सभी प्रणियों की मृत्यु अपने पूर्व जन्मों की कर्म वासना के अनुसार समय पर होती है और उसी के अनुसार उनका जन्म भी होता है। परन्तु आत्मा शरीर से अत्यन्त भिन्न है, इसीलिए वह उसमें रहने पर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मों से अछूता ही रहता है। जैसे मनुष्य अपने मकान को अपने से अलग और मिट्टी का समझता है, वैसे ही यह शरीर भी अलग और मिट्टी का है। मोहवश वह इसे अपना समझ बैठता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/२/४१-४२
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/2/41-42
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