ShareChat
click to see wallet page
search
#शिवलिंग दर्शन शिवलिंग की परिक्रमा के संबंध में शास्त्रों और विशेषकर 'शिव पुराण' में स्पष्ट नियम बताए गए हैं। अपनी इच्छाओं की शीघ्र पूर्ति और महादेव की कृपा प्राप्त करने के लिए परिक्रमा की संख्या और विधि का विशेष महत्व है: * आधी परिक्रमा का नियम: शिवलिंग की हमेशा आधी परिक्रमा ही करनी चाहिए। इसे 'चंद्र चंद्राकार' परिक्रमा भी कहा जाता है। पूर्ण परिक्रमा (पूरा चक्कर काटना) वर्जित मानी गई है। * सोमसूत्र (जलहरी) को न लांघना: शिवलिंग के चारों ओर घूमते समय जहाँ से चढ़ाया गया जल बाहर निकलता है, उसे 'सोमसूत्र' या 'निर्मली' कहा जाता है। इसे कभी भी लांघना नहीं चाहिए। माना जाता है कि सोमसूत्र में शिव की शक्ति और ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिसे लांघने से शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और पुण्य फल नष्ट हो जाता है। * परिक्रमा की विधि: परिक्रमा हमेशा बाईं ओर (Left side) से शुरू करनी चाहिए और जल निकलने वाली नाली (सोमसूत्र) तक जाकर वापस मुड़ जाना चाहिए। फिर दूसरी तरफ से आकर दोबारा उसी स्थान तक पहुँचना चाहिए। इस प्रकार एक 'आधा चक्र' पूरा होता है। * इच्छा पूर्ति के लिए भाव: संख्या से अधिक महत्वपूर्ण आपका भाव है। शिवलिंग की आधी परिक्रमा करते समय 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करने से मानसिक शांति मिलती है और अटके हुए कार्य जल्दी पूरे होते हैं। * कितनी बार करें: सामान्यतः एक बार आधी परिक्रमा करना पर्याप्त है, लेकिन विशेष मन्नत या मानसिक शांति के लिए आप इसे 3, 5 या 7 बार (विषम संख्या में) दोहरा सकते हैं, बशर्ते आप हर बार सोमसूत्र को लांघे बिना वापस मुड़ें। भगवान शिव बहुत भोले हैं, यदि आप पूर्ण श्रद्धा के साथ केवल एक बार भी सही विधि से परिक्रमा करते हैं, तो वे आपकी मनोकामना स्वीकार कर लेते हैं।
शिवलिंग दर्शन - 0909 0909 - ShareChat