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#👉 लोगों के लिए सीख👈 #☝अनमोल ज्ञान #🌸 सत्य वचन #👌 अच्छी सोच👍 #❤️जीवन की सीख
👉 लोगों के लिए सीख👈 - "श्री सदगुरुदेवाय नमः  पुष्प वाटिका में रहने वाला गोबर का कीडा अपनी रूचि के संग्रहालय की तलाश करता है और उसी में पडा रहकर खुश होता रहता है। और इसी प्रकार मधुमक्खी फूलदार पौधों को ढूंढती रहती है और पैरों से शहद जमा करती रहती है। ओछी प्रवृत्ति के मनुष्य संसार की गंदगी को ही देखते सोचते हैं और उसी में उलझे रहते हैं पर बुद्धिमान व्यक्ति संसार में श्रेष्ठता देखते हैं और श्रेष्ठता में ही निमग्न रहते हैं। নানুলাল নানুলল. "श्री सदगुरुदेवाय नमः  पुष्प वाटिका में रहने वाला गोबर का कीडा अपनी रूचि के संग्रहालय की तलाश करता है और उसी में पडा रहकर खुश होता रहता है। और इसी प्रकार मधुमक्खी फूलदार पौधों को ढूंढती रहती है और पैरों से शहद जमा करती रहती है। ओछी प्रवृत्ति के मनुष्य संसार की गंदगी को ही देखते सोचते हैं और उसी में उलझे रहते हैं पर बुद्धिमान व्यक्ति संसार में श्रेष्ठता देखते हैं और श्रेष्ठता में ही निमग्न रहते हैं। নানুলাল নানুলল. - ShareChat
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❤️जीवन की सीख - "श्री सदगुरुदेवाय नमः " सिखाया - पढाया गया तोता यों तो 'राधा -्कृष्ण , राधा -्कृष्ण' रटता रहता है,पर बिल्ली को देखते ही टें टें' बोलने लगता है। लोग दिखावे के लिए , मनोरंजन के लिए तो,धर्म -्कर्म की बातें करते हैं पर जब भी धर्म-्कर्म पर चलने की बात आती है तो कुकर्म में उतर जाते हैं। बाबूलाल बाबूलाल .. "श्री सदगुरुदेवाय नमः " सिखाया - पढाया गया तोता यों तो 'राधा -्कृष्ण , राधा -्कृष्ण' रटता रहता है,पर बिल्ली को देखते ही टें टें' बोलने लगता है। लोग दिखावे के लिए , मनोरंजन के लिए तो,धर्म -्कर्म की बातें करते हैं पर जब भी धर्म-्कर्म पर चलने की बात आती है तो कुकर्म में उतर जाते हैं। बाबूलाल बाबूलाल .. - ShareChat
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👉 लोगों के लिए सीख👈 - सदगुरूदेवाय नमः " "श्री चिकित्सा ग्रंथ में ज्वर की दवा लिखी थी। एक अंधश्रद्धालु रोगी ने पुस्तक में से ज्वर की दवा बाला पन्ना फाडा और खा लिया। तब भी ज्वर ठीक नहीं हुआ। शास्त्र में लिखी बात सही क्यों नहीं हुई ? ऋषि वचनों से निरोग क्यों नहीं हुआ ?्वह इसी असमंजस में था। तभी एक संत पुरुष आये। मरीज ने अपना असमंजस बताया। तब उन्होंने यही कहा-्पुस्तक में जो दवा लिखी गई थी। उसे प्राप्त करके खाने से रोग दूर क करने की शक्ति ज्वर ठीक होता है। पुस्तक तो निर्देश कर सकती है इसमें " शामिल नहीं है। इसी प्रकार व्यक्ति धर्म-ग्रंथों का पाठ करता है और सोचता है कि पाठनदुहराने से ही कल्याण हो जाएगा। वे यह भूल जाते हैं कि धर्म-ग्रंथों में जो राह बताई गई है उस पर चलने से ही काम बनेगा अन्यथा नहीं। बाबूलाल बाबूलाल . सदगुरूदेवाय नमः " "श्री चिकित्सा ग्रंथ में ज्वर की दवा लिखी थी। एक अंधश्रद्धालु रोगी ने पुस्तक में से ज्वर की दवा बाला पन्ना फाडा और खा लिया। तब भी ज्वर ठीक नहीं हुआ। शास्त्र में लिखी बात सही क्यों नहीं हुई ? ऋषि वचनों से निरोग क्यों नहीं हुआ ?्वह इसी असमंजस में था। तभी एक संत पुरुष आये। मरीज ने अपना असमंजस बताया। तब उन्होंने यही कहा-्पुस्तक में जो दवा लिखी गई थी। उसे प्राप्त करके खाने से रोग दूर क करने की शक्ति ज्वर ठीक होता है। पुस्तक तो निर्देश कर सकती है इसमें " शामिल नहीं है। इसी प्रकार व्यक्ति धर्म-ग्रंथों का पाठ करता है और सोचता है कि पाठनदुहराने से ही कल्याण हो जाएगा। वे यह भूल जाते हैं कि धर्म-ग्रंथों में जो राह बताई गई है उस पर चलने से ही काम बनेगा अन्यथा नहीं। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
