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#बलिदान दिवस #शहीद दिवस #🇮🇳 देशभक्ति #आज जिनकी पुण्यतिथि है #आज का इतिहास
बलिदान दिवस - सिंध का शेर जब वे किशोर वयस्क अवस्था के थे तब उन्होंने अपने साथियों के साथ विदेशी का बहिष्कार किया और বনুগ্জী  शहीद हेमू कालाणी लोगों से स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का आग्रह किया।  सन् १९४२ में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन तो हेमू इसमें कूद पड़। १९४२ में उन्हें यह गुप्त  शत शत नमन चलाया मिली कि अंग्रेजी सेना हथियारों से भरी रेलगाड़ी  जानकारी रोहड़ी शहर से होकर हेमू कालाणी अपने साथियों  गुजरेगी के साथ रेल पटरी को अस्त व्यस्त करने की योजना बनाई। वे यह सब कार्य अत्यंत गुप्त तरीके से कर रहे थे पर फिर भी॰ वहां पर तेनात पुलिस कर्मियों की नजर उनपर पड़ी और उन्होंने हेमू कालाणी को गिरफ्तार कर लिया और उनके  बाकी साथी फरार हो गए। हेमू कालाणी को कोर्ट ने फांसी  কী মতা उस समय के सिंध के गणमान्य लोगों ने एक सुनाई  पेटीशन दायर की और वायसराय से उनको फांसी की सजा ने इस  ना देने की अपील की। वायसराय शर्त पर यह स्वीकार किया कि हेमू कालाणी अपने साथियों का नाम और पता  शहीट रमू कालानी बताये पर हेमू कालाणी ने यह शर्त अस्वीकार कर दी। २१  जन्म २३ मार्च १९२३ जनवरी १९४३ को उन्हें फांसी की सजा दी गई। जब फांसी  शहादत २१ जनवरी १९४३ से पहले उनसे आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने  স भारतवर्ष  फिर से जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। इन्कलाब जिंदाबाद  और भारत माता की जय की घोषणा के साथ उन्होंने फांसी  को स्वीकार किया सिंध का शेर जब वे किशोर वयस्क अवस्था के थे तब उन्होंने अपने साथियों के साथ विदेशी का बहिष्कार किया और বনুগ্জী  शहीद हेमू कालाणी लोगों से स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का आग्रह किया।  सन् १९४२ में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन तो हेमू इसमें कूद पड़। १९४२ में उन्हें यह गुप्त  शत शत नमन चलाया मिली कि अंग्रेजी सेना हथियारों से भरी रेलगाड़ी  जानकारी रोहड़ी शहर से होकर हेमू कालाणी अपने साथियों  गुजरेगी के साथ रेल पटरी को अस्त व्यस्त करने की योजना बनाई। वे यह सब कार्य अत्यंत गुप्त तरीके से कर रहे थे पर फिर भी॰ वहां पर तेनात पुलिस कर्मियों की नजर उनपर पड़ी और उन्होंने हेमू कालाणी को गिरफ्तार कर लिया और उनके  बाकी साथी फरार हो गए। हेमू कालाणी को कोर्ट ने फांसी  কী মতা उस समय के सिंध के गणमान्य लोगों ने एक सुनाई  पेटीशन दायर की और वायसराय से उनको फांसी की सजा ने इस  ना देने की अपील की। वायसराय शर्त पर यह स्वीकार किया कि हेमू कालाणी अपने साथियों का नाम और पता  शहीट रमू कालानी बताये पर हेमू कालाणी ने यह शर्त अस्वीकार कर दी। २१  जन्म २३ मार्च १९२३ जनवरी १९४३ को उन्हें फांसी की सजा दी गई। जब फांसी  शहादत २१ जनवरी १९४३ से पहले उनसे आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने  স भारतवर्ष  फिर से जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। इन्कलाब जिंदाबाद  और भारत माता की जय की घोषणा के साथ उन्होंने फांसी  को स्वीकार किया - ShareChat