जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपने माँ-बाप की शरीर और धन से सेवा नहीं करता, उसके मरने पर यमदूत उसे उसके अपने शरीर का माँस खिलाते हैं।
जो पुरुष समर्थ होकर भी बूढ़े माता-पिता, सती पत्नी, बालक, सन्तान, गुरु, ब्राह्मण और शरणागत का भरण-पोषण नहीं करता - वह जीता हुआ भी मुर्दे के समान ही है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/४५/६-७
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/45/6-7
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पिता और माता ही शरीर को जन्म देते हैं और इसका लालन-पालन करते हैं। तब कहीं जाकर यह शरीर धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्ष की प्राप्ति का साधन बनता है। यदि कोई मनुष्य सौ वर्ष तो जीकर माता और पिता की सेवा करता रहे, तब भी वह उनके उपकार से उऋण नहीं हो सकता।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/४५/५
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/45/5
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सरस्वती नदी का जल तीन महीने में, यमुनाजी का जल सात महीने में, नर्मदाजी का जल दस महीने में तथा गङ्गाजी का जल एक वर्ष में पचता है अर्थात शरीर मे उसका प्रभाव विद्यमान रहता है।
नारदपुराण।उत्तरभाग।३८।५९
नारद-पुराण/उत्तर-भाग/38/59
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पक्षों के आदि अर्थात कृष्णपक्ष में षष्ठी से लेकर पुण्यमयी अमावस्या तक दस दिन गङ्गाजी इस पृथ्वी पर निवास करती हैं। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर दस दिन तक वे स्वंय ही पाताल में निवास करती हैं। फिर शुक्लपक्ष की एकादशी से कृष्णपक्ष की पञ्चमी तक जो दस दिन होते हैं, उनमें गङ्गाजी सदा स्वर्ग में रहती हैं। इसलिए इन्हें 'त्रिपथगा' कहते हैं।
नारदपुराण।उत्तरभाग।३८।१३
नारद-पुराण/उत्तर-भाग/38/13
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पिता की आज्ञा पालन करने वाले पुत्र तीनो लोको में धन्य माने जाते हैं। जो पिता की बात नही मानता, उसके लिए उससे बढ़कर और पातक क्या हो सकता है? जो पिता के वचनों की अवहेलना करके गङ्गा-स्नान करने के लिए जाता है और पिता की आज्ञा का पालन नही करता, उसे उस तीर्थ-सेवन का फल नही मिलता।
नारदपुराण।उत्तरभाग।१५।३४-३५
नारद-पुराण/उत्तर-भाग/15/34-35
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अधिक निद्रा अधर्म का मूल है। निद्रा पाप बढ़ाने वाली है। निद्रा दरिद्रता की जननी है तथा कल्याण का नाश करने वाली है। निद्रा के वश में रहना वाला राजा अधिक दिनों तक पृथ्वी का शासन नही कर सकता। निद्रा व्यभिचारिणी स्त्री की भाँति अपने स्वामी के लोक-परलोक दोनों का नाश करने वाली है।
नारदपुराण।उत्तरभाग।१५।२६-२९
नारद-पुराण/उत्तर-भाग/15/26-29
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जो पुत्र पिता के आने पर उनकी आगवानी के लिए सामने नही जाता, वह चौदह इन्द्रो के राज्यकाल तक घोर नरक में पड़ा रहता है। पिता के स्वागत के लिए सामने जाने वाले पुत्र को पग पग पर यज्ञ का फल प्राप्त होता है - ऐसा पौराणिक द्विज कहते हैं।
नारदपुराण।उत्तरभाग।१५।१४
नारद-पुराण/उत्तर-भाग/15/14
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प्राकृत देह का निर्माण होता है स्थूल, सूक्ष्म और कारण - इन तीन देहों के संयोग से। जब तक 'कारण शरीर' रहता है, तब तक इस प्राकृत देह से जीव को छुटकारा नहीं मिलता। 'कारण शरीर' कहते हैं पूर्वकृत कर्मों के उन संस्कारों को, जो देह-निर्माण के कारण होते हैं। इस 'कारण शरीर' के आधार पर जीव को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ना होता है और यह चक्र जीव की मुक्ति न होने तक अथवा 'कारण' का सर्वथा अभाव न होने तक चलता ही रहता है। इसी कर्म बन्धन के कारण पांच भौतिक स्थूल शरीर मिलता है - जो रक्त, मांस, अस्थि आदि से भरा और चमड़े से ढका होता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/३३ (व्याख्या)
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/33
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कुलीन स्त्रियों के लिए जार पुरूष की सेवा सब तरह से निन्दनीय ही है। इससे उनका परलोक बिगड़ता है, स्वर्ग नहीं मिलता, इस लोक में अपयश होता है। यह कुकर्म स्वयं तो अत्यन्त तुच्छ, क्षणिक है ही; इसमें प्रत्यक्ष - वर्तमान में भी कष्ट-ही-कष्ट है। मोक्ष आदि की तो बात ही कौन करे, यह साक्षात् परम भय - नरक आदि का हेतु है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/२९/२६
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/29/26
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स्त्रियों का परम धर्म यही है कि वे पति और उसके भाई-बन्धुओं की निष्कपट भाव से सेवा करें और सन्तान का पालन पोषण करें। जिन स्त्रियों को उत्तम लोक प्राप्त करने की अभिलाषा हो, वे पातकी को छोड़कर और किसी भी प्रकार के पति का परित्याग न करें। भले ही वह बुरे स्वभाव-वाला, भाग्यहीन, वृद्ध, मूर्ख, रोगी या निर्धन ही क्यों न हो।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/२९/२४-२५
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/29/24-25
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