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#❤️जीवन की सीख #👌 अच्छी सोच👍 #☝अनमोल ज्ञान #🌸 सत्य वचन #👉 लोगों के लिए सीख👈
❤️जीवन की सीख - "श्री सदगुरुदेवाय नमः " अभिभावक उचित अनुचित तरीकों से अपने, परिवार की सम्पन्नता बढाने में जुटे रहते हैं। इसी में वे अपना गौरव मानते हैं और वर्तमान तथा भविष्य को सुखन्शांति से भरा-पूरा होने की कल्पना करते रहते हैं पर परिणामतः होता इससे ठीक विपरीत ही है। संपदा अनावश्यक मात्रा में होने पर अपव्यय सूझता है। उसके बदले व्यसन और दुर्गुणों का पिटारा पल्ले पड़ता है। संपदा के बदले खरीदे गए दुर्गुण जीवन के साथ जोंक की तरह चिपट जाते हैं और खून पीते रहते हैं। सम्पन्नता विलासिता सिखाती है, आलसी प्रमादी और अहंकारी बनाती है। इस यथार्थता को न समझ पाने वाले ही यह सोचते सुसंस्कृत बनने का प्रयत्न करना रहते हैं कि धन-वैभव ही सबकुछ है। इसकी उपेक्षा अगर ल ম্তু্ী चाहिए क्योंकि यही संपदा है,जो जीवनभर साथ देती है। सद्रुणीं अपनों के बीच ही नहीं परायों के बीच भी सम्मान और सहयोग पाता है। बाबूलाल बाबूलाल . "श्री सदगुरुदेवाय नमः " अभिभावक उचित अनुचित तरीकों से अपने, परिवार की सम्पन्नता बढाने में जुटे रहते हैं। इसी में वे अपना गौरव मानते हैं और वर्तमान तथा भविष्य को सुखन्शांति से भरा-पूरा होने की कल्पना करते रहते हैं पर परिणामतः होता इससे ठीक विपरीत ही है। संपदा अनावश्यक मात्रा में होने पर अपव्यय सूझता है। उसके बदले व्यसन और दुर्गुणों का पिटारा पल्ले पड़ता है। संपदा के बदले खरीदे गए दुर्गुण जीवन के साथ जोंक की तरह चिपट जाते हैं और खून पीते रहते हैं। सम्पन्नता विलासिता सिखाती है, आलसी प्रमादी और अहंकारी बनाती है। इस यथार्थता को न समझ पाने वाले ही यह सोचते सुसंस्कृत बनने का प्रयत्न करना रहते हैं कि धन-वैभव ही सबकुछ है। इसकी उपेक्षा अगर ल ম্তু্ী चाहिए क्योंकि यही संपदा है,जो जीवनभर साथ देती है। सद्रुणीं अपनों के बीच ही नहीं परायों के बीच भी सम्मान और सहयोग पाता है। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat