¤♡¤♡  || Misthi ||  ♡¤♡¤
ShareChat
click to see wallet page
@70275418
70275418
¤♡¤♡ || Misthi || ♡¤♡¤
@70275418
Kavita creator
#अपनी गंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा - चाहे सभी सुमन बिक जाएं चाहे ये उपवन बिक जाएं चाहे सौ फागुन बिक जाएं पर मैं गंध नहीं बेचूंगा - अपनी गंध नहीं बेचूंगा जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें ओ मुझ पर मंडरानेवालों मेरा मोल लगानेवालों जो मेरा संस्कार बन गईवो सौगंध नहीं बेचूंगा अपनी गंध नहीं बेचूंगा - चाहे सभी सुमन बिक जाएं। मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा जाएगा दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा के सुर '  पतझारों का कोमल भंवरों : सरगम যীনা-খ্ীনা मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू ्टोना ओ नीलम लगानेवालों पल-्पल दाम बढानेवालों मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनबंध नहीं बेचंगा चाहे सभी सुमन बिक जाएं चाहे ये उपवन बिक जाएं चाहे सौ फागुन बिक जाएं पर मैं गंध नहीं बेचूंगा - अपनी गंध नहीं बेचूंगा जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें ओ मुझ पर मंडरानेवालों मेरा मोल लगानेवालों जो मेरा संस्कार बन गईवो सौगंध नहीं बेचूंगा अपनी गंध नहीं बेचूंगा - चाहे सभी सुमन बिक जाएं। मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा जाएगा दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा के सुर '  पतझारों का कोमल भंवरों : सरगम যীনা-খ্ীনা मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू ्टोना ओ नीलम लगानेवालों पल-्पल दाम बढानेवालों मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनबंध नहीं बेचंगा - ShareChat
#छीनकर छ्लछंद से
छीनकर छ्लछंद से - छीनकर छ्लछंद से हक पराया मारकर अम्रित पिया तो क्या पिया? हो गये बेशक अमर जी रहे अम्रित उमर लेकिन अभय अनमोल सारा छिन गया | देवता तो हो गये पर क्या हुआ देवत्व का? आयुभर चिन्ता करो अब पद प्रतिष्टा, राजसत्ता और अपने लोक की! छिन नहीं जाए सुधा सिंहासनों की एकहि भय रात दिन आठों प्रहर प्राण में बैठा रहे-- इस भयातुर अमर जीवन का करो क्या? जो किसि षड्यंत्र मे छलछंद में शामिल नहीं था पी गया सारा हलाहल हो गया कैसे अमर? पा गया साम्राज्य ++- छीनकर छ्लछंद से हक पराया मारकर अम्रित पिया तो क्या पिया? हो गये बेशक अमर जी रहे अम्रित उमर लेकिन अभय अनमोल सारा छिन गया | देवता तो हो गये पर क्या हुआ देवत्व का? आयुभर चिन्ता करो अब पद प्रतिष्टा, राजसत्ता और अपने लोक की! छिन नहीं जाए सुधा सिंहासनों की एकहि भय रात दिन आठों प्रहर प्राण में बैठा रहे-- इस भयातुर अमर जीवन का करो क्या? जो किसि षड्यंत्र मे छलछंद में शामिल नहीं था पी गया सारा हलाहल हो गया कैसे अमर? पा गया साम्राज्य ++- - ShareChat
#गन्ने! मेरे भाई!
