#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣9️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुर्नवतितमोऽध्यायः
पूरुवंश का वर्णन...(दिन 290)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्वहन् ।
आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुन्धराम् ।। १५ ।।
इनमें महापराक्रमी तंसुने पौरव वंशका भार वहन करते हुए उज्ज्वल यशका उपार्जन किया और सारी पृथ्वीको जीत लिया ।। १५ ।।
ईलिनं तु सुतं तंसुर्जनयामास वीर्यवान् । सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जयतां वरः ।। १६ ।।
पराक्रमी तंसुने ईलिन नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ था। उसने भी सारी पृथ्वी जीत ली थी ।। १६ ।।
रथन्तर्या सुतान् पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः । ईलिनो जनयामास दुष्यन्तप्रभृतीन् नृपान् ।। १७ ।।
ईलिनने रथन्तरी नामवाली अपनी पत्नीके गर्भसे पंच महाभूतोंके समान दुष्यन्त आदि पाँच राजपुत्रोंको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ।। १७ ।।
दुष्यन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च । तेषां श्रेष्ठोऽभवद् राजा दुष्यन्तो जनमेजय ।। १८ ।।
(उनके नाम ये हैं-) दुष्यन्त, शूर, भीम, प्रवसु तथा वसु। जनमेजय! इनमें सबसे बड़े होनेके कारण दुष्यन्त राजा हुए ।। १८ ।।
दुष्यन्ताद् भरतो जज्ञे विद्वाञ्छाकुन्तलो नृपः । तस्माद् भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद् यशः ।। १९ ।।
दुष्यन्तसे विद्वान् राजा भरतका जन्म हुआ, जो शकुन्तलाके पुत्र थे। उन्हींसे भरतवंशका महान् यश फैला ।। १९ ।।
भरतस्तिसृषु स्त्रीषु नव पुत्रानजीजनत् । नाभ्यनन्दत तान् राजा नानुरूपा ममेत्युत ।। २० ।।
भरतने अपनी तीन रानियोंसे नौ पुत्र उत्पन्न किये। किंतु 'ये मेरे अनुरूप नहीं हैं' ऐसा कहकर राजाने उन शिशुओंका अभिनन्दन नहीं किया ।। २० ।।
ततस्तान् मातरः क्रुद्धाः पुत्रान् निन्युर्यमक्षयम् ।
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितथं पुत्रजन्म तत् ।। २१ ।।
तब उन शिशुओंकी माताओंने कुपित होकर उनको मार डाला। इससे महाराज भरतका वह पुत्रोत्पादन व्यर्थ हो गया ।। २१ ।।
ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा ।
लेभे पुत्रं भरद्वाजाद् भुमन्युं नाम भारत ।। २२ ।।
भारत ! तब महाराज भरतने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया और महर्षि भरद्वाजकी कृपासे एक पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम भुमन्यु था ।। २२ ।।
ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः । भुमन्युं भरतश्रेष्ठ यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ।। २३ ।।
भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर पौरवकुलका आनन्द बढ़ानेवाले भरतने अपनेको पुत्रवान् समझकर भुमन्युको युवराजके पदपर अभिषिक्त किया ।। २३ ।।
ततो दिविरथो नाम भुमन्योरभवत् सुतः ।
सुहोत्रश्च सुहोता च सुहविः सुयजुस्तथा ।। २४ ।।
पुष्करिण्यामृचीकश्च भुमन्योरभवन् सुताः ।
तेषां ज्येष्ठः सुहोत्रस्तु राज्यमाप महीक्षिताम् ।। २५ ।।
भुमन्युके दिविरथ नामक पुत्र हुआ। उसके सिवा सुहोत्र, सुहोता, सुहवि, सुयजु तथा ऋचीक भी भुमन्युके ही पुत्र थे। ये सब पुष्करिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। इन सब क्षत्रियोंमें सुहोत्र ही ज्येष्ठ थे। अतः उन्हींको राज्य मिला ।। २४-२५ ।।
राजसूयाश्वमेधाद्यैः सोऽयजद् बहुभिः सवैः ।
सुहोत्रः पृथिवीं कृत्स्नां बुभुजे सागराम्बराम् ।। २६ ।।
पूर्णा हस्तिगजाश्वेश्च बहुरत्नसमाकुलाम् । ममज्जेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता ।। २७ ।।
हस्त्यश्वरथसम्पूर्णा मनुष्यकलिला भृशम् । सुहोत्रे राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः ।। २८ ।।
राजा सुहोत्रने राजसूय तथा अश्वमेध आदि अनेक यज्ञोंद्वारा यजन किया और समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीका, जो हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न थी, उपभोग किया। जब राजा सुहोत्र धर्मपूर्वक प्रजाका शासन कर रहे थे, उस समय सारी पृथ्वी हाथी, घोड़ों, रथ और मनुष्योंसे खचाखच भरी थी। उन पशु आदिके भारी भारसे पीड़ित होकर राजा सुहोत्रके शासनकालकी पृथ्वी मानो नीचे धँसी जाती थी ।। २६-२८ ।।
चैत्ययूपाङ्किता चासीद् भूमिः शतसहस्रशः ।
प्रवृद्धजनसस्या च सर्वदैव व्यरोचत ।। २९ ।।
उनके राज्यकी भूमि लाखों चैत्यों (देव-मन्दिरों) और यज्ञयूपोंसे चिह्नित दिखायी देती थी। सब लोग हृष्ट-पुष्ट होते थे। खेतीकी उपज अधिक हुआ करती थी। इस प्रकार उस राज्यकी पृथ्वी सदा ही अपने वैभवसे सुशोभित होती थी ।। २९ ।।
ऐक्ष्वाकी जनयामास सुहोत्रात् पृथिवीपतेः ।
अजमीढं सुमीढं च पुरुमीढं च भारत ।। ३० ।।
भारत ! राजा सुहोत्रसे ऐक्ष्वाकीने अजमीढ, सुमीढ तथा पुरुमीढ नामक तीन पुत्रों को जन्म दिया ।। ३० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
#महाभारत


