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#धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ - धरा को उठाओ , गगन को झुकाओ दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा धरा को उठाओ , गगन को झुकाओ! बहुत बार आई-गई यह दिवाली मगर तम जहां था वहीं पर खड़ा है, बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक कफन रात का हर चमन पर पड़ा है, न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न ट्ूटे उषा को जगाओ , निशा को सुलाओ! दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा धरा को उठाओ , गगन को झुकाओ! सृजन शान्ति के वास्ते है जरूरी कि हरद्वार पर रोशनी गीत गाये तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा , कि जब प्यार तलावार से जीत जाये, घृणा बढ रही है, अमा चढ़ रही है मनुज को जिलाओ , दनुज को मिटाओ! दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा धरा को उठाओ , गगन को झुकाओ ! बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के न वह बंद रहती किसी के भवन में , धरा को उठाओ , गगन को झुकाओ दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा धरा को उठाओ , गगन को झुकाओ! बहुत बार आई-गई यह दिवाली मगर तम जहां था वहीं पर खड़ा है, बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक कफन रात का हर चमन पर पड़ा है, न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न ट्ूटे उषा को जगाओ , निशा को सुलाओ! दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा धरा को उठाओ , गगन को झुकाओ! सृजन शान्ति के वास्ते है जरूरी कि हरद्वार पर रोशनी गीत गाये तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा , कि जब प्यार तलावार से जीत जाये, घृणा बढ रही है, अमा चढ़ रही है मनुज को जिलाओ , दनुज को मिटाओ! दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा धरा को उठाओ , गगन को झुकाओ ! बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के न वह बंद रहती किसी के भवन में , - ShareChat