sn vyas
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(जतुगृहपर्व)
पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
माता कुन्ती के लिये भीमसेन का जल ले आना, माता और भाइयों को भूमि पर सोये देखकर भीम का विषाद एवं दुर्योधन के प्रति क्रोध...(दिन 442)
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ज्ञातयो यस्य नैव स्युर्विषमाः कुलपांसनाः।
स जीवेत सुखं लोके ग्रामद्रुम इवैकजः ।। ३२ ।।
'जिसके कुटुम्बी पक्षपातयुक्त और कुलको कलंक लगानेवाले नहीं होते, वह पुरुष गाँवके अकेले वृक्षकी भाँति संसारमें सुखपूर्वक जीवन धारण करता है ।। ३२ ।।
एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत् पर्णफलान्वितः ।
चैत्यो भवति निर्जातिरर्चनीयः सुपूजितः ।। ३३ ।।
'गाँवमें यदि एक ही वृक्ष पत्र और फल-फूलोंसे सम्पन्न हो तो वह दूसरे सजातीय वृक्षोंसे रहित होनेपर भी चैत्य (देववृक्ष) माना जाता है तथा उसे पूज्य मानकर उसकी खूब पूजा की जाती है ।। ३३ ।।
येषां च बहवः शूरा ज्ञातयो धर्ममाश्रिताः ।
ते जीवन्ति सुखं लोके भवन्ति च निरामयाः ।। ३४ ।।
'जिनके बहुत-से शूरवीर भाई-बन्धु धर्म-परायण होते हैं, वे भी संसारमें नीरोग रहते और सुखसे जीते हैं ।। ३४ ।।
बलवन्तः समृद्धार्था मित्रबान्धवनन्दनाः ।
जीवन्त्यन्योन्यमाश्रित्य द्रुमाः काननजा इव ।। ३५ ।।
'जो बलवान्, धनसम्पन्न तथा मित्रों और भाई-बन्धुओंको आनन्दित करनेवाले हैं, वे जंगलके वृक्षोंकी भाँति एक-दूसरेके सहारे जीवन धारण करते हैं ।। ३५ ।। वयं तु धृतराष्ट्रण सपुत्रेण दुरात्म दुरात्मना ।
विवासिता न दग्धाश्च न दग्धाश्च कथंचिद् दैवसंश्रयात दैवसंश्रयात् ।। ३६ ।।
'दुरात्मा धृतराष्ट्र और उसके पुत्रोंने तो हमें घरसे निकाल दिया और जलानेकी भी चेष्टा की, परंतु किसी तरह भाग्यके भरोसे हम बच गये हैं ।। ३६ ।।
तस्मान्मुक्ता वयं दाहादिमं वृक्षमुपाश्रिताः ।
कां दिशं प्रतिपत्स्यमः प्राप्ताः क्लेशमनुत्तमम् ।। ३७ ।।
'आज उस अग्निदाहसे मुक्त हो हम इस वृक्षके नीचे आश्रय ले रहे हैं। हमें किस दिशामें जाना है, इसका भी पता नहीं है। हम भारी-से-भारी कष्ट उठा रहे हैं ।। ३७ ।।
सकामो भव दुर्बुद्धे धार्तराष्ट्राल्पदर्शन । नूनं देवाः प्रसन्नास्ते नानुज्ञां मे युधिष्ठिरः ।। ३८ ।।
प्रयच्छति वधे तुभ्यं तेन जीवसि दुर्मते । नन्वद्य त्वां सहामात्यं सकर्णानुजसौबलम् ।। ३९ ।।
गत्वा क्रोधसमाविष्टः प्रेषयिष्ये यमक्षयम् । किं नु शक्यं मया कर्तुं यत् ते न क्रुध्यते नृपः ।। ४० ।।
धर्मात्मा पाण्डवश्रेष्ठः पापाचार युधिष्ठिरः।
एवमुक्त्वा महाबाहुः क्रोधसंदीप्तमानसः ।। ४१ ।।
करं करेण निष्पिष्य निःश्वसन् दीनमानसः ।
पुनर्दीनमना भूत्वा शान्तार्चिरिव पावकः ।। ४२ ।।
भ्रातृन् महीतले सुप्तानवैक्षत वृकोदरः । विश्वस्तानिव संविष्टान् पृथग्जनसमानिव ।। ४३ ।।
'ओ दुर्बुद्धि अल्पदर्शी धृतराष्ट्रकुमार दुर्योधन! आज तेरी कामना पूरी हुई। निश्चय ही देवता तुझपर प्रसन्न हैं। तभी तो राजा युधिष्ठिर मुझे तेरा वध करनेकी आज्ञा नहीं दे रहे हैं। दुर्मते ! यही कारण है कि तू अबतक जी रहा है। रे पापाचारी! मैं आज ही जाकर कुपित हो मन्त्रियों, कर्ण, छोटे भाई और शकुनिसहित तुझे यमलोक भेज सकता हूँ। किंतु क्या करूँ, पाण्डवश्रेष्ठ धर्मात्मा युधिष्ठिर तुझपर कोप नहीं कर रहे हैं'। यों कहकर महाबाहु भीम मन-ही-मन क्रोधसे जलते और हाथ-से-हाथ मलते हुए दीनभावसे लंबी साँसें खींचने लगे। बुझी हुई लपटोंवाली अग्निकी भाँति दीनहृदय होकर वे पुनः धरतीपर सोये हुए भाइयोंकी ओर देखने लगे। उनके वे सभी भाई साधारण लोगोंकी भाँति भूमिधर ही निश्चिन्ततापूर्वक सो रहे थे ।। ३८-४३ ।।
नातिदूरेण नगरं वनादस्माद्धि लक्षये । जागर्तव्ये स्वपन्तीमे हन्त जागर्म्यहं स्वयम् ।। ४४ ।।
पास्यन्तीमे जलं पश्चात् प्रतिबुद्धा जितक्लमाः । इति भीमो व्यवस्यैव जजागार स्वयं तदा ।। ४५ ।।
उस समय भीम इस प्रकार विचार करने लगे- 'अहो! इस वनसे थोड़ी ही दूरीपर कोई नगर दिखायी देता है। जबकि जागना चाहिये, ऐसे समय भी ये मेरे भाई सो रहे हैं। अच्छा, मैं स्वयं ही जागरण करूँ। थकावट दूर होनेपर जब ये नींदसे उठेंगे, तभी पानी पियेंगे।' ऐसा निश्चय करके भीमसेन स्वयं उस समय जागरण करने लगे ।। ४४-४५ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमजलाहरणे
पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें भीमसेनके जल ले आनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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