#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣9️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
दक्ष प्रजापति से लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंश की परम्परा का वर्णन...(दिन 296)
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पापाचारो राक्षसीं बुद्धिमाश्रितोऽनेकैरुपायैरुद्धर्तु भावित्वाच्चार्थस्य न शकितास्ते समुद्धर्तुम् ।। ६९ ।।
पापाचारी दुर्योधन राक्षसी बुद्धिका आश्रय ले अनेक उपायोंसे पाण्डवोंकी जड़ उखाड़नेका प्रयत्न करता रहता था। परंतु जो होनेवाली बात है, वह होकर ही रहती है; इसलिये दुर्योधन आदि पाण्डवों को नष्ट करने में सफल न हो सके ।। ६९ ।।
च व्यवसितः; ततश्च धृतराष्ट्रण व्याजेन वारणावतमनुप्रेषिता गमनमरोचयन् ।। ७० ।।
इसके बाद धृतराष्ट्रने किसी बहानेसे पाण्डवोंको जब वारणावत नगरमें जानेके लिये प्रेरित किया, तब उन्होंने वहाँसे जाना स्वीकार कर लिया ।। ७० ।।
तत्रापि जतुगृहे दग्धुं समारब्धा न शकिता विदुरमन्त्रितेनेति ।। ७१ ।।
वहाँ भी उन्हें लाक्षागृहमें जला डालनेका प्रयत्न किया गया; किंतु पाण्डवोंके विदुरजीकी सलाहके अनुसार काम करनेके कारण विरोधीलोग उनको दग्ध करनेमें समर्थ न हो सके ।। ७१ ।।
तस्माच्च हिडिम्बमन्तरा हत्वा एकचक्रां गताः ।। ७२ ।।
पाण्डव वारणावतसे अपनेको छिपाते हुए चल पड़े और मार्गमें हिडिम्ब राक्षस का वध करके वे एकचक्रा नगरीमें जा पहुँचे ।। ७२ ।।
तस्यामप्येकचक्रायां बकं नाम राक्षसं हत्वा पाञ्चालनगरमधिगताः ।। ७३ ।।
एकचक्रामें भी बक नामवाले राक्षसका संहार करके वे पांचाल नगरमें चले गये ।। ७३ ।।
तत्र द्रौपदीं भार्यामविन्दन्, स्वविषयं चाभिजग्मुः ।। ७४ ।।
वहाँ पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और फिर अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें लौट आये ।। ७४ ।।
कुशलिनः पुत्रांश्चोत्पादयामासुः । प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरः, सुतसोमं वृकोदरः, श्रुतकीर्तिमर्जुनः, शतानीकं नकुलः, श्रुतकर्माणं सहदेव इति ।। ७५ ।।
वहाँ कुशलपूर्वक रहते हुए उन्होंने द्रौपदीसे पाँच पुत्र उत्पन्न किये। युधिष्ठिरने प्रतिविन्ध्यको, भीमसेनने सुतसोमको, अर्जुनने श्रुतकीर्तिको, नकुलने शतानीकको और सहदेवने श्रुतकर्माको जन्म दिया ।। ७५ ।।
युधिष्ठिरस्तु गोवासनस्य शैब्यस्य देविकां नाम कन्यां स्वयंवरे लेभे । तस्यां पुत्रं जनयामास यौधेयं नाम ।। ७६ ।।
भीमसेनोऽपि काश्यां बलन्धरां नामोपयेमे वीर्य-शुल्काम् । तस्यां पुत्रं सर्वगं नामोत्पादयामास ।। ७७ ।।
युधिष्ठिरने शिबिदेशके राजा गोवासनकी पुत्री देविकाको स्वयंवरमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे एक पुत्रको जन्म दिया; जिसका नाम यौधेय था। भीमसेनने भी काशिराजकी कन्या बलन्धराके साथ विवाह किया; उसे प्राप्त करनेके लिये बल एवं पराक्रमका शुल्क
रखा गया था अर्थात् यह शर्त थी कि जो अधिक बलवान् हो, वही उसके साथ विवाह कर सकता है। भीमसेनने उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम सर्वग था ।। ७६-७७ ।।
