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#पालकर रख न उसे हाथ के छाले
पालकर रख न उसे हाथ के छाले - पालकर रख न उसे हाथ के छाले जैसा देर तक दुख को नहीं ओढ़ दुशाले जैसा ठीक तो ये है कि दुख्र जितना है उतना ही रहे भाले जैसा एककाँटे कोबच 7 7 लोग बेदेर्न हेकितने किदहो देतहै सोचते क्यार्ध्हो देल हीता शिवाले्जैसा दृज़को राँदये कैसा हैजो पूछा तूने =तेरेकन केबल१्ज्ैसा గ / मुझको ११ अपने बंगले के ही गैरेज में दे दी हजगह उसने माँ बाप को रक्खा है अटाले जैसा मैंने देखा है तेरे लाज भरे मुखड़े पर आरती में जले दीपक के उजाले जैसा संत बनते हैं सभी लोग सियासत वाले बह रहा सबके ही पेंदों में पनाले जैसा व्यंग्य के नाम पे जो हास्य परोसा फूहड़ उसमें करुणा का है उपयोग मसाले जैसा शेर होता है ग़ज़ल का बही उम्दा , सच्चा पालकर रख न उसे हाथ के छाले जैसा देर तक दुख को नहीं ओढ़ दुशाले जैसा ठीक तो ये है कि दुख्र जितना है उतना ही रहे भाले जैसा एककाँटे कोबच 7 7 लोग बेदेर्न हेकितने किदहो देतहै सोचते क्यार्ध्हो देल हीता शिवाले्जैसा दृज़को राँदये कैसा हैजो पूछा तूने =तेरेकन केबल१्ज्ैसा గ / मुझको ११ अपने बंगले के ही गैरेज में दे दी हजगह उसने माँ बाप को रक्खा है अटाले जैसा मैंने देखा है तेरे लाज भरे मुखड़े पर आरती में जले दीपक के उजाले जैसा संत बनते हैं सभी लोग सियासत वाले बह रहा सबके ही पेंदों में पनाले जैसा व्यंग्य के नाम पे जो हास्य परोसा फूहड़ उसमें करुणा का है उपयोग मसाले जैसा शेर होता है ग़ज़ल का बही उम्दा , सच्चा - ShareChat
#संध्या आज प्रसन्न है
संध्या आज प्रसन्न है - पहले शिशु के जन्म दिवस पर शकुर भरी कोई माँ पलना झुलवाए ' फूलीनसी वैसे ही बस संध्या आज प्रसन्न है पश्चिम के गालों पर लाली दौड़ गई चित्रकार सूरज अब शयनागार चला शृंगों को दे दिए मुकुट जाते जाते चंचल लहरों के मुख पर सिंदूर मला पहले कश्ती को उतारते सागर में मछुअन तिलक करे माँझी को फूलीनसी वैसे ही बस संध्या आज प्रसन्न है गोधूली क्या केसर घुली समीरण में गाय रंभायी , गूँजे शंख शिवालों से  रामधुन गाते लौटे नीड़ों को নি্যা' के स्वर फूटे चौपालों से HIqU मनचीते हाथों से माँग सिंदूर भरे कोई दुलहन डोली बैठे फूली सी वैसे ही बस आज संध्या प्रसन्न है निकला संध्या-तारा दिशा सुहागन है शलथ तन पर ममता का आँचल डाल रही आँगन बालक जुड़े कहानी सुनने को पहले शिशु के जन्म दिवस पर शकुर भरी कोई माँ पलना झुलवाए ' फूलीनसी वैसे ही बस संध्या आज प्रसन्न है पश्चिम के गालों पर लाली दौड़ गई चित्रकार सूरज अब शयनागार चला शृंगों को दे दिए मुकुट जाते जाते चंचल लहरों के मुख पर सिंदूर मला पहले कश्ती को उतारते सागर में मछुअन तिलक करे माँझी को फूलीनसी वैसे ही बस संध्या आज प्रसन्न है गोधूली क्या केसर घुली समीरण में गाय रंभायी , गूँजे शंख शिवालों से  रामधुन गाते लौटे नीड़ों को নি্যা' के स्वर फूटे चौपालों से HIqU मनचीते हाथों से माँग सिंदूर भरे कोई दुलहन डोली बैठे फूली सी वैसे ही बस आज संध्या प्रसन्न है निकला संध्या-तारा दिशा सुहागन है शलथ तन पर ममता का आँचल डाल रही आँगन बालक जुड़े कहानी सुनने को - ShareChat
#रातें विमुख दिवस बेगाने
रातें विमुख दिवस बेगाने - रातें विमुख दिवस बेगाने समय हमारा हमें न माने! लिखें अगर बारिश में पानी புஎகிக कहानी पहले जैसे नहीं रहे अब ऋतुओं के रंग- रूप सुहाने 1 दिन में सूरज, रात चन्द्रमा दिख जाता है, याद आने पर हम गुलाब की चर्चा करते हैं गुलाब के झर जाने पर | हमने , युग ने या चीज़ों ने aarax೯ ঠী২-ঠিক্ান रातें विमुख दिवस बेगाने समय हमारा हमें न माने! लिखें अगर बारिश में पानी புஎகிக कहानी पहले जैसे नहीं रहे अब ऋतुओं के रंग- रूप सुहाने 1 दिन में सूरज, रात चन्द्रमा दिख जाता है, याद आने पर हम गुलाब की चर्चा करते हैं गुलाब के झर जाने पर | हमने , युग ने या चीज़ों ने aarax೯ ঠী২-ঠিক্ান - ShareChat
#bht aai gai yade mgr is bar tum aana #zindagi me pahli bar is dil ne kisi ke dil ko chaha tha #tum aaj to pathar bar sa lo tum rooge is pagal ke liye
bht aai gai yade mgr is bar tum aana - जिसके पास चली गयी मेरी ज़मीन उसी के पास अब मेरी बारिश भी चली गयी : : अब जो घिरती हैं काली घटाएं उसी के लिए घिरती है हैं कोयलें उसी के लिए कूकती उसी के लिए उठती है धरती के सीने से सोंधी सुगंध अब नहीं मेरे लिए हल नही बैल नही खेतों की गैल नहीं एक हरी बूँद नहीं तोते नहीं, ताल नहीं, नदी नहीं, आर्द्रा नक्षत्र नहीं, कजरी मल्हाहर नहीं मेरे लिए जिसकी नहीं कोई जमीन उसका नहीं कोई आसमान। जिसके पास चली गयी मेरी ज़मीन उसी के पास अब मेरी बारिश भी चली गयी : : अब जो घिरती हैं काली घटाएं उसी के लिए घिरती है हैं कोयलें उसी के लिए कूकती उसी के लिए उठती है धरती के सीने से सोंधी सुगंध अब नहीं मेरे लिए हल नही बैल नही खेतों की गैल नहीं एक हरी बूँद नहीं तोते नहीं, ताल नहीं, नदी नहीं, आर्द्रा नक्षत्र नहीं, कजरी मल्हाहर नहीं मेरे लिए जिसकी नहीं कोई जमीन उसका नहीं कोई आसमान। - ShareChat