स्त्रियों को प्रसन्न करने के लिए, हास-परिहास में, विवाह में, कन्या आदि की प्रशंसा करते समय, अपनी जीविका की रक्षा के लिए, प्राण संकट उपस्थित होने पर, गौ और ब्राह्मण के हित के लिए तथा किसी को मृत्यु से बचाने के लिए असत्य भाषण भी उतना निन्दनीय नहीं है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/१९/४३
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/19/43
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विद्वान पुरुष उस दान की प्रशंसा नहीं करते, जिसके बाद जीवन-निर्वाह के लिए कुछ बचे ही नहीं। जिसका जीवन-निर्वाह ठीक-ठीक चलता है - वही संसार में दान, यज्ञ, तप और परोपकार के कर्म कर सकता है।
जो मनुष्य अपने धन को पाँच भागों में बाँट देता है - कुछ धर्म के लिए, कुछ यश के लिए, कुछ धन की अभिवृद्धि के लिए, कुछ भोगों के लिए और कुछ अपने स्वजनों के लिए - वही इस लोक और परलोक दोनों में ही सुख पाता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/१९/३६-३७
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/19/36-37
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जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तु से ही संतुष्ट हो रहता है, उसके तेज की वृद्धि होती है। उसके असन्तोषी हो जाने पर उसका तेज वैसे ही शान्त हो जाता है जैसे जल से अग्नि।
श्रीमद् भागवत महापुराण/८/१९/२६
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/19/26
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धन और भोगों से सन्तोष न होना ही जीव के जन्म-मृत्यु के चक्कर में गिरने कारण है। तथा जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसी में सन्तोष कर लेना मुक्ति का कारण है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/१९/२५
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/19/25
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आठवें मन्वन्तर में सावर्णि मनु होंगे। देवगुह्य की पत्नी सरस्वती के गर्भ से सार्वभौम नामक भगवान् का अवतार होगा। ये ही प्रभु पुरन्दर इन्द्र से स्वर्ग का राज्य छीनकर राजा बलि को दे देंगे।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/१३/१७
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/13/17
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सातवें वैवस्वत मन्वन्तर में भी कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से आदित्यों के छोटे भाई वामन के रूप में भगवान् विष्णु ने अवतार ग्रहण किया था।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/१३/६
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/13/6
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छठे मनु चक्षु के पुत्र चाक्षुष थे। इन्हीं के चाक्षुष मन्वन्तर में मन्त्रद्रुम नाम के इंद्र हुए। जगत्पति भगवान् ने उस समय भी वैराज की पत्नी सम्भूति के गर्भ से अजित नाम का अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने ही समुद्र मन्थन करके देवताओं को अमृत पिलाया था, तथा वे ही कच्छरूप धारण करके मन्दराचल की मथानी के आधार बने थे।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/५/७-१०
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/5/7-10
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पांचवे रैवत मन्वन्तर में रैवत मनु थे और इंद्र का नाम विभु था। इसी समय में शुभ्र ऋषि की पत्नी का नाम था विकुण्ठा। उन्हीं के गर्भ से वैकुण्ठ नमक श्रेष्ठ देवताओं के साथ अपने अंश से स्वयं भगवान् ने वैकुण्ठ नामक अवतार धारण किया। उन्होंने लक्ष्मी देवी की प्रार्थना से उनको प्रसन्न करने के लिए वैकुण्ठधाम की रचना की थी। वह लोक समस्त लोकों में श्रेष्ठ है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/५/४-५
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/5/4-5
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समुद्र मंथन से निकले अमृत को देवताओं को पिलाने के लिए विष्णुजी मोहिनी अवतार लेते हैं। जब मोहिनी अवतार के बारे में शिवजी को पता चलता है तो शिवजी पार्वती और गणों सहित भगवान् के दर्शनों हेतु गए और उनसे प्रार्थना करी कि उन्हें भी मोहिनी रूप के दर्शन करवाएं। विष्णुजी ने मोहिनी रूप लिया तो शिवजी उस रूप पर इतने मोहित हो गए कि पार्वती और गणों के सामने ही लज्जा छोड़कर उसके पीछे दौड़ने लगे। कामदेव के वेग से उनका वीर्य स्खलित हो गया। भगवान् शंकर का वीर्य पृथ्वी पर जहां-जहां गिरा, वहां-वहां सोने-चांदी की खाने बन गयीं। वीर्यपात होते ही उन्हें अपनी स्मृति हुई। इसके बाद शिवजी ने विष्णुजी की माया को नमस्कार किया और विष्णुजी ने बोला कि आज के बाद उनकी माया शिवजी पर असर नहीं करेगी।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/१२
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/12
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देवासुर संग्राम में दैत्यराज बलि की सेना में नमुचि नाम का दैत्य था। देवराज इंद्र ने वज्र का प्रहार किया तो नमुचि पर कोई असर नहीं हुआ। यह देख इंद्र सोच में पड़ गया कि इस वज्र से मैने बड़े बड़े दैत्यों और दानवों को मारा पर इस नमुचि पर तो इसका कोई असर ही नहीं। तभी आकाशवाणी हुई कि "नमुचि को न गीली वस्तु से मारा जा सकता है और न ही सूखी वस्तु से। तुम्हे इसे मारने के लिए कोई और ही उपाय सोचना होगा।" इसके बाद इंद्र को सुझा की समुद्र की फेन सूखा भी है और गीला भी। इसके बाद इंद्र ने इसी फेन से हथियार बना कर नमुचि का वध किया।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/११/३२-४०
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/22/32-40
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