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।। ॐ ।। अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।। #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुरुष अन्तकाल में अर्थात् मन के निरोध और विलयकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर के सम्बन्ध को छोड़ अलग हो जाता है, वह 'मद्भावम्'- साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। शरीर का निधन शुद्ध अन्तकाल नहीं है। मरने के बाद भी शरीरों का क्रम पीछे लगा रहता है। संचित संस्कारों की सतह के मिट जाने के साथ ही मन का निरोध हो जाता है। और वह मन भी जब विलीन हो जाता है तो वहीं पर अन्तकाल है, जिसके बाद शरीर धारण नहीं करना पड़ता। यह क्रियात्मक है। केवल कहने से, वार्त्ताक्रम से समझ में नहीं आता। जब तक वस्त्रों की तरह शरीर का परिवर्तन हो रहा है, तब तक शरीरों का अन्त कहाँ हुआ? मन के निरोध और निरुद्ध मन के भी विलयकाल में जीते-जी शरीर के सम्बन्धों का विच्छेद हो जाता है। यदि मरने के बाद ही यह स्थिति मिलती तो श्रीकृष्ण भी पूर्ण न होते।
यथार्थ गीता - Il 3ಠ Il अनेक जन्मों के अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।  अभ्यास से प्राप्तिवाला योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं किजो पुरुष अन्तकाल में ज्ञानी साक्षात् अर्थात् मन के निरोध और विलयकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर के सम्बन्ध को छोड़ अलग हो जाता है मेरा स्वरूप है। वह 'मद्भावम् - साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है। शरीर का निधन शुद्ध अन्तकाल नहीं मैं वह हूँ और वह है। मरने के बाद भी शरीरों का क्रम पीछे लगा रहता है। संचित संस्कारों की सतह के मिट जाने के साथ ही मन का मुझमें है। लेशमात्र भी निरोध हो जाता है। और वह मन भी जब विलीन हो जाता है तो वहीं पर अन्तकाल है, जिसके बाद शरीर धारण नहीं उसमें और करना पडता। यह क्रियात्मक हैे। केवल कहने से, मुझमें वार्त्ताक्रम से समझ में नहीं आता। जब तक वस्त्रों की तरह शरीर का परिवर्तन हो रहा है॰ तब तक शरीरों का अन्तर नहीं कहाँ हुआ ? मन के निरोध और निरुद्ध मन के भी সন विलयकाल में जीते ्जी शरीर के सम्बन्धों का विच्छेद हो जाता है। यदि मरने के बाद ही यह स्थिति मिलती तो श्रीकृष्ण  भी पूर्ण न होते। Il 3ಠ Il अनेक जन्मों के अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।  अभ्यास से प्राप्तिवाला योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं किजो पुरुष अन्तकाल में ज्ञानी साक्षात् अर्थात् मन के निरोध और विलयकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर के सम्बन्ध को छोड़ अलग हो जाता है मेरा स्वरूप है। वह 'मद्भावम् - साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है। शरीर का निधन शुद्ध अन्तकाल नहीं मैं वह हूँ और वह है। मरने के बाद भी शरीरों का क्रम पीछे लगा रहता है। संचित संस्कारों की सतह के मिट जाने के साथ ही मन का मुझमें है। लेशमात्र भी निरोध हो जाता है। और वह मन भी जब विलीन हो जाता है तो वहीं पर अन्तकाल है, जिसके बाद शरीर धारण नहीं उसमें और करना पडता। यह क्रियात्मक हैे। केवल कहने से, मुझमें वार्त्ताक्रम से समझ में नहीं आता। जब तक वस्त्रों की तरह शरीर का परिवर्तन हो रहा है॰ तब तक शरीरों का अन्तर नहीं कहाँ हुआ ? मन के निरोध और निरुद्ध मन के भी সন विलयकाल में जीते ्जी शरीर के सम्बन्धों का विच्छेद हो जाता है। यदि मरने के बाद ही यह स्थिति मिलती तो श्रीकृष्ण  भी पूर्ण न होते। - ShareChat