जो पुत्र पिता के आने पर उनकी आगवानी के लिए सामने नही जाता, वह चौदह इन्द्रो के राज्यकाल तक घोर नरक में पड़ा रहता है। पिता के स्वागत के लिए सामने जाने वाले पुत्र को पग पग पर यज्ञ का फल प्राप्त होता है - ऐसा पौराणिक द्विज कहते हैं।
नारदपुराण।उत्तरभाग।१५।१४
नारद-पुराण/उत्तर-भाग/15/14
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प्राकृत देह का निर्माण होता है स्थूल, सूक्ष्म और कारण - इन तीन देहों के संयोग से। जब तक 'कारण शरीर' रहता है, तब तक इस प्राकृत देह से जीव को छुटकारा नहीं मिलता। 'कारण शरीर' कहते हैं पूर्वकृत कर्मों के उन संस्कारों को, जो देह-निर्माण के कारण होते हैं। इस 'कारण शरीर' के आधार पर जीव को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ना होता है और यह चक्र जीव की मुक्ति न होने तक अथवा 'कारण' का सर्वथा अभाव न होने तक चलता ही रहता है। इसी कर्म बन्धन के कारण पांच भौतिक स्थूल शरीर मिलता है - जो रक्त, मांस, अस्थि आदि से भरा और चमड़े से ढका होता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/३३ (व्याख्या)
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/33
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कुलीन स्त्रियों के लिए जार पुरूष की सेवा सब तरह से निन्दनीय ही है। इससे उनका परलोक बिगड़ता है, स्वर्ग नहीं मिलता, इस लोक में अपयश होता है। यह कुकर्म स्वयं तो अत्यन्त तुच्छ, क्षणिक है ही; इसमें प्रत्यक्ष - वर्तमान में भी कष्ट-ही-कष्ट है। मोक्ष आदि की तो बात ही कौन करे, यह साक्षात् परम भय - नरक आदि का हेतु है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/२९/२६
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/29/26
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स्त्रियों का परम धर्म यही है कि वे पति और उसके भाई-बन्धुओं की निष्कपट भाव से सेवा करें और सन्तान का पालन पोषण करें। जिन स्त्रियों को उत्तम लोक प्राप्त करने की अभिलाषा हो, वे पातकी को छोड़कर और किसी भी प्रकार के पति का परित्याग न करें। भले ही वह बुरे स्वभाव-वाला, भाग्यहीन, वृद्ध, मूर्ख, रोगी या निर्धन ही क्यों न हो।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/२९/२४-२५
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/29/24-25
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भगवान् से केवल सम्बन्ध हो जाना चाहिए। वह सम्बन्ध चाहे जैसा हो - कामका हो, क्रोधका हो या भयका हो; स्नेह, नातेदारी या सौहार्दका हो। चाहे जिस भाव से भगवान् में नित्य-निरन्तर अपनी वृत्तियाँ जोड़ दी जायँ, वे भगवान् से ही जुड़ती हैं। इसलिये वृत्तियाँ भगवन्मय हो जाती हैं और उस जीव को भगवान् की ही प्राप्ति होती है॥
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/२९/१५
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/29/15
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प्राणी अपने कर्म के अनुसार ही पैदा होता और कर्म से ही मर जाता है। उसे उसके कर्म के अनुसार ही सुख-दुःख, भय और मंगल के निमित्तों की प्राप्ति होती है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/२४/१३
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नूनं त्वद्बान्धवा: कृष्ण न चार्हन्त्यवसीदितुम्।
वयं हि सर्वधर्मज्ञ त्वन्नाथास्त्वत्परायणा:।।
श्रीकृष्ण! जिनके तुम्हीं भाई-बन्धु और सब कुछ हो, उन्हें तो किसी किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए। सब धर्मो के ज्ञाता श्यामसुन्दर! तुम्हीं हमारे एकमात्र रक्षक एवं स्वामी हो; हमें केवल तुम्हारा ही भरोसा है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/१९/१०
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जन्मना ब्राह्मणो गुरु:।
ब्राह्मण जन्म से ही मनुष्य मात्र का गुरु है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/८/६
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जो किसी के गुणों में दोष नहीं निकालते, झूठ नहीं बोलते, दम्भ, ईर्ष्या और हिंसा नहीं करते तथा अभिमान से रहित हैं - उन सत्यशील ब्राह्मणों का आशीर्वाद कभी विफल नहीं होता।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/७/१३
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/7/13
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जैसे मिट्टी के बने हुए पदार्थ बनते और बिगड़ते रहते हैं, परन्तु मिट्टी में कोई अदल-बदल नहीं होती - वैसे ही शरीर का तो बनना-बिगड़ना होता ही रहता है; परन्तु आत्मा पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/४/१९
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/4/19
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