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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्र के गान्धारी से एक सौ पुत्र तथा एक कन्या की तथा सेवा करने वाली वैश्यजातीय युवती से युयुत्सु नामक एक पुत्र की उत्पत्ति...(दिन 343) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ युधिष्ठिरो राजपुत्रो ज्येष्ठो नः कुलवर्धनः । प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन् वाच्यमस्ति नः ।। ३१ ।। 'आदरणीय गुरुजनो! हमारे कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजकुमार युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ हैं। वे अपने गुणोंसे राज्यको पानेके अधिकारी हो चुके हैं। उनके विषयमें हमें कुछ नहीं कहना है ।। ३१ ।। अयं त्वनन्तरस्तस्मादपि राजा भविष्यति । एतद् विब्रूत मे तथ्यं यदत्र भविता ध्रुवम् ।। ३२ ।। 'किंतु उनके बाद मेरा यह पुत्र ही ज्येष्ठ है। क्या यह भी राजा बन सकेगा? इस बातपर विचार करके आपलोग ठीक-ठीक बतायें। जो बात अवश्य होनेवाली है, उसे स्पष्ट कहें' ।। ३२ ।। वाक्यस्यैतस्य निधने दिक्षु सर्वासु भारत । क्रव्यादाः प्राणदन् घोराः शिवाश्चाशिवशंसिनः ।। ३३ ।। जनमेजय ! धृतराष्ट्रकी यह बात समाप्त होते ही चारों दिशाओंमें भयंकर मांसाहारी जीव गर्जना करने लगे। गीदड़ अमंगलसूचक बोली बोलने लगे ।। ३३ ।। लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः । तेऽब्रुवन् ब्राह्मणा राजन् विदुरश्च महामतिः ।। ३४ ।। यथेमानि निमित्तानि घोराणि मनुजाधिप । उत्थितानि सुते जाते ज्येष्ठे ते पुरुषर्षभ ।। ३५ ।। व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव । तस्य शान्तिः परित्यागे गुप्तावपनयो महान् ।। ३६ ।। राजन् ! सब ओर होनेवाले उन भयानक अप-शकुनोंको लक्ष्य करके ब्राह्मणलोग तथा परम बुद्धिमान् विदुरजी इस प्रकार बोले- 'नरश्रेष्ठ नरेश्वर ! आपके ज्येष्ठ पुत्रके जन्म लेनेपर जिस प्रकार ये भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे स्पष्ट जान पड़ता है कि आपका यह पुत्र समूचे कुलका संहार करनेवाला होगा। यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो सब विघ्नोंकी शान्ति हो जायगी और यदि इसकी रक्षा की गयी तो आगे चलकर बड़ा भारी उपद्रव खड़ा होगा ।। ३४-३६ ।। शतमेकोनमप्यस्तु पुत्राणां ते महीपते । त्यजैनमेकं शान्तिं चेत् कुलस्येच्छसि भारत ।। ३७ ।। 'महीपते! आपके निन्यानबे पुत्र ही रहें; भारत! यदि आप अपने कुलकी शान्ति चाहते हैं तो इस एक पुत्रको त्याग दें ।। ३७ ।। एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा । त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।। ३८ ।। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् । स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः ।। ३९ ।। न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः । ततः पुत्रशतं पूर्ण धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ।। ४० ।। 'केवल एक पुत्रके त्यागद्वारा इस सम्पूर्ण कुलका तथा समस्त जगत्‌का कल्याण कीजिये। नीति कहती है कि समूचे कुलके हितके लिये एक व्यक्तिको त्याग दे, गाँवके हितके लिये एक कुलको छोड़ दे, देशके हितके लिये एक गाँवका परित्याग कर दे और आत्माके कल्याणके लिये सारे भूमण्डलको त्याग दे।' विदुर तथा उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके यों कहनेपर भी पुत्रस्नेहके बन्धनमें बँधे हुए राजा धृतराष्ट्रने वैसा नहीं किया। जनमेजय ! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रके पूरे सौ पुत्र हुए ।। ३८-४० ।। मासमात्रेण संजज्ञे कन्या चैका शताधिका । गान्धार्या क्लिश्यमानायामुदरेण विवर्धता ।। ४१ ।। धृतराष्ट्र महाराजं वैश्या पर्यचरत् किल । तस्मिन् संवत्सरे राजन् धृतराष्ट्रान्महायशाः ।। ४२ ।। जज्ञे धीमांस्ततस्तस्यां युयुत्सुः करणो नृप । एवं पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः ।। ४३ ।। महारथानां वीराणां कन्या चैका शताधिका । युयुत्सुश्च महातेजा वैश्यापुत्रः प्रतापवान् ।। ४४ ।। तदनन्तर एक ही मासमें गान्धारीसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो सौ पुत्रोंके अतिरिक्त थी। जिन दिनों गर्भ धारण करनेके कारण गान्धारीका पेट बढ़ गया था और वह क्लेशमें पड़ी रहती थी, उन दिनों महाराज धृतराष्ट्रकी सेवामें एक वैश्यजातीय स्त्री रहती थी। राजन् ! उस वर्ष धृतराष्ट्रके अंशसे उस वैश्यजातीय भार्याके द्वारा महायशस्वी बुद्धिमान् युयुत्सुका जन्म हुआ। जनमेजय ! युयुत्सु करण कहे जाते थे। इस प्रकार बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके एक सौ वीर महारथी पुत्र हुए। तत्पश्चात् एक कन्या हुई, जो सौ पुत्रोंके अतिरिक्त थी। इन सबके सिवा महातेजस्वी परम प्रतापी वैश्यापुत्र युयुत्सु भी थे ।। ४१-४४ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि गान्धारीपुत्रोत्पत्तौ चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें गान्धारीपुत्रोत्पत्तिविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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