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#✍मेरे पसंदीदा लेखक #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #📗प्रेरक पुस्तकें📘 #📓 हिंदी साहित्य
✍मेरे पसंदीदा लेखक - कर्मयोगी की मानसिक स्थिति होकर अनासक्त मन से संसार के कल्याण के लिए कर्म करते रहना ٨٤٤ कर्मयोगी का लक्षण है। ऐसे कर्मयोगी दो प्रकार के होते हैं | एक तो वे जो गृही होकर कर्मयोग की साधना करते हैं | घर में रहो चाहे घर छोड़ दो, संसार के कल्याण के लिए कर्म अवश्य करते रहना चाहिए | भगवान के लिए कर्म लोक कल्याण के लिए और इस पर चलना कर्मयोगी का यही साधन है। कर्म, यहृध्येय रखना " गृही और गृह -त्यागी कर्मयोगी के दो रूप  होते हुए " भी दोनों में कोई अंतर नहीं है। कर्मयोगी को लोक  कल्याण के लिए जब गृह त्यागकी आवश्यकता  होती है तब वह गृह त्यागी हो जाता हैऔर जब गृहस्थ जीवनःमें रहकर लोक-कल्याण की अधिक संभावना रहती है तब वह गृही होकर रहता है गृहस्थ होना और गृह त्यागना उसकी लोक॰ सेवा या लोक -कल्याण के अंग होते  हैं।मुख्य उद्देश्य तो लोक भी गृह-्त्याग ल कल्याण ही होता है।फिर कीअपेक्षा लोक-कल्याण साधना में  गृहस्थ होने का अधिक महत्त्व है। ज्योति,  (अखण्ड নিমন্য-1950) कर्मयोगी की मानसिक स्थिति होकर अनासक्त मन से संसार के कल्याण के लिए कर्म करते रहना ٨٤٤ कर्मयोगी का लक्षण है। ऐसे कर्मयोगी दो प्रकार के होते हैं | एक तो वे जो गृही होकर कर्मयोग की साधना करते हैं | घर में रहो चाहे घर छोड़ दो, संसार के कल्याण के लिए कर्म अवश्य करते रहना चाहिए | भगवान के लिए कर्म लोक कल्याण के लिए और इस पर चलना कर्मयोगी का यही साधन है। कर्म, यहृध्येय रखना " गृही और गृह -त्यागी कर्मयोगी के दो रूप  होते हुए " भी दोनों में कोई अंतर नहीं है। कर्मयोगी को लोक  कल्याण के लिए जब गृह त्यागकी आवश्यकता  होती है तब वह गृह त्यागी हो जाता हैऔर जब गृहस्थ जीवनःमें रहकर लोक-कल्याण की अधिक संभावना रहती है तब वह गृही होकर रहता है गृहस्थ होना और गृह त्यागना उसकी लोक॰ सेवा या लोक -कल्याण के अंग होते  हैं।मुख्य उद्देश्य तो लोक भी गृह-्त्याग ल कल्याण ही होता है।फिर कीअपेक्षा लोक-कल्याण साधना में  गृहस्थ होने का अधिक महत्त्व है। ज्योति,  (अखण्ड নিমন্য-1950) - ShareChat