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#पौराणिक कथा ।। राम ।। श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल वध की अमर पौराणिक कथा!!! प्राचीन भारतवर्ष में धर्म, मर्यादा और राजधर्म की प्रतिष्ठा के लिए समय-समय पर दिव्य महासभाएँ आयोजित होती थीं। उन्हीं में सबसे अनुपम और ऐतिहासिक सभा थी — इन्द्रप्रस्थ में महाराज युधिष्ठिर द्वारा किया गया राजसूय यज्ञ। उस महायज्ञ में पृथ्वी के समस्त राजाओं, महर्षियों, ब्राह्मणों और वीरों को आमंत्रित किया गया था। चारों दिशाओं में स्वर्ण- जड़ित स्तंभ शोभायमान थे, रेशमी ध्वज वायु में लहरा रहे थे, सुगंधित पुष्पों की वर्षा हो रही थी और वेद-मंत्रों की गूँज से सम्पूर्ण सभा पवित्र हो उठी थी। सभा के मध्य विशाल मंच सजा था, जहाँ पांडवों सहित समस्त महारथी विराजमान थे। उसी दिव्य मंच पर भगवान श्रीकृष्ण भी सुशोभित थे। उनका श्यामल स्वरूप, मस्तक पर मुकुट, कंठ में वनमाला और नेत्रों में करुणा व तेज एक साथ झिलमिला रहा था। सभा में जब सम्मान देने का समय आया, तब सहदेव उठे और विनम्र स्वर में बोले कि सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण को अग्रपूजा मिलनी चाहिए, क्योंकि वही समस्त जगत के पालक, संहारक और रक्षक हैं। यह सुनते ही सभा में हर्ष की लहर दौड़ गई, पर एक हृदय ऐसा था जो ईर्ष्या से जल उठा — वही था चेदी देश का राजा शिशुपाल। शिशुपाल जन्म से ही अहंकारी और श्रीकृष्ण का विरोधी था। उसकी माता श्रीकृष्ण की बुआ थीं, इसी कारण भगवान ने बाल्यकाल से ही उसके असंख्य अपराध क्षमा किए थे। जीवन भर शिशुपाल कृष्ण का उपहास करता रहा। कभी उन्हें ग्वाला कहता, कभी रणछोड़, कभी छलिया। पर श्रीकृष्ण सदैव मुस्कराकर सब सहते रहे। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि शिशुपाल के सौ अपराधों तक वे उसे क्षमा देंगे। राजसूय यज्ञ की उस दिव्य सभा में जब श्रीकृष्ण को अग्रपूजा मिली, तब शिशुपाल का क्रोध ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा। वह अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और सभा के मध्य गरजने लगा। उसने कहा — “यह यादव कुल का चरवाहा कैसे पूजनीय हो सकता है? जिसने छल से कंस को मारा, जिसने स्त्रियों को हराया, वही आज राजा और ऋषियों से बड़ा बन बैठा है?” उसके वचन बाण बनकर सभा में गूँज उठे। चारों ओर सन्नाटा छा गया। शिशुपाल बोलता ही चला गया। उसने भगवान के कुल, कर्म और मर्यादा पर अपमानजनक शब्दों की वर्षा कर दी। सभा में बैठे राजाओं के मस्तक झुक गए। भीम क्रोध से काँप उठा, अर्जुन का हाथ अनायास ही गांडीव की ओर बढ़ गया, पर श्रीकृष्ण शांत बैठे रहे। उनके मुख पर न क्रोध था, न घृणा — केवल अपार धैर्य था। प्रत्येक अपशब्द के साथ वे मन ही मन अपनी प्रतिज्ञा की गिनती करते रहे। सभा में सूर्य-किरणें स्तंभों से टकराकर चमक रही थीं और उसी प्रकाश में श्रीकृष्ण का तेज और भी दिव्य हो उठा। शिशुपाल को लगा कि कृष्ण मौन हैं तो वह निर्भय है। उसने और भी तीखे शब्द बोलने प्रारंभ कर दिए। वह गरजा — “आज मैं इस सभा में तुम्हारा मिथ्या सम्मान तोड़ दूँगा।” जब शिशुपाल ने मर्यादा की सीमा लाँघ दी और उसका सौवाँ अपराध पूर्ण हो गया, तब श्रीकृष्ण ने धीरे से अपने नेत्र उठाए। उसी क्षण सभा का वातावरण बदल गया। मानो वायु स्थिर हो गई हो, दीपक थम गए हों और समय रुक गया हो। श्रीकृष्ण ने गंभीर, पर शांत स्वर में कहा — “शिशुपाल, मैंने तुझे बहुत सहा। तेरी माता के कारण बार-बार क्षमा करता रहा। पर अब धर्म की रक्षा के लिए दंड आवश्यक हो गया है।” इतना कहकर भगवान ने सिंहासन पर बैठे-बैठे अपना दाहिना हाथ उठाया। उनके संकेत