समुद्र मंथन के लिए मन्दराचल पर्वत को देव और दानवों ने मिलकर उखाड़ लिया और गरजते हुए समुद्र की और चलने लगे। मन्दराचल बहुत भारी था और उसे लेकर भी बहुत दूर जाना था। देव और दानव बीच में थक कर इस पर्वत को छोड़ दिया। इन लोगों का उत्साह भी मंद पड़ गया था। यह देख कर गरुड़ पर चढ़े हुए भगवान सहसा वहां प्रकट हुए और उन्होंने खेल ही खेल में एक हाथ से उस पर्वत को उठा कर गरुड़ पर रख लिया और स्वयं भी सवार हो गए। पक्षिराज गरुड़ ने समुद्र के तट पर पर्वत को उतार दिया। फिर भगवान् के विदा करने पर गरुड़ जी वहां से चले गये।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/६/३२-३९
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/6)32-39
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कर्म (साधना-पथ) को साधक के स्वभाव में उपलब्ध क्षमता के अनुसार चार भागों में बांटा गया है। कर्म को समझकर मनुष्य जब से आरम्भ करता है, उस आरम्भिक अवस्था में वह शूद्र है। क्रमशः विधि पकड़ आयी तो भी वैश्य है। प्रकृति के संघर्ष को झेलने की क्षमता और शौर्य आने पर वही व्यक्ति क्षत्रिय है और ब्रह्म के तद्रूप होने की क्षमता - ज्ञान(वास्तविक जानकारी), विज्ञान (ईश्वरीय वाणी का मिलन), उस अस्तित्व पर निर्भर रहने की क्षमता ऐसी योग्यताओं के आने पर वही ब्राह्मण है।
श्रीमद्भगवद्गीता: यथार्थ गीता/उपशम
स्वामी अड़गड़ानन्द जी
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यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्र्वरम् |
असम्मूढ़ः स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते || ३ ||
जो मुझ जन्म-मृत्यु से रहित, आदि-अन्त से रहित सब लोको के महान ईश्वर को साक्षात्कारसहित विदित कर लेता है, वह पुरुष मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान है अर्थात अज, अनादि और सर्वलोक महेश्वर को भली प्रकार जानना ही ज्ञान है और ऐसा जानने वाला सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है, पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता।
श्रीमद्भगवद्गीता: यथार्थ गीता/१०/३
स्वामी अड़गड़ानन्द जी
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नारद जी युधिष्ठिर को अपने पूर्व जन्म का वृतांत सुनाते हुए कहते हैं कि - पूर्वजन्म में इससे पहले के महाकल्प मै एक गन्धर्व था और नाम उपबर्हण था। मेरी सुन्दरता, सुकुमारता और मधुरता अपूर्व थी। एक बार देवताओं के यहां संतो का आना हुआ। उसमें भगवान की लीलाओं का गान करने के लिए मुझे बुलाया गया। ये जानते हुए भी कि संतो के बीच भगवान की लीला का गान होता है मैने स्त्रियों के साथ लौकिक गीतों का गान शुरू कर दिया। इससे संत लोग नाराज हो गए और मुझे शूद्र होने का श्राप दिया। उनके श्राप के कारण में एक दासी का पुत्र हुआ। उस जन्म में मैने संतो की सेवा की और उनके आशीष से इस जन्म के ब्रह्माजी का पुत्र हुआ हूं।
संतो की अवहेलना और सेवा का यह मेरा प्रत्यक्ष अनुभव है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१५/६९-७४
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/15/69-74
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भूख और प्यास मिट जाने पर खाने-पीने की कामना का अन्त हो जाता है। क्रोध भी अपना काम पूरा करके शान्त हो जाता है। परन्तु यदि मनुष्य पृथ्वी की समस्त दिशाओं को जीत ले और भोग ले, तब भी लाभ का अन्त नहीं होता।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१५/२०
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/15/20
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युधिष्ठिर! त्रेता आदि युगों में जब विद्वानों ने देखा कि मनुष्य परस्पर एक-दूसरे का अपमान आदि करते हैं, तब उन लोगों ने उपासना की सिद्धि के लिये भगवान् की प्रतिमा की प्रतिष्ठा की। तभी से कितने ही लोग बड़ी श्रद्धा और सामग्री से प्रतिमा में ही भगवान् की पूजा करते हैं। परन्तु जो मनुष्य से द्वेष करते हैं, उन्हें प्रतिमा की उपासना करने पर भी सिद्धि नहीं मिल सकती।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१४/३९-४०
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जैसे स्वप्न टूटने पर मनुष्य स्वप्न के सम्बन्धियों से आसक्त नहीं रहता - वैसे ही ज्यों-ज्यों सत्संग के द्वारा बुद्धि शुद्ध हो, त्यों ही त्यों शरीर, स्त्री, पुत्र, धन आदि की आसक्ति स्वयं छोड़ता चले। क्योंकि एक-न-एक दिन ये छूटने वाले ही हैं।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१४/४
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राधा नाम संकीर्तन Radha Naam Sankirtan #radha #radhakrishna #premanandjimaharaj #vrindavan #premanandjipravachan #premanand
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जिस समय मनुष्य अपने मन में रहने वाली कामनाओं का परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१०/९
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प्रह्लाद ने भगवान नृसिंह से कहा - जो स्वामी से अपनी कामनाओं की पूर्ति चाहता है, वह सेवक नहीं; और जो सेवक से सेवा कराने के लिए उसका स्वामी बनने के लिए उसकी कामनाएं पूर्ण करता है, वह स्वामी नहीं।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१०/५
और यहां हम लोग भगवान को लालच देते हैं कि हमारा ये काम हो जाए तो लड्डू चढ़ाएं या तुम्हारा जगराता करें।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/10/5
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