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#❤️जीवन की सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈 #🌸 सत्य वचन #☝अनमोल ज्ञान #👌 अच्छी सोच👍
❤️जीवन की सीख - "श्री सदगुरुदेवाय नमः " मनुष्य के उच्च आदर्श आदर्शों एवं सिद्धांतों पर निष्ठा की परख ऐसे अवसर पर होती है जब स्वार्थ लोभ.मोह की प्रस्तुति होती है। सिद्धांतों एवं आदर्शों की कोरी बातें करना एक बात है उनका पालन करना कठिन और सर्वथा अलग बात है। समाज में आदर्शों एवं सिद्धांतों की चर्चा करने वालों की कमी नहीं भी वाक् ಕತt विकास का साधन और प्रतिष्ठा पुनर्स्थापन करने का एक सरल माध्यम मात्र माने जाते हैं। ऐसे व्यक्त्व पर मोह और लोभ का आकर्षण उभरते ही-गिरते अपनी गरिमा गंवाते देखे जाते हैं। इनमें आदर्शों के प्रति आस्था का समावेश होता है वे इन पारलौकिक आकर्षणों से प्रभावित नहीं होते और अपनी न्याय प्रियता कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हैं। ऐसे ही लोगों से समाज और देश गौरवान्वित होता है। बाबूलाल बाबूलाल . "श्री सदगुरुदेवाय नमः " मनुष्य के उच्च आदर्श आदर्शों एवं सिद्धांतों पर निष्ठा की परख ऐसे अवसर पर होती है जब स्वार्थ लोभ.मोह की प्रस्तुति होती है। सिद्धांतों एवं आदर्शों की कोरी बातें करना एक बात है उनका पालन करना कठिन और सर्वथा अलग बात है। समाज में आदर्शों एवं सिद्धांतों की चर्चा करने वालों की कमी नहीं भी वाक् ಕತt विकास का साधन और प्रतिष्ठा पुनर्स्थापन करने का एक सरल माध्यम मात्र माने जाते हैं। ऐसे व्यक्त्व पर मोह और लोभ का आकर्षण उभरते ही-गिरते अपनी गरिमा गंवाते देखे जाते हैं। इनमें आदर्शों के प्रति आस्था का समावेश होता है वे इन पारलौकिक आकर्षणों से प्रभावित नहीं होते और अपनी न्याय प्रियता कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हैं। ऐसे ही लोगों से समाज और देश गौरवान्वित होता है। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
#👌 अच्छी सोच👍 #☝अनमोल ज्ञान #👉 लोगों के लिए सीख👈 #🌸 सत्य वचन #❤️जीवन की सीख
👌 अच्छी सोच👍 - सदगुरुदेवाय नमः " "श्री व्यवहार के यथार्थ कारण मनुष्य के व उसकी आंतरिक गहराईयों में छिपे होते हैं। मनुष्य के व्यवहार की जड़ें अगर ढूंढनी हों तो निश्चित ही व्यक्तिके चरित्र एवं चिंतन की मिट्टी की परतों को खोदना होगा। चरित्र एवं चिंतन को सही ढंग से जाने वगैर व्यवहार की समग्र व्याख्या असंभव है। accacc. सदगुरुदेवाय नमः " "श्री व्यवहार के यथार्थ कारण मनुष्य के व उसकी आंतरिक गहराईयों में छिपे होते हैं। मनुष्य के व्यवहार की जड़ें अगर ढूंढनी हों तो निश्चित ही व्यक्तिके चरित्र एवं चिंतन की मिट्टी की परतों को खोदना होगा। चरित्र एवं चिंतन को सही ढंग से जाने वगैर व्यवहार की समग्र व्याख्या असंभव है। accacc. - ShareChat
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❤️जीवन की सीख - "श्री सदगुरुदेवाय नमः " आप सभ्य हो तो कठिन से कठिन अवसरों पर भी दूसरों से अनेक सुविधाएं ಶ पा सकते हैं और अपना लाभ उठा सकते हैं। अगर आप संस्कारी न हों तो दानी ज्ञानी उदार से भी उदार व्यक्तिके पास से भी कुछ न पाओगे। इसलिए सभ्य बनो सभ्य। व्यवहार का यह सबसे पहला जरूरी गुण है। बाबूलाल बाबूलाल . "श्री सदगुरुदेवाय नमः " आप सभ्य हो तो कठिन से कठिन अवसरों पर भी दूसरों से अनेक सुविधाएं ಶ पा सकते हैं और अपना लाभ उठा सकते हैं। अगर आप संस्कारी न हों तो दानी ज्ञानी उदार से भी उदार व्यक्तिके पास से भी कुछ न पाओगे। इसलिए सभ्य बनो सभ्य। व्यवहार का यह सबसे पहला जरूरी गुण है। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
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👉 लोगों के लिए सीख👈 - सदगुरुदेवाय नमः " "श्री कैसी विडंबना है कि बुद्धि होने की दावा करने वाला मनुष्य जीवन के सदुपयोग का आधार भूत समस्या की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता। लोक ्व्यवहार और अर्थ उपार्जन जैसे सामान्य प्रस्तावों में वह इतनी तत्परता बरतता है अगर आत्महित को ध्यान में रखकर सोचा गया होता तो निष्कर्ष कुछ और ही निकलता। तब हमारी दुकान का चक्र किसी दूसरी ही दिशा में प्रयाण कर रहा होता। बाबूलाल बाबूलाल . सदगुरुदेवाय नमः " "श्री कैसी विडंबना है कि बुद्धि होने की दावा करने वाला मनुष्य जीवन के सदुपयोग का आधार भूत समस्या की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता। लोक ्व्यवहार और अर्थ उपार्जन जैसे सामान्य प्रस्तावों में वह इतनी तत्परता बरतता है अगर आत्महित को ध्यान में रखकर सोचा गया होता तो निष्कर्ष कुछ और ही निकलता। तब हमारी दुकान का चक्र किसी दूसरी ही दिशा में प्रयाण कर रहा होता। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
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❤️जीवन की सीख - सदगुरुदेवाय नमः " "श्री अपने कुछ होने का व्यवहार ही व्यक्तिको उसका गौरव बताता है और और कुछ i आपकी दृष्टि में स्वयं को पदच्युत करता है। नहीं केवल जीवन में सरलता का ही समावेश कर लिया जाता है तो उसके पीछे अनेक गुण आपके पास खिंचे चले आते हैं। बाबूलाल बाबूलाल . RIN R $ 1 ١ ٤ ٨ N 0 E V= P ] N सदगुरुदेवाय नमः " "श्री अपने कुछ होने का व्यवहार ही व्यक्तिको उसका गौरव बताता है और और कुछ i आपकी दृष्टि में स्वयं को पदच्युत करता है। नहीं केवल जीवन में सरलता का ही समावेश कर लिया जाता है तो उसके पीछे अनेक गुण आपके पास खिंचे चले आते हैं। बाबूलाल बाबूलाल . RIN R $ 1 ١ ٤ ٨ N 0 E V= P ] N - ShareChat
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👉 लोगों के लिए सीख👈 - सदगुरुदेवाय नमः " "श्री ग्रहस्थ जीवन की ९० प्रतिशत सफलता नारी की अनुकूलता पर निर्भर रहती है। और नारी की अनुकूलता पुरुष की उदारता एवं सज्ची आत्मीयता पर निर्भरहै। यदि नारी में कोई कमी भी है तो उसके निर्मल हृदय को प्रेम से ही जीता जा सकता है। नारी की छोटी-्मोटी त्रुटियों बुराईयों से निराश एवं विक्षुब्ध होने की आवश्यकता नहीं है,वरन् रोगी के प्रति डाक्टर या परिचर्चा करने वाले की जो भावना होती है उसी भावना के साथ उसे सुधारने की आवश्यकता है। बाबूलाल बाबूलाल . सदगुरुदेवाय नमः " "श्री ग्रहस्थ जीवन की ९० प्रतिशत सफलता नारी की अनुकूलता पर निर्भर रहती है। और नारी की अनुकूलता पुरुष की उदारता एवं सज्ची आत्मीयता पर निर्भरहै। यदि नारी में कोई कमी भी है तो उसके निर्मल हृदय को प्रेम से ही जीता जा सकता है। नारी की छोटी-्मोटी त्रुटियों बुराईयों से निराश एवं विक्षुब्ध होने की आवश्यकता नहीं है,वरन् रोगी के प्रति डाक्टर या परिचर्चा करने वाले की जो भावना होती है उसी भावना के साथ उसे सुधारने की आवश्यकता है। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
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❤️जीवन की सीख - "श्री सदगुरुदेवाय नमः  "मेरे जीवन का व्रत और साधना" भगवान ने जिस वाटिका को सींचने का भार मुझे दिया है र उरसे ठीक तरह से सींचते रहना ही मेरी ईश्वर परायणता है। घर का कोई भी ऐसा सदस्य हीन दर्जे का नहीं हैजिसे में तुच्छ समझूं उपेक्षा करूं या सेवा सेजी चुराऊं। में मालिक नेता मुखिया या कमाऊ होने का अहंकार नहीं करता यह मेरा आत्मनिग्रह है। हर एक सदस्य के विकास में अपनी सेवाएं लगाते रहना मेरा परमार्थ है। बदले की जरा-सी-भी इच्छा न रखकर विशुद्ध कर्तव्य भाव से सेवा अपनी सुख  -सुविधाओं की परवाह न करते हुए औरों की रहना मेरा आत्मत्याग है। A सुख- सुविधा बढाने का प्रयत्न करना मेरा तप है। धर्म से उपार्जित अन्न से जीवन निर्वाह करना और कराना यह मेरा संयम है। प्रेम उदारता सहानुभूति की भावना से ओत प्रोत रहना और रखना प्रसन्नता आनंद और एकता की वृद्धि करना मेरी आराधना है। में अपने गृह-मंदिर में भगवान की चलती - फिरती प्रतिमाओं के प्रति अगाध भक्ति भावना रखता हूं। मेरी साधना सज्ची है मेरी साधना के प्रति मेरी भावना सज्ची है और अपनी आत्मा के सम्मुख में सज्चा हूं। सफलता - असफलता की जरा भी परवाह न करते हुए निष्काम कर्मयोगी की भांति सत्यता पूर्वक निबाहने का प्रयत्न कर रहाहूं। নানুলাল নানুলাল. "श्री सदगुरुदेवाय नमः  "मेरे जीवन का व्रत और साधना" भगवान ने जिस वाटिका को सींचने का भार मुझे दिया है र उरसे ठीक तरह से सींचते रहना ही मेरी ईश्वर परायणता है। घर का कोई भी ऐसा सदस्य हीन दर्जे का नहीं हैजिसे में तुच्छ समझूं उपेक्षा करूं या सेवा सेजी चुराऊं। में मालिक नेता मुखिया या कमाऊ होने का अहंकार नहीं करता यह मेरा आत्मनिग्रह है। हर एक सदस्य के विकास में अपनी सेवाएं लगाते रहना मेरा परमार्थ है। बदले की जरा-सी-भी इच्छा न रखकर विशुद्ध कर्तव्य भाव से सेवा अपनी सुख  -सुविधाओं की परवाह न करते हुए औरों की रहना मेरा आत्मत्याग है। A सुख- सुविधा बढाने का प्रयत्न करना मेरा तप है। धर्म से उपार्जित अन्न से जीवन निर्वाह करना और कराना यह मेरा संयम है। प्रेम उदारता सहानुभूति की भावना से ओत प्रोत रहना और रखना प्रसन्नता आनंद और एकता की वृद्धि करना मेरी आराधना है। में अपने गृह-मंदिर में भगवान की चलती - फिरती प्रतिमाओं के प्रति अगाध भक्ति भावना रखता हूं। मेरी साधना सज्ची है मेरी साधना के प्रति मेरी भावना सज्ची है और अपनी आत्मा के सम्मुख में सज्चा हूं। सफलता - असफलता की जरा भी परवाह न करते हुए निष्काम कर्मयोगी की भांति सत्यता पूर्वक निबाहने का प्रयत्न कर रहाहूं। নানুলাল নানুলাল. - ShareChat
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❤️जीवन की सीख - "श्री सदगुरुदेवाय नमः " अभिभावक उचित अनुचित तरीकों से अपने, परिवार की सम्पन्नता बढाने में जुटे रहते हैं। इसी में वे अपना गौरव मानते हैं और वर्तमान तथा भविष्य को सुखन्शांति से भरा-पूरा होने की कल्पना करते रहते हैं पर परिणामतः होता इससे ठीक विपरीत ही है। संपदा अनावश्यक मात्रा में होने पर अपव्यय सूझता है। उसके बदले व्यसन और दुर्गुणों का पिटारा पल्ले पड़ता है। संपदा के बदले खरीदे गए दुर्गुण जीवन के साथ जोंक की तरह चिपट जाते हैं और खून पीते रहते हैं। सम्पन्नता विलासिता सिखाती है, आलसी प्रमादी और अहंकारी बनाती है। इस यथार्थता को न समझ पाने वाले ही यह सोचते सुसंस्कृत बनने का प्रयत्न करना रहते हैं कि धन-वैभव ही सबकुछ है। इसकी उपेक्षा अगर ल ম্তু্ী चाहिए क्योंकि यही संपदा है,जो जीवनभर साथ देती है। सद्रुणीं अपनों के बीच ही नहीं परायों के बीच भी सम्मान और सहयोग पाता है। बाबूलाल बाबूलाल . "श्री सदगुरुदेवाय नमः " अभिभावक उचित अनुचित तरीकों से अपने, परिवार की सम्पन्नता बढाने में जुटे रहते हैं। इसी में वे अपना गौरव मानते हैं और वर्तमान तथा भविष्य को सुखन्शांति से भरा-पूरा होने की कल्पना करते रहते हैं पर परिणामतः होता इससे ठीक विपरीत ही है। संपदा अनावश्यक मात्रा में होने पर अपव्यय सूझता है। उसके बदले व्यसन और दुर्गुणों का पिटारा पल्ले पड़ता है। संपदा के बदले खरीदे गए दुर्गुण जीवन के साथ जोंक की तरह चिपट जाते हैं और खून पीते रहते हैं। सम्पन्नता विलासिता सिखाती है, आलसी प्रमादी और अहंकारी बनाती है। इस यथार्थता को न समझ पाने वाले ही यह सोचते सुसंस्कृत बनने का प्रयत्न करना रहते हैं कि धन-वैभव ही सबकुछ है। इसकी उपेक्षा अगर ल ম্তু্ী चाहिए क्योंकि यही संपदा है,जो जीवनभर साथ देती है। सद्रुणीं अपनों के बीच ही नहीं परायों के बीच भी सम्मान और सहयोग पाता है। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
#👉 लोगों के लिए सीख👈 #🌸 सत्य वचन #👌 अच्छी सोच👍 #☝अनमोल ज्ञान #❤️जीवन की सीख
👉 लोगों के लिए सीख👈 - "श्री सदगुरुदेवाय नमः ' अपनी आदतें बदलनी होती हैं। दूसरों का स्वभाव [C आदतें बदलने के दूसरों की : सुधारने के लिए पहले अपना सुधार करना होता है। उपदेशों से तो केवल जानकारी भर दी जा सकती है। व्यक्ति का सुधारना उन्ही के लिए संभव हो सकता है,जो अपने आपको आदर्श के रूप में विकसित कर सकते हैं। शिक्षा तो सहज ही सुनी जा सकती है, पर प्रेरणा तभी मिलती है,जब अनुकरण के लिए प्रभावशाली आदर्श सामने हो। ज्योतिवान दीपक ही दूसरे नयों को जलाता है। सांचे के अनुरूप ही खिलौने या पुर्जे ढलते हैं। दूसरे को कुछ सिखाना - बतानाभर हो तो बात दूसरी है अन्यथा ढालने का लक्ष्य सामने होतो सर्वप्रथम स्वयं ढलने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। बाबूलाल बाबूलाल . "श्री सदगुरुदेवाय नमः ' अपनी आदतें बदलनी होती हैं। दूसरों का स्वभाव [C आदतें बदलने के दूसरों की : सुधारने के लिए पहले अपना सुधार करना होता है। उपदेशों से तो केवल जानकारी भर दी जा सकती है। व्यक्ति का सुधारना उन्ही के लिए संभव हो सकता है,जो अपने आपको आदर्श के रूप में विकसित कर सकते हैं। शिक्षा तो सहज ही सुनी जा सकती है, पर प्रेरणा तभी मिलती है,जब अनुकरण के लिए प्रभावशाली आदर्श सामने हो। ज्योतिवान दीपक ही दूसरे नयों को जलाता है। सांचे के अनुरूप ही खिलौने या पुर्जे ढलते हैं। दूसरे को कुछ सिखाना - बतानाभर हो तो बात दूसरी है अन्यथा ढालने का लक्ष्य सामने होतो सर्वप्रथम स्वयं ढलने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat