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।। ॐ ।। सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥ सब इन्द्रियों के दरवाजों को रोककर अर्थात् वासनाओं से अलग रहकर, मन को हृदय में स्थित करके (ध्यान हृदय में ही धरा जाता है, बाहर नहीं। पूजा बाहर नहीं होती), प्राण अर्थात् अन्तःकरण के व्यापार को मस्तिष्क में निरोधकर योग-धारणा में स्थित होकर (योग को धारण किये रहना है, दूसरा तरीका नहीं है) -"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - || 35 || सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ सब इन्द्रियों के दरवाजों को रोककर अर्थात् वासनाओं से अलग रहकर , मन को हृदय में स्थित करके ( ध्यान हृदय में ही धरा जाता है , बाहर नहीं । पूजा बाहर नहीं होती ) , प्राण अर्थात् अन्तःकरण के व्यापार को मस्तिष्क में निरोधकर योग धारणा में स्थित होकर ( योग को धारण किये रहना है , दूसरा तरीका नहीं है ) - यथार्थ गीता - ShareChat