अर्जुनः खलु द्वारवतीं गत्वा भगिनीं वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीं भार्यामुदावहत् । स्वविषयं चाभ्याजगाम कुशली। तस्यां पुत्रमभिमन्युमतीव गुणसम्पन्नं दयितं वासुदेवस्याजनयत् ।। ७८ ।।
अर्जुनने द्वारकामें जाकर मंगलमय वचन बोलनेवाली वासुदेवकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसे लेकर कुशलपूर्वक अपनी राजधानीमें चले आये वहाँ उसके गर्भसे अत्यन्त गुणसम्पन्न अभिमन्यु नामक पुत्रको उत्पन्न किया; जो वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको बहुत प्रिय था ।। ७८ ।।
नकुलस्तु चैद्यां करेणुमतीं नाम भार्यामुदावहत् । तस्यां पुत्रं निरमित्रं नामाजनयत् ।। ७९ ।।
नकुलने चेदिनरेशकी पुत्री करेणुमतीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे निरमित्र नामक पुत्रको जन्म दिया ।। ७९ ।।
सहदेवोऽपि माद्रीमेव स्वयंवरे विजयां नामोपयेमे मद्रराजस्य द्युतिमतो दुहितरम् । तस्यां पुत्रमजनयत् सुहोत्रं नाम ।। ८० ।।
सहदेवने भी मद्रदेशकी राजकुमारी विजयाको स्वयंवरमें प्राप्त किया। वह मद्रराज द्युतिमान्की पुत्री थी। उसके गर्भसे उन्होंने सुहोत्र नामक पुत्रको जन्म दिया ।। ८० ।।
भीमसेनस्तु पूर्वमेव हिडिम्बायां राक्षसं घटोत्कचं पुत्रमुत्पादयामास ।। ८१ ।।
भीमसेनने पहले ही हिडिम्बाके गर्भसे घटोत्कच नामक राक्षसजातीय पुत्रको उत्पन्न
किया ।। ८१ ।।
इत्येत एकादश पाण्डवानां पुत्राः । तेषां वंशकरोऽभिमन्युः ।। ८२ ।।
इस प्रकार ये पाण्डवोंके ग्यारह पुत्र हुए। इनमेंसे अभिमन्युका ही वंश चला ।। ८२ ।।
स विराटस्य दुहितरमुपयेमे उत्तरां नाम । तस्यामस्य परासुर्गर्भोऽभवत् । तमुत्सङ्गेन प्रतिजग्राह पृथा नियोगात् पुरुषोत्तमस्य वासुदेवस्य, षाण्मासिकं गर्भमहमेनं जीवयिष्यामीति ।। ८३ ।।
अभिमन्युने विराटकी पुत्री उत्तराके साथ विवाह किया था। उसके गर्भसे अभिमन्युके एक पुत्र हुआ; जो मरा हुआ था। पुरुषोतम भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे कुन्तीने उसे अपनी गोदमें ले लिया। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि छः महीनेके इस मरे हुए बालकको मैं जीवित कर दूँगा ।। ८३ ।।
स भगवता वासुदेवेनासंजातबलवीर्य-पराक्रमो ऽकालजातोऽस्त्राग्निना दग्धस्तेजसा स्वेन संजीवितः । जीवयित्वा चैनमुवाच - परिक्षीणे कुले जातो भवत्वयं परिक्षिन्नामेति ।। ८४ ।।
परिक्षित् खलु माद्रवतीं नामोपयेमे त्वन्मातरम् । तस्यां भवान् जनमेजयः ।। ८५
अश्वत्थामाके अस्त्रकी अग्निसे झुलसकर वह असमयमें (समयसे पहले) ही पैदा हो गया था। उसमें बल, वीर्य और पराक्रम नहीं था। परंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपने तेजसे जीवित कर दिया। इसको जीवित करके वे इस प्रकार बोले- 'इस कुलके परिक्षीण (नष्ट) होनेपर इसका जन्म हुआ है; अतः यह बालक परिक्षित् नामसे विख्यात हो'। परिक्षित्ने तुम्हारी माता माद्रवतीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे तुम जनमेजय नामक पुत्र उत्पन्न हुए ।। ८४-८५ ।।
