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#पौराणिक कथा महर्षि अगस्त्य वेदों के एक मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। इनकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की कथाएँ मिलती हैं। कहीं मित्रावरुण के द्वारा वशिष्ठ के साथ घड़े में पैदा होने की बात आती है तो कहीं पुलस्त्य की पत्नी हविर्भू के गर्भ से विश्रवा के साथ इनकी उत्पत्ति का वर्णन आता है। किसी-किसी ग्रन्थ के अनुसार स्वायम्भुव मन्वन्तर में पुलस्त्यतनय दत्तोलि ही अगस्त्यके नामसे प्रसिद्ध हुए। ये सभी बातें कल्पभेद से ठीक उतरती हैं। इनके विशाल जीवन की समस्त घटनाओं का वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ संक्षेपतः दो-चार घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। एक बार विन्ध्याचल ने गगन पथगामी सूर्य का मार्ग रोक लिया। इतना ऊँचा हो गया कि सूर्य के आने जाने का स्थान ही न रहा। सूर्य महर्षि अगस्त्य के शरणागत हुए। अगस्त्य ने उन्हें आश्वासन दिया और स्वयं विन्ध्याचल के पास उपस्थित हुए। विन्ध्याचल ने बड़ी श्रद्धा-भक्ति से उन्हें नमस्कार किया। महर्षि अगस्त्य ने कहा–‘भैया, मुझे तीर्थों में पर्यटन करने के लिये दक्षिण दिशा में जाना आवश्यक है। परन्तु तुम्हारी इतनी ऊँचाई लाँघकर जाना बड़ा कठिन प्रतीत होता है, इसलिये कैसे जाऊँ ?’ उनकी बात सुनते ही विन्ध्याचल उनके चरणों में लोट गया। बड़ी सुगमता से महर्षि अगस्त्य ने उसे पार करके कहा–‘अब जब तक मैं न लौटूँ तुम इसी प्रकार पड़े रहना।’ विन्ध्याचल ने बड़ी नम्रता और प्रसन्नता के साथ उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। तबसे महर्षि अगस्त्य लौटे ही नहीं और विन्ध्याचल उसी प्रकार पड़ा हुआ है। अगस्त्य ने जाकर उज्जयिनी नगरी के शूलेश्वर तीर्थ की पूर्व दिशा में एक कुण्ड के पास शिवजी की आराधना की। भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। आज भी भगवान् शंकर की मूर्ति वहाँ अगस्त्येश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। एक बार भ्रमण करते-करते महर्षि अगस्त्य ने देखा कि कुछ लोग नीचे मुँह किये हुए कुएँ में लटक रहे हैं। पता लगाने पर मालूम हुआ कि ये उन्हीं के पितर हैं और उनके उद्धार का उपाय यह कि वे सन्तान उत्पन्न करें। बिना ऐसा किये पितरों का कष्ट मिटना असम्भव था। अतः उन्होंने विदर्भराज से पैदा हुई अपूर्व सुन्दरी और परम पतिव्रता लोपामुद्रा को पत्नी के रूप में स्वीकार किया। उस समय इल्वल और वातापी नाम के दो दैत्यों ने बड़ा उपद्रव मचा रखा था। वे ऋषियों को अपने यहाँ निमन्त्रित करते और वातापी स्वयं भोजन बन जाता और जब ऋषि लोग खा-पी चुकते तब इल्वल बाहरसे उसे पुकारता और वह उनका पेट फाड़कर निकल आता। इस प्रकार महान् ब्राह्मण संहार चल रहा था। भला, महर्षि अगस्त्य इसे कैसे सहन कर सकते थे ? वे भी एक दिन उनके यहाँ अतिथि के रूप में उपस्थित हुए और फिर तो सर्वदा के लिये उसे पचा गये। इस प्रकार लोक का महान् कल्याण हुआ। एक बार जब इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला तब कालेय नाम के दैत्यों ने समुद्र का आश्रय लेकर ऋषि-मुनियों का विनाश करना शुरू किया। वे दैत्य दिन में तो समुद्र में रहते और रात में निकलकर पवित्र जंगलों में रहने वाले ऋषियों को खा जाते। उन्होंने वशिष्ठ, च्यवन, भरद्वाज सभी के आश्रमों पर जा-जाकर हजारों की संख्या में ऋषि-मुनियों का भोजन किया था। अब देवताओं ने महर्षि अगस्त्य की शरण ग्रहण की, तब उनकी प्रार्थना से और लोगों की व्यथा और हानि देखकर उन्होंने अपने एक चुल्लू में ही सारे समुद्र को पी लिया। तब देवताओं ने जाकर कुछ दैत्यों का वध किया और कुछ भागकर पाताल चले गये। एक बार ब्रह्महत्या के कारण इन्द्र के स्थान च्युत होने के कारण राजा नहुष इन्द्र हुए थे। इन्द्र होने पर अधिकार के मद से मत्त होकर उन्होंने इन्द्राणी को अपनी पत्नी बनाने की चेष्टा की, तब बृहस्पति की सम्मति से इन्द्राणी ने एक ऐसी सवारी से आने की बात कही जिस पर अब तक कोई सवार न हुआ हो। मदमत्त नहुष ने सवारी ढोने के लिये ऋषियों को ही बुलाया। ऋषियों को तो सम्मान-अपमान का कुछ खयाल था ही नहीं। आकर सवारी में जुत गये। जब सवारी पर चढ़कर नहुष चले तब शीघ्रातिशीघ्र पहुँचने के लिये हाथ में कोड़ा लेकर ‘जल्दी चलो ! जल्दी चलो ! (सर्प, सर्प)’ कहते हुए उन ब्राह्मणों को विताड़ित करने लगे। यह बात महर्षि अगस्त्य से देखी नहीं गयी। वे इसके मूल में नहुषका अधःपतन और ऋषियों का कष्ट देख रहे थे। उन्होंने नहुष को उसके पापों का उचित दण्ड दिया। शाप देकर उसे एक महाकाय सर्प बना दिया और इस प्रकार समाज की मर्यादा सुदृढ़ रखी तथा धनमद और पदमद के कारण अन्धे लोगों की आँखें खोल दीं। भगवान् श्रीराम वनगमन के समय इनके आश्रम पर पधारे थे और इन्होंने बड़ी श्रद्धा, भक्ति एवं प्रेम से उनका सत्कार किया और उनके दर्शन, आलाप तथा संसर्ग से अपने ऋषि जीवन को सफल किया। साथ ही ऋषि ने उन्हें कई प्रकार के शस्त्रास्त्र दिये और सूर्योपस्थान की पद्धति बतायी। लंका के युद्ध में उनका उपयोग करके स्वयं भगवान् श्रीराम ने उनके महत्त्व की अभिवृद्धि की। प्रेमलक्षणा भक्ति के मूर्तिमान् स्वरूप भक्त सुतीक्ष्य इन्हीं के शिष्य थे। उनकी तन्मयता और प्रेम के स्मरण से आज भी लोग भगवान् की ओर अग्रसर होते हैं। लंका पर विजय प्राप्त करके जब भगवान् श्रीराम अयोध्या को लौट आये और उनका राज्याभिषेक हुआ तब महर्षि अगस्त्य वहाँ आये और उन्होंने भगवान् श्रीराम को अनेकों प्रकार की कथाएँ सुनायीं। वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड की अधिकांश कथाएँ इन्हीं के द्वारा कही हुई हैं। इन्होंने उपदेश और सत्संकल्प के द्वारा अनेकों का कल्याण किया। इनके द्वारा रचित अगस्त्य संहिता नाम का एक उपासना-सम्बन्धी बड़ा सुन्दर ग्रन्थ है। जिज्ञासुओं को उसका अवलोकन करना चाहिये। ० ० ० “जय जय श्री राधे”
पौराणिक कथा - अगस्त्य मुनि द्वार सागर्पान श्रीजी की चरण सेवा अगस्त्य मुनि द्वार सागर्पान श्रीजी की चरण सेवा - ShareChat