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गज़ल #✒ शायरी
✒ शायरी - परवीन शाकिर Ta समुंदरों से   कोई आई ক उधर सदा বিলী   ক   নব   ব্রয়ীবী   স্তল आई हवा सरक गए थेजो आँचल वो फिर सँवारे गए खुले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई रही   हैं ख़ुशबुएँ   रग-ओ-पै  में 3 अजब किस को छू के मिरे शहर में सबा आई 4 पुकारा   तो होंटों पे कोई नाम न था उसे सफ़र   में মীচল্পনী   ক आई अजब फ़ज़ा कहीं   रहे   वो ख़ैरियत ক   মাথ 6 R हाथ   तो  याद एक   ही आई दुआ उठाए Motivational Vicleos /oo Want परवीन शाकिर Ta समुंदरों से   कोई आई ক उधर सदा বিলী   ক   নব   ব্রয়ীবী   স্তল आई हवा सरक गए थेजो आँचल वो फिर सँवारे गए खुले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई रही   हैं ख़ुशबुएँ   रग-ओ-पै  में 3 अजब किस को छू के मिरे शहर में सबा आई 4 पुकारा   तो होंटों पे कोई नाम न था उसे सफ़र   में মীচল্পনী   ক आई अजब फ़ज़ा कहीं   रहे   वो ख़ैरियत ক   মাথ 6 R हाथ   तो  याद एक   ही आई दुआ उठाए Motivational Vicleos /oo Want - ShareChat