भवतो वपुष्टमायां द्वौ पुत्री जज्ञाते; शतानीकः शङ्कुकर्णश्च । शतानीकस्य वैदेह्यां पुत्र उत्पन्नोऽश्व-मेधदत्त इति ।। ८६ ।।
तुम्हारी पत्नी वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए हैं- शतानीक और शंकुकर्ण। शतानीककी पत्नी विदेहराजकुमारीके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्रका नाम है अश्वमेधदत्त ।। ८६ ।।
एष पूरोर्वशः पाण्डवानां च कीर्तितः; धन्यः पुण्यः परमपवित्रः सततं श्रोतव्यो ब्राह्मणैर्नियम-वद्भिरनन्तरं क्षत्रियैः स्वधर्मनिरतैः प्रजापालन-तत्परैर्वेश्यैरपि च श्रोतव्योऽधिगम्यश्च तथा शूद्रैरपि त्रिवर्णशुश्रूषुभिः श्रद्दधानैरिति ।। ८७ ।।
यह पूरु तथा पाण्डवोंके वंशका वर्णन किया गया; जो धन और पुण्यकी प्राप्ति करानेवाला एवं परम पवित्र है, नियमपरायण ब्राह्मणों, अपने धर्ममें स्थित प्रजापालक क्षत्रियों, वैश्यों तथा तीनों वर्णोंकी सेवा करनेवाले श्रद्धालु शूद्रोंको भी सदा इसका श्रवण एवं स्वाध्याय करना चाहिये ।। ८७ ।।
इतिहासमिमं पुण्यमशेषतः श्रावयिष्यन्ति ये नराः श्रोष्यन्ति वा नियतात्मानो विमत्सरा मैत्रा वेद-परास्तेऽपि स्वर्गजितः पुण्यलोका भवन्ति सततं देवब्राह्मणमनुष्याणां मान्याः सम्पूज्याश्च ।। ८८ ।।
जो पुण्यात्मा मनुष्य मनको वशमें करके ईर्ष्या छोड़कर सबके प्रति मैत्रीभावको रखते हुए वेदपरायण हो इस सम्पूर्ण पुण्यमय इतिहासको सुनायेंगे अथवा सुनेंगे वे स्वर्गलोकके अधिकारी होंगे और देवता, ब्राह्मण तथा मनुष्योंके लिये सदैव आदरणीय तथा पूजनीय होंगे ।। ८८ ।।
परं हीदं भारतं भगवता व्यासेन प्रोक्तं पावनं ये ब्राह्मणादयो वर्णाः श्रद्दधाना अमत्सरा मैत्रा वेदसम्पन्नाः श्रोष्यन्ति, तेऽपि स्वर्गजितः सुकृतिनोऽशोच्याः कृताकृते भवन्ति ।। ८९ ।।
जो ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग मात्सर्यरहित, मैत्रीभावसे संयुक्त और वेदाध्ययनसे सम्पन्न हो श्रद्धापूर्वक भगवान् व्यासके द्वारा कहे हुए इस परम पावन महाभारत ग्रन्थ को सुनेंगे, वे भी स्वर्गके अधिकारी और पुण्यात्मा होंगे तथा उनके लिये इस बातका शोक नहीं रह जायगा कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्म क्यों नहीं किया ।। ८९ ।।
भवति चात्र श्लोकः -
इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं श्रोतव्यं नियतात्मभिः ।। ९० ।।
इस विषय में यह श्लोक प्रसिद्ध है-
'यह महाभारत वेदोंके समान पवित्र, उत्तम तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है। मनको वशमें रखनेवाले साधु पुरुषोंको सदैव इसका श्रवण करना चाहिये' ।। ९० ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने पञ्चनवतितमोऽध्यायः ।। ९५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशानुवर्णनविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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