गन्ने! मेरे भाई! - इक्ष्वाकु वंश के आदि पुरुष गन्ने! मेरे भाई!! रेशे रेशे में रस और रगनरग में मिठास का जस ri तो प्यारे भाई गन्ने! इक्ष्वाकु वंश के आदर्श! ! तुम्हारा वही हश्र होगा जो होता आया है-- पोरी-पोरी काटेंगे लोग तुम्हें चूस- चूसकर खाएँगे चरखियों में पेलेंगे आख़िरी बूँद तक निचोड़ेंगे किसी भी क़ीमत पर तुम्हें ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे तुम्हारे वल्कल जैसे छिलकों तक को सुखाएँगे तुम्हारे ही रस से गुड़ या शक्कर बनाने वाली भट्ठी में ईंधन बनाकर स्तत्राागे | इक्ष्वाकु वंश के आदि पुरुष गन्ने! मेरे भाई!! रेशे रेशे में रस और रगनरग में मिठास का जस ri तो प्यारे भाई गन्ने! इक्ष्वाकु वंश के आदर्श! ! तुम्हारा वही हश्र होगा जो होता आया है-- पोरी-पोरी काटेंगे लोग तुम्हें चूस- चूसकर खाएँगे चरखियों में पेलेंगे आख़िरी बूँद तक निचोड़ेंगे किसी भी क़ीमत पर तुम्हें ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे तुम्हारे वल्कल जैसे छिलकों तक को सुखाएँगे तुम्हारे ही रस से गुड़ या शक्कर बनाने वाली भट्ठी में ईंधन बनाकर स्तत्राागे | - ShareChat
#चंदू, मैंने सपना देखा,
चंदू, मैंने सपना देखा, - चंदू , मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू मैंने सपना देखा, खेल॰्कूद में हो बेकाबू मैंने सपना देखा देखा, कल परसों ही छूट रहे हो चंदू , मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो चंदू , मैंने सपना देखा, लाएहो तुम नया कैलंडर चंदू , मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ अंदर चंदू , मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो चंदू मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा चंदू मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा चंदू मैंने सपना देखा, बहुत बड़े डाक्टर हो तुम तो चंदू मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो चंदू , मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम चंदू , मैंने सपना देखा, पुलिसऱ्यान में बैठे हो तुम चंदू , मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ अंदर चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलेंडर चंदू , मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू मैंने सपना देखा, खेल॰्कूद में हो बेकाबू मैंने सपना देखा देखा, कल परसों ही छूट रहे हो चंदू , मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो चंदू , मैंने सपना देखा, लाएहो तुम नया कैलंडर चंदू , मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ अंदर चंदू , मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो चंदू मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा चंदू मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा चंदू मैंने सपना देखा, बहुत बड़े डाक्टर हो तुम तो चंदू मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो चंदू , मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम चंदू , मैंने सपना देखा, पुलिसऱ्यान में बैठे हो तुम चंदू , मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ अंदर चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलेंडर - ShareChat
#मैं हरि, पतित पावन सुने।
मैं हरि, पतित पावन सुने। - ShareChat
00:10
#और काहि माँगिये, को मागिबो निवारै
और काहि माँगिये, को मागिबो निवारै - और काहि माँगिये , को मागिबो निवारै। अभिमत दातार कौन, दुख दरिद्र दारै।I धरम धाम राम कामनकोटि-रूप रूरो। साहब सब बिधि सुजान , दान खड्ग सूरो। सुखमय दिन द्वै निसान सबके द्वार बाजै। कुसमय दसरथके दानि! तैं गरीब निवाजै।I fJ' गुन बिहीन दीनता सेवा सुनाये। जे जे तैं निहाल किये फूले फिरत पाये।I तुलसीदास जाचक रुचि जानि दान दीजै। रामचंद्र चंद तू, चकोर मोहि कीजैII और काहि माँगिये , को मागिबो निवारै। अभिमत दातार कौन, दुख दरिद्र दारै।I धरम धाम राम कामनकोटि-रूप रूरो। साहब सब बिधि सुजान , दान खड्ग सूरो। सुखमय दिन द्वै निसान सबके द्वार बाजै। कुसमय दसरथके दानि! तैं गरीब निवाजै।I fJ' गुन बिहीन दीनता सेवा सुनाये। जे जे तैं निहाल किये फूले फिरत पाये।I तुलसीदास जाचक रुचि जानि दान दीजै। रामचंद्र चंद तू, चकोर मोहि कीजैII - ShareChat
#यह बिनती रहुबीर गुसाईं
यह बिनती रहुबीर गुसाईं - यह बिनती रहुबीर गुसाईं। और आस बिस्वास भरोसो , हरौ जीव जड़ताई II१ II चहौं न सुगति, संपति कछु रिधि सिधि सुमति- बिपुल  बड़ाई। हेतु रहित अनुराग रामपद , बढ अनुदिन अधिकाई II ?/| कुटिल करम लै जाइ मोहि, जहँ-जहँ अपनी ayii तहँ-्तहँ जनि छिन छोह छाँडिये, कमठ अण्डकी नाई।।३| यहि जगमें , जहँ लगि या तनुकी श्रीति प्रतीति सगाई। ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों , होहिं सिमिति इक ಕತIl8 Il यह बिनती रहुबीर गुसाईं। और आस बिस्वास भरोसो , हरौ जीव जड़ताई II१ II चहौं न सुगति, संपति कछु रिधि सिधि सुमति- बिपुल  बड़ाई। हेतु रहित अनुराग रामपद , बढ अनुदिन अधिकाई II ?/| कुटिल करम लै जाइ मोहि, जहँ-जहँ अपनी ayii तहँ-्तहँ जनि छिन छोह छाँडिये, कमठ अण्डकी नाई।।३| यहि जगमें , जहँ लगि या तनुकी श्रीति प्रतीति सगाई। ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों , होहिं सिमिति इक ಕತIl8 Il - ShareChat