जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ राग-द्वेष का भाव नहीं रखता तब वह समदर्शी हो जाता है, तथा उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं। विषयोंकी तृष्णा ही दुःखों का उद्गम स्थान है। मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से इसका त्याग कर सकते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही होती रहती है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र से शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिये।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/९/१९/१५-१६
श्रीमद्भागवत-महापुराण/9/19/15-16
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