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☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा ७☀️ पृष्ठ ८☀️
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।तिन्हहि बिलोकत पातकभारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना ।
मित्रक दुख रज मेरु समाना ॥१॥
जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने ॥१॥
जिन्ह के असि मति सहज न आई ।
ते सठ कत हठि करत मिताई ॥
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥२॥
जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोक कर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे ॥२॥
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥
बिपति काल कर सतगुन नेहा ।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ॥३॥
देने-लेने में मन में शंका न रखे। अपने बल के अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्ति के समय में तो सदा सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के गुण (लक्षण) ये हैं।
आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई॥
जाकर चित अहि गति सम भाई ।
अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई ॥४॥
जो सामने तो बना-बना कर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है- हे भाई ! [इस तरह) जिसका मन साँप की चालके समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही भलाई है ॥४॥
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥
सखा सोचत्यागहु बलमोरें। सबबिधि घटब काज मैं तोरें॥५॥
मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र- ये चारों शूल के समान [पीड़ा देनेवाले] हैं। हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिन्ता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता करूँगा) ॥५॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा ॥
दुंदुभि अस्थि ताल देखराए ।
बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए ॥६॥
सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर ! सुनिये, बालि महान् बलवान् और अत्यन्त रणधीर है। फिर सुग्रीव ने श्रीरामजी को दुन्दुभि राक्षस की हड्डियों और ताल के वृक्ष दिखलाये। श्रीरघुनाथजी ने उन्हें बिना ही परिश्रम के (आसानी से) ढहा दिया ॥६॥
देखि अमितबल बाढ़ीप्रीती।बालि बधब इन्ह भइ परतीती॥
बारबार नावइपद सीसा।प्रभुहि जानि मनहरष कपीसा॥७॥
श्रीरामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गयी और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालि का वध अवश्य करेंगे। वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे। प्रभु को पहचान कर सुग्रीव मन में हर्षित हो रहे थे ॥७॥
उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथकृपाँ मन भयउअलोला॥
सुखसंपति परिवार बड़ाई।सब परिहरि करिहउँ सेवकाई॥८॥
जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपा से अब मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़प्पन) सब को त्याग कर मैं आपकी सेवा ही करूँगा ॥८॥
ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तवपद अवराधक॥
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। मायाकृत परमारथ नाहीं॥९॥
क्योंकि आपके चरणों की आराधना करनेवाले संत कहते हैं कि ये सब (सुख-सम्पत्ति आदि) रामभक्ति के विरोधी हैं। जगत् में जितने भी शत्रु-मित्र और सुख-दुःख [आदि द्वन्द्ध] हैं, सब- के-सब मायारचित हैं, परमार्थतः (वास्तव में) नहीं हैं॥९॥
बालि परमहित जासु प्रसादा ।
मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा ॥
सपनें जेहिसन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई॥१०॥
हे श्रीरामजी! बालि तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपा से शोक का नाश करनेवाले आप मुझे मिले; और जिसके साथ अब स्वप्न में भी लड़ाई हो तो जागने पर उसे समझकर मन में संकोच होगा [कि स्वप्न में भी मैं उससे क्यों लड़ा]॥१०॥
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती ।
सब तजि भजनु करौं दिन राती ॥
सुनिबिराग संजुत कपिबानी।बोलेबिहॅसि रामु धनुपानी॥११॥
हे प्रभो! अब तो इस प्रकार कृपा कीजिये कि सब छोड़कर दिन-रात में आपका भजन ही करूँ। सुग्रीव की वैराग्ययुक्त वाणी सुन कर (उसके क्षणिक वैराग्य को देखकर) हाथ में धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी मुसकरा कर बोले॥११॥
जो कछु कहेहु सत्य सबसोई। सखा बचन मम मृषा न होई॥
नट मरकट इव सबहि नचावत ।
रामु खगेस बेद अस गावत ॥१२॥
तुमने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य है; परन्तु हे सखा! मेरा वचन मिथ्या नहीं होता (अर्थात् बालि मारा जायगा और तुम्हें राज्य मिलेगा)। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि- हे पक्षियों के राजा गरुड़ ! नट (मदारी) के बंदर की तरह श्रीरामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं ॥१२॥
लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा ॥
तब रघुपति सुग्रीव पठावा ।
गर्जेसि जाइ निकट बल पावा ॥१३॥
तदनन्तर सुग्रीव को साथ ले कर और हाथों में धनुष-बाण धारण करके श्रीरघुनाथजी चले। तब श्रीरघुनाथजी ने सुग्रीव को बालि के पास भेजा। वह श्रीरामजी का बल पा कर बालि के निकट जाकर गरजा ॥१३॥
सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा॥
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा ।
ते द्वौ बंधु तेजबल सींवा ॥१४॥
बालि सुनते ही क्रोध में भर कर वेग से दौड़ा। उसकी स्त्री तारा ने चरण पकड़ कर उसे समझाया कि हे नाथ! सुनिये, सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं॥१४॥
कोसलेस सुत लछिमन रामा ।
कालहु जीति सकहिं संग्रामा ॥१५॥
वे कोसलाधीश दशरथजी के पुत्र राम और लक्ष्मण संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं ॥१५॥
दो०- कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ ।
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ॥७॥
बालि ने कहा- हे भीरु! (डरपोक) प्रिये! सुनो, श्रीरघुनाथजी समदर्शी हैं। जो कदाचित् वे मुझे मारेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा (परम पद पा जाऊँगा) ॥७॥
#सीताराम भजन