मात्र से सुदर्शन चक्र प्रकट हो गया। वह चक्र सूर्य से भी अधिक तेजस्वी था। उसके किनारों पर अग्नि की ज्वालाएँ नृत्य कर रही थीं और उसके घूमते ही पूरी सभा दिव्य प्रकाश से भर उठी। चित्र के उसी क्षण की भाँति श्रीकृष्ण ने उँगली उठाकर सुदर्शन को आदेश दिया। चक्र बिजली की गति से घूमता हुआ आकाश में धनुषाकार मार्ग बनाता हुआ आगे बढ़ा। उसकी चमक स्तंभों पर पड़ी, राजाओं के मुकुट दमक उठे और सभा में उपस्थित सभी लोग विस्मय से खड़े हो गए। शिशुपाल अभी भी कुछ बोलने ही वाला था कि सुदर्शन उसकी ओर पहुँच चुका था। एक ही क्षण में वह तेज शिशुपाल के कंठ तक पहुँचा। भयंकर गर्जना हुई और अगले ही पल उसका सिर शरीर से अलग हो गया। उसका अहंकार उसी क्षण चूर-चूर हो गया। शरीर भूमि पर गिर पड़ा और मस्तक सभा के फर्श पर लुढ़क गया। सम्पूर्ण सभा स्तब्ध रह गई। उसी क्षण एक और अद्भुत दृश्य घटित हुआ। शिशुपाल के शरीर से एक दिव्य ज्योति निकली और सीधे श्रीकृष्ण में विलीन हो गई। इससे ज्ञात हुआ कि शिशुपाल पूर्व जन्म में भगवान का पार्षद था — जय-विजय में से एक। भगवान से वैर करके भी उसे अंततः भगवान में ही लीन होना था। श्रीकृष्ण का मुख शांत था। न उनमें विजय का गर्व था, न क्रोध। उन्होंने सभा की ओर देखकर कहा — “धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी करुणा को भी कठोर बनना पड़ता है।” सभा में उपस्थित महाराज युधिष्ठिर के नेत्र भर आए। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा — “प्रभु, आज आपने केवल शिशुपाल का नहीं, अधर्म का अंत किया है।” भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव सभी नतमस्तक हो गए। ऋषियों ने वेद-मंत्रों का उच्चारण किया। आकाश से पुष्पवृष्टि हुई, देवताओं ने शंखनाद किया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड धर्म-विजय का उत्सव मना रहा हो। शिशुपाल का वध केवल एक राजा का अंत नहीं था, वह अहंकार, ईर्ष्या और अधर्म का विनाश था। श्रीकृष्ण ने पुनः शांत भाव से सिंहासन ग्रहण करते हुए कहा — “जो मेरे भक्तों का अपमान करेगा, जो धर्म का तिरस्कार करेगा, वह चाहे मेरा संबंधी ही क्यों न हो, दंड से नहीं बचेगा।” यह वाक्य युगों तक स्मरणीय बन गया। उसी दिन राजसूय यज्ञ पूर्ण हुआ और पांडवों का यश चारों दिशाओं में फैल गया। पर उससे भी अधिक फैला श्रीकृष्ण का यह संदेश कि क्षमा की भी सीमा होती है और जब अधर्म बढ़ जाए तो भगवान स्वयं हस्तक्षेप करते हैं। श्रीकृष्ण शांत सिंहासन पर विराजमान होकर केवल उँगली उठाकर सुदर्शन छोड़ते हैं, वह दर्शाता है कि भगवान को क्रोध नहीं, बल्कि न्याय प्रेरित करता है। शिशुपाल का झुका हुआ शरीर यह सिखाता है कि अहंकार चाहे कितना भी ऊँचा क्यों न हो, वह धर्म के सामने टिक नहीं सकता। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि भगवान केवल प्रेम के ही नहीं, बल्कि न्याय के भी प्रतीक हैं। वे पहले अवसर देते हैं, सहते हैं, सुधार का मार्ग दिखाते हैं, पर जब कोई निरंतर अधर्म करे तो वही करुणा दंड बन जाती है। शिशुपाल का वध इतिहास नहीं, चेतावनी है — कि अहंकार का अंत निश्चित है और धर्म की विजय सदा होती है। आज भी जब भक्त श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं, तो उन्हें केवल मुरलीधर नहीं, बल्कि धर्मरक्षक स्वरूप भी स्मरण आता है। वही श्रीकृष्ण जो गोपियों संग रास रचाते हैं, वही श्रीकृष्ण सभा में सुदर्शन चलाकर अधर्म का नाश भी करते हैं। यही उनकी पूर्णता है — प्रेम और न्याय दोनों का संतुलन। जय श्री कृष्ण ।। हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे ।।
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