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रुबाई उमर खय्याम #सूफी काव्य
सूफी काव्य - "ঠনাহ" आमद सहरे निदा ज़े मैख़ानः ए-मा कि॰ऐ रिंद ए ख़राबाती ओ दीवानः ए-मा बर-ख़ेज कि पुर कुनेम पैमानः ज़े ्मय ज़ॉं पेश कि पुर कुनंद पैमानः ए॰्मा भावार्थः मय-्ख़ाने से मेरे हमारे एक सुब्ह कानों में एक आवाज़़ आई कि ऐ मेरे मतवाले , शराब के चाहने वाले! उठ। आ हम ख़ुदा के इ'श्क से लबरेज़ प्याले को अपने होंटों से लगाएं इससे पहले कि ज़िंदगी का प्याला भर जाए। यानी मौत होने से पहले ही हम उससे लगन लगा लें। (उमर खय्याम) Motivational Videos App Want . "ঠনাহ" आमद सहरे निदा ज़े मैख़ानः ए-मा कि॰ऐ रिंद ए ख़राबाती ओ दीवानः ए-मा बर-ख़ेज कि पुर कुनेम पैमानः ज़े ्मय ज़ॉं पेश कि पुर कुनंद पैमानः ए॰्मा भावार्थः मय-्ख़ाने से मेरे हमारे एक सुब्ह कानों में एक आवाज़़ आई कि ऐ मेरे मतवाले , शराब के चाहने वाले! उठ। आ हम ख़ुदा के इ'श्क से लबरेज़ प्याले को अपने होंटों से लगाएं इससे पहले कि ज़िंदगी का प्याला भर जाए। यानी मौत होने से पहले ही हम उससे लगन लगा लें। (उमर खय्याम) Motivational Videos App Want . - ShareChat