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☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा १०☀️ पृष्ठ ११☀️
सुमनत राम अतिकोमल बानी। बालि सीस परसेउ निजपानी॥
अचल करौं तनु राखहु प्राना।
बालि कहा सुनु कृपानिधाना ॥१॥
बालि की अत्यन्त कोमल वाणी सुन कर श्रीरामजी ने उसके सिर को अपने हाथ से स्पर्श किया [और कहा-] मैं तुम्हारे शरीर को अचल कर दूँ, तुम प्राणों को रखो। बालिने कहा- हे कृपानिधान ! सुनिये ॥१॥
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥
जासु नाम बल संकर कासी।
देत सबहि सम गति अबिनासी ॥२॥
मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) [अनेकों प्रकार का साधन करते रहते हैं। फिर भी अन्तकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता (उनके मुख से रामनाम नहीं निकलता)। जिनके नाम के बल से शङ्करजी काशी में सबको समानरूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं ॥२॥
मम लोचन गोचर सोइ आवा ।
बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा ॥३॥
वह श्रीरामजी स्वयं मेरे नेत्रों के सामने आ गये हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा ॥३॥
छ०-सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।
जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥
मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।
अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥
श्रुतियाँ 'नेति-नेति' कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मनको जीतकर एवं इन्द्रियोंको [विष- यों के रस से सर्वथा] नीरस बना कर मुनिगण ध्यान में जिनकी कभी क्वचित् ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं।आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो। परन्तु ऐसामूर्ख कौन होगा जो हठ पूर्वक कल्पवृक्ष को काट कर उससे बबूर के बाड़ लगावेगा (अर्थात् पूर्णकाम बना देनेवाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीरकी रक्षा चाहेगा) ॥
अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।
जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥
यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ।
गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिए॥
हे नाथ! अब मुझ पर दयादृष्टि कीजिये और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिये। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं श्रीराम जी (आप)के चरणोंमें प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये। और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बाँह पकड़ कर इसे अपना दास बनाइये ॥
दो०- राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।
सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥१०॥
श्रीरामजी के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बालि ने शरीर को वैसे ही (आसानी से) त्याग दिया जैसे हाथी अपने गले से फूलों की माला का गिरना न जाने ॥१०॥
#सीताराम भजन


