जिस समय मनुष्य अपने मन में रहने वाली कामनाओं का परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१०/९
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/10/9
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प्रह्लाद ने भगवान नृसिंह से कहा - जो स्वामी से अपनी कामनाओं की पूर्ति चाहता है, वह सेवक नहीं; और जो सेवक से सेवा कराने के लिए उसका स्वामी बनने के लिए उसकी कामनाएं पूर्ण करता है, वह स्वामी नहीं।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१०/५
और यहां हम लोग भगवान को लालच देते हैं कि हमारा ये काम हो जाए तो लड्डू चढ़ाएं या तुम्हारा जगराता करें।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/10/5
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जिस प्रकार सुवर्ण की खानों में पत्थर में मिले हुए सुवर्ण को उसके निकालने की विधि जानने वाला स्वर्णकार उन विधियों से उसे प्राप्त कर लेता है, वैसे ही अध्यात्म तत्व को जानने वाला पुरुष आत्मप्राप्ति के उपायों द्वारा अपने शरीर रूप क्षेत्र में ही ब्रह्मपद का साक्षात्कार कर लेता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/७/२१
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/7/21
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अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ।।२८।।
हे पार्थ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ कर्म है- वह सब 'असत्' है - इस प्रकार कहा जाता है। वह न तो इस लोक में और न परलोक में ही लाभदायक है। अतः समर्पण के साथ श्रद्धा नितान्त आवश्यक है।
श्रीमद्भगवद्गीता: यथार्थ गीता/१७/२८
स्वामी अड़गड़ानन्द जी
यथार्थ गीता: स्वामी अड़गड़ानन्द जी। #swamiadgadanand #shrimadbhagwatgeeta #puranikyatra #mbapanditji #श्रीमद्भगवद्गीता #गीता #bhagwadgeeta
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सभी प्रणियों की मृत्यु अपने पूर्व जन्मों की कर्म वासना के अनुसार समय पर होती है और उसी के अनुसार उनका जन्म भी होता है। परन्तु आत्मा शरीर से अत्यन्त भिन्न है, इसीलिए वह उसमें रहने पर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मों से अछूता ही रहता है। जैसे मनुष्य अपने मकान को अपने से अलग और मिट्टी का समझता है, वैसे ही यह शरीर भी अलग और मिट्टी का है। मोहवश वह इसे अपना समझ बैठता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/२/४१-४२
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/2/41-42
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पितृगण अमावस्या के दिन वायु रूप में घर के द्वारा पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता तब तक वे वहीं भूख प्यास से व्याकुल होकर खड़े रहते हैं।
गरुड़पुराण/धर्मकाण्ड-प्रेतकल्प/१०/५५
गरुड़पुराण/धर्मकाण्ड-प्रेतकल्प/10/55
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एक नहीं अनेकों मनुष्य काम से, द्वेष से, भय से और स्नेह से अपने मन को भगवान् में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान् को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्ति से। गोपियों ने भगवान् से मिलन के तीव्र काम अर्थात प्रेम से, कंस ने भय से, शिशुपाल-दन्तवक्त्र आदि राजाओं ने द्वेष से, यदुवंशियों ने परिवार के सम्बन्ध से, पाण्डवों ने स्नेह से और नारदजी ने भक्ति से अपने मन को भगवान् में लगाया है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१/२९-३०
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/1/29-30
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शिशुपाल वध के समय सभी ने देखा कि शिशुपाल की चेतना श्रीकृष्ण में लीन हो गई।
यह देख कर युधिष्ठिर ने नारदजी से पूछा शिशुपाल तो भगवान से द्वेष रखता था फिर उसे वो मुक्ति कैसे मिली जो बड़े बड़े योगियों को भी दुर्लभ है। इस पर नारद जी बोले - युधिष्ठिर! मनुष्य वैरभाव से भगवान् में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोग से नहीं होता।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१/२६
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/1/16
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जैसे व्यापक अग्नि काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न आश्रयों में रहनेपर भी उनसे अलग नहीं जान पड़ती, परन्तु मन्थन करने पर वह प्रकट हो जाती है- वैसे ही परमात्मा सभी शरीरों में रहते हैं, अलग नहीं जान पड़ते। परन्तु विचारशील पुरुष हृदयमन्थन करके- उनके अतिरिक्त सभी वस्तुओं का बाध करके अन्ततः अपने हृदय में ही अन्तर्यामी रूपसे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१/९
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/1/9
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