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#लो वही हुआ
लो वही हुआ - लो बही हुआ जिसका था डर ना रही नदी, ना रही लहर। सूरज की किरन दहाड़ गई गरमी हर देह उघाड़ गई उठ गया बवंड़र, धूल हवा में अपना झंडा़ गाड गई गौरइया हाँफ रही डर कर ना रही नदी, ना रही लहर। ओर उमस के चर्चे हैं हर बिजली पंखों के खर्चे हैं बूढे महुए के हाथों से उड़ रहे हवा में पर्चे हैं साथी लू से बचकर " चलना ना रही नदी॰ ना रही लहर। संकल्प हिमालय सा गलता सारा दिन भट्ठी सा जलता मन भरे हुए, सब डरे हुए किस की हिम्मत बाहर हिलता है खडा सूर्य सरके ऊपर ना रही नदी, ना रही लहर।  बोझिल रातों के मध्य पहर छपरी से चन्दकिरण ऋनकर लो बही हुआ जिसका था डर ना रही नदी, ना रही लहर। सूरज की किरन दहाड़ गई गरमी हर देह उघाड़ गई उठ गया बवंड़र, धूल हवा में अपना झंडा़ गाड गई गौरइया हाँफ रही डर कर ना रही नदी, ना रही लहर। ओर उमस के चर्चे हैं हर बिजली पंखों के खर्चे हैं बूढे महुए के हाथों से उड़ रहे हवा में पर्चे हैं साथी लू से बचकर " चलना ना रही नदी॰ ना रही लहर। संकल्प हिमालय सा गलता सारा दिन भट्ठी सा जलता मन भरे हुए, सब डरे हुए किस की हिम्मत बाहर हिलता है खडा सूर्य सरके ऊपर ना रही नदी, ना रही लहर।  बोझिल रातों के मध्य पहर छपरी से चन्दकिरण ऋनकर - ShareChat