युधिष्ठिर! त्रेता आदि युगों में जब विद्वानों ने देखा कि मनुष्य परस्पर एक-दूसरे का अपमान आदि करते हैं, तब उन लोगों ने उपासना की सिद्धि के लिये भगवान् की प्रतिमा की प्रतिष्ठा की। तभी से कितने ही लोग बड़ी श्रद्धा और सामग्री से प्रतिमा में ही भगवान् की पूजा करते हैं। परन्तु जो मनुष्य से द्वेष करते हैं, उन्हें प्रतिमा की उपासना करने पर भी सिद्धि नहीं मिल सकती।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१४/३९-४०
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/14/39-40
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जैसे स्वप्न टूटने पर मनुष्य स्वप्न के सम्बन्धियों से आसक्त नहीं रहता - वैसे ही ज्यों-ज्यों सत्संग के द्वारा बुद्धि शुद्ध हो, त्यों ही त्यों शरीर, स्त्री, पुत्र, धन आदि की आसक्ति स्वयं छोड़ता चले। क्योंकि एक-न-एक दिन ये छूटने वाले ही हैं।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१४/४
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/14/4
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राधा नाम संकीर्तन Radha Naam Sankirtan #radha #radhakrishna #premanandjimaharaj #vrindavan #premanandjipravachan #premanand
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जिस समय मनुष्य अपने मन में रहने वाली कामनाओं का परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१०/९
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/10/9
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प्रह्लाद ने भगवान नृसिंह से कहा - जो स्वामी से अपनी कामनाओं की पूर्ति चाहता है, वह सेवक नहीं; और जो सेवक से सेवा कराने के लिए उसका स्वामी बनने के लिए उसकी कामनाएं पूर्ण करता है, वह स्वामी नहीं।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१०/५
और यहां हम लोग भगवान को लालच देते हैं कि हमारा ये काम हो जाए तो लड्डू चढ़ाएं या तुम्हारा जगराता करें।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/10/5
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जिस प्रकार सुवर्ण की खानों में पत्थर में मिले हुए सुवर्ण को उसके निकालने की विधि जानने वाला स्वर्णकार उन विधियों से उसे प्राप्त कर लेता है, वैसे ही अध्यात्म तत्व को जानने वाला पुरुष आत्मप्राप्ति के उपायों द्वारा अपने शरीर रूप क्षेत्र में ही ब्रह्मपद का साक्षात्कार कर लेता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/७/२१
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/7/21
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अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ।।२८।।
हे पार्थ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ कर्म है- वह सब 'असत्' है - इस प्रकार कहा जाता है। वह न तो इस लोक में और न परलोक में ही लाभदायक है। अतः समर्पण के साथ श्रद्धा नितान्त आवश्यक है।
श्रीमद्भगवद्गीता: यथार्थ गीता/१७/२८
स्वामी अड़गड़ानन्द जी
यथार्थ गीता: स्वामी अड़गड़ानन्द जी। #swamiadgadanand #shrimadbhagwatgeeta #puranikyatra #mbapanditji #श्रीमद्भगवद्गीता #गीता #bhagwadgeeta
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सभी प्रणियों की मृत्यु अपने पूर्व जन्मों की कर्म वासना के अनुसार समय पर होती है और उसी के अनुसार उनका जन्म भी होता है। परन्तु आत्मा शरीर से अत्यन्त भिन्न है, इसीलिए वह उसमें रहने पर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मों से अछूता ही रहता है। जैसे मनुष्य अपने मकान को अपने से अलग और मिट्टी का समझता है, वैसे ही यह शरीर भी अलग और मिट्टी का है। मोहवश वह इसे अपना समझ बैठता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/२/४१-४२
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/2/41-42
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पितृगण अमावस्या के दिन वायु रूप में घर के द्वारा पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता तब तक वे वहीं भूख प्यास से व्याकुल होकर खड़े रहते हैं।
गरुड़पुराण/धर्मकाण्ड-प्रेतकल्प/१०/५५
गरुड़पुराण/धर्मकाण्ड-प्रेतकल्प/10/55
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