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❤️जीवन की सीख - सदगुरुदेवाय नमः" "श्री आज इंसान की ईश्वर के प्रति सोच- लोग इतना भर जानते हैं कि ईश्वर किसी अन्य लोक में रहने वाले ऐसे देवता का नाम है जो पूजा - अर्चना का भूखा और स्तुति - प्रार्थना का प्यासा रहता है। जो कोई उसे यह  चीज दे दे उसे निहाल कर देता है। उसे पापों का दंड नहीं देता और जो पूजा-प्रार्थना नहीं करता उससे वह रुष्ट रहता है और कष्ट पर कष्ट देता है। यदि यही सोच सही है तो फिर न्याय की प्रस्तुति पर ऐसा ईश्वर सर्वथा ओछा और खोटा सिद्ध होगा। तब उसकी व्यवस्था में किसी सिद्धांत आदर्श नियम या व्यवस्था की आशा कैसे की जाएगी और उसके प्रति किसी विवेकवान व्यक्ति के मन में श्रद्धा क्यों उत्पन्न होगी ?हमको इस सोच को बदलकर अंतःकरण को विकसित करना होगा तभी हम अपना उद्धार कर सकते हैं। जीवन पशुओं से भी बद्तर है। अन्यथा हमारा ` बाबूलाल बाबूलाल . सदगुरुदेवाय नमः" "श्री आज इंसान की ईश्वर के प्रति सोच- लोग इतना भर जानते हैं कि ईश्वर किसी अन्य लोक में रहने वाले ऐसे देवता का नाम है जो पूजा - अर्चना का भूखा और स्तुति - प्रार्थना का प्यासा रहता है। जो कोई उसे यह  चीज दे दे उसे निहाल कर देता है। उसे पापों का दंड नहीं देता और जो पूजा-प्रार्थना नहीं करता उससे वह रुष्ट रहता है और कष्ट पर कष्ट देता है। यदि यही सोच सही है तो फिर न्याय की प्रस्तुति पर ऐसा ईश्वर सर्वथा ओछा और खोटा सिद्ध होगा। तब उसकी व्यवस्था में किसी सिद्धांत आदर्श नियम या व्यवस्था की आशा कैसे की जाएगी और उसके प्रति किसी विवेकवान व्यक्ति के मन में श्रद्धा क्यों उत्पन्न होगी ?हमको इस सोच को बदलकर अंतःकरण को विकसित करना होगा तभी हम अपना उद्धार कर सकते हैं। जीवन पशुओं से भी बद्तर है। अन्यथा हमारा ` बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
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#❤️जीवन की सीख #👌 अच्छी सोच👍 #☝अनमोल ज्ञान #🌸 सत्य वचन #👉 लोगों के लिए सीख👈
❤️जीवन की सीख - "श्री सदगुरुदेवाय नमः " आत्म प्रताड़ना सबसे बडा दण्ड है जिस व्यक्तिकी आत्मा ही उसके भीतर कुविचारों के लिए कचोटती रहती है व कुमार्ग पर चलने के कारण आत्मा को धिक्कारती रहती है वह अपनी दृष्टि में आप ही पतित होती रहती है। पतित अंतरात्मा वाला व्यक्तित्व उन शक्तियों को खो देता है जो आधार पर वास्तविक आकांक्षा का समारंभ संभव होता है। हम ऊंचे उठ रहे हैं या नीचे गिर रहे हैं। आत्मसंतोष जिसमें नहीं पाया जा सकता जो अपनी वर्तमान गतिविधियों पर खिन्न एवं असंतुष्ट है उसे विकसित नहीं कहा जा सकता। जिसने अपनी आंतरिक शांति गंवा दी उसे बाहरशांति कहां मिलने वाली है? धन कमा लेने से,कोई ऊंचा पद प्राप्त कर लेने से,कई प्रकार के सुख -साधन तो इकट्ठे किए जा सकते हैं पर आत्मसंतोष नहीं मिल पाता है। নানুলাল নানুলল. "श्री सदगुरुदेवाय नमः " आत्म प्रताड़ना सबसे बडा दण्ड है जिस व्यक्तिकी आत्मा ही उसके भीतर कुविचारों के लिए कचोटती रहती है व कुमार्ग पर चलने के कारण आत्मा को धिक्कारती रहती है वह अपनी दृष्टि में आप ही पतित होती रहती है। पतित अंतरात्मा वाला व्यक्तित्व उन शक्तियों को खो देता है जो आधार पर वास्तविक आकांक्षा का समारंभ संभव होता है। हम ऊंचे उठ रहे हैं या नीचे गिर रहे हैं। आत्मसंतोष जिसमें नहीं पाया जा सकता जो अपनी वर्तमान गतिविधियों पर खिन्न एवं असंतुष्ट है उसे विकसित नहीं कहा जा सकता। जिसने अपनी आंतरिक शांति गंवा दी उसे बाहरशांति कहां मिलने वाली है? धन कमा लेने से,कोई ऊंचा पद प्राप्त कर लेने से,कई प्रकार के सुख -साधन तो इकट्ठे किए जा सकते हैं पर आत्मसंतोष नहीं मिल पाता है। নানুলাল নানুলল. - ShareChat
