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##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
#भगवद गीता🙏🕉️ - ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः | लिप्यते স বাঐন এন্মণন্পমিনা্েমা Il 7 जो पुरुष सब कर्मोंको परमात्मामें अर्पण करके 37R   3TTHTmat करता   है, त्यागकर   कर्म dగౌ पुरुष जलसे कमलके पत्तेकी भाँति पापसे लिप्त নঙ্কী ৌীনা Il ?০ Il कायन मनसा बुद्ध्या कवलैारान्द्रयेरांप। योगिनः कर्म सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ।I कुर्वन्ति  कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीरद्वारा भी आसक्तिको त्यागकर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैँ II ११ II युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाज्नोति नैष्ठिकीम्।  अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते I। कर्मयोगी कर्मोंके करके त्याग फलका भगवत्प्राप्तिरूप शान्तिको प्राप्त होता है और सकाम - पुरुष कामनाकी प्रेरणासे फलमें 3177  ೯೯೯ बँधता है Il १२ Il वशी| सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते ತತೆ नवद्वारे पुरे देहीं   नैव ক্তণন্ন  कारयन्।। अन्तःकरण जिसके वशमें है ऐसा सांख्ययोगका आचरण करनेवाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारोंवाले शरीररूप घरमें सब आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन  कर्मोंको मनसे त्यागकर परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहता है Il १३ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 5 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः | लिप्यते স বাঐন এন্মণন্পমিনা্েমা Il 7 जो पुरुष सब कर्मोंको परमात्मामें अर्पण करके 37R   3TTHTmat करता   है, त्यागकर   कर्म dగౌ पुरुष जलसे कमलके पत्तेकी भाँति पापसे लिप्त নঙ্কী ৌীনা Il ?০ Il कायन मनसा बुद्ध्या कवलैारान्द्रयेरांप। योगिनः कर्म सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ।I कुर्वन्ति  कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीरद्वारा भी आसक्तिको त्यागकर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैँ II ११ II युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाज्नोति नैष्ठिकीम्।  अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते I। कर्मयोगी कर्मोंके करके त्याग फलका भगवत्प्राप्तिरूप शान्तिको प्राप्त होता है और सकाम - पुरुष कामनाकी प्रेरणासे फलमें 3177  ೯೯೯ बँधता है Il १२ Il वशी| सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते ತತೆ नवद्वारे पुरे देहीं   नैव ক্তণন্ন  कारयन्।। अन्तःकरण जिसके वशमें है ऐसा सांख्ययोगका आचरण करनेवाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारोंवाले शरीररूप घरमें सब आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन  कर्मोंको मनसे त्यागकर परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहता है Il १३ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 5 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat