहंकारी से दूर और विनम्र भक्त के समीप रहते हैं।
मनुष्य को अपनी इंद्रियों और मन को भगवान की सेवा में लगाना चाहिए। जब व्यक्ति निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करता है और हर जीव में परमात्मा का अंश देखता है, तो श्रेष्ठता का बोध स्वतः ही समाप्त हो जाता है। सेवा भाव से चित्त शुद्ध होता है और अहंकार की जड़ें कमजोर होती हैं।
श्री हरि के चरणों में पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति) अहंकार को जड़ से मिटा देती है। जब भक्त यह मान लेता है कि उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है और उसकी रक्षा तथा भरण-पोषण का उत्तरदायित्व केवल प्रभु पर है, तो वह आत्म-केंद्रित होने के बजाय प्रभु-केंद्रित हो जाता है।
निरंतर नाम जप और सत्संग मनुष्य को आत्म-निरीक्षण की शक्ति देते हैं। शास्त्रों का अध्ययन और संतों का सान्निध्य यह याद दिलाता रहता है कि सांसारिक उपलब्धियां क्षणभंगुर हैं। यह बोध व्यक्ति को गर्व करने से रोकता है और उसे भक्ति के मार्ग पर स्थिर रखता है।