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👉 लोगों के लिए सीख👈 - "श्री सदगुरुदेवाय नमः जिस इंसान को प्रेम का एक कण भी मिल जाता है 0 वह अपनी किस्मत को सराहताहै। अभाव और दरिद्रिता के रहते हुए भी जब प्रेम के कुछ् कण उपलब्ध हो जाते हैं तो वह अपने आपको किसी अमीर से कम सुखी नहीं समझता।  माता पिता का 17 पत्नी का भाई का दोस्त का जनता का प्यार जो उसे मिलता हैतो मानो जीवन की सबसे बडी विभूति ঢ उसे मिल गई यही प्यारहै। बाबूलाल बाबूलाल . "श्री सदगुरुदेवाय नमः जिस इंसान को प्रेम का एक कण भी मिल जाता है 0 वह अपनी किस्मत को सराहताहै। अभाव और दरिद्रिता के रहते हुए भी जब प्रेम के कुछ् कण उपलब्ध हो जाते हैं तो वह अपने आपको किसी अमीर से कम सुखी नहीं समझता।  माता पिता का 17 पत्नी का भाई का दोस्त का जनता का प्यार जो उसे मिलता हैतो मानो जीवन की सबसे बडी विभूति ঢ उसे मिल गई यही प्यारहै। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #👌 अच्छी सोच👍 #🌸 सत्य वचन #☝अनमोल ज्ञान #👉 लोगों के लिए सीख👈
❤️जीवन की सीख - "श्री सदगुरुदेवाय नमः ' मनुष्य को हँसने ्हँसाने का स्वभाव बनाना चाहिए। उत्साह संतुलन और साहस का अभ्यास बढाना चाहिए। यह एक मानसिक टॉनिकहै जो निरंतर नवीन शक्ति उत्पन्न करता है। अच्छी आदत के रूप में स्वभाव का अंग बन जाने पर व्यक्त्त्वि की प्रकृति में चार चांद लगजाते हैं। எழcac. "श्री सदगुरुदेवाय नमः ' मनुष्य को हँसने ्हँसाने का स्वभाव बनाना चाहिए। उत्साह संतुलन और साहस का अभ्यास बढाना चाहिए। यह एक मानसिक टॉनिकहै जो निरंतर नवीन शक्ति उत्पन्न करता है। अच्छी आदत के रूप में स्वभाव का अंग बन जाने पर व्यक्त्त्वि की प्रकृति में चार चांद लगजाते हैं। எழcac. - ShareChat
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👉 लोगों के लिए सीख👈 - सदगुरुदेवाय नमः "श्री सम्मान देना है। गुम्बद वाले मकानों में होने वाली दूसरों को " अत्म -्सम्मान का आधार को मिलती है जो हमने बोली थी। अगर गाली eaataraiaataas सुनने क दें तो गाली और भजन गावें तो भजन वह गुम्बद वाले मकान प्रतिध्वनि के रूप में दुहरा देता है। दर्पण में हमें अपनी ही परछाई दिखाई देती है। जैसा अपना ही कुरूप या रूपवान चेहरा होता है वही पलटकर सामने आता है। इस संसार का व्यवहार भी गुम्बददार मकान व दर्पण जैसा ही होता है यदि हम दूसरों का सम्मान करते हैं तो बदले में हमें भी सम्मान मिलता है। अपने मन में यदि दूसरों के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता भरी रहे तो बदले में दूसरी ओर से भी हमें यही सब मिलेगा। बाबूलाल बाबूलाल . सदगुरुदेवाय नमः "श्री सम्मान देना है। गुम्बद वाले मकानों में होने वाली दूसरों को " अत्म -्सम्मान का आधार को मिलती है जो हमने बोली थी। अगर गाली eaataraiaataas सुनने क दें तो गाली और भजन गावें तो भजन वह गुम्बद वाले मकान प्रतिध्वनि के रूप में दुहरा देता है। दर्पण में हमें अपनी ही परछाई दिखाई देती है। जैसा अपना ही कुरूप या रूपवान चेहरा होता है वही पलटकर सामने आता है। इस संसार का व्यवहार भी गुम्बददार मकान व दर्पण जैसा ही होता है यदि हम दूसरों का सम्मान करते हैं तो बदले में हमें भी सम्मान मिलता है। अपने मन में यदि दूसरों के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता भरी रहे तो बदले में दूसरी ओर से भी हमें यही सब मिलेगा। बाबूलाल बाबूलाल . - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #👌 अच्छी सोच👍 #☝अनमोल ज्ञान #🌸 सत्य वचन #👉 लोगों के लिए सीख